Poonam Chauhan/Alive News
फरीदाबाद : अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त फरीदाबाद शहर का सूरजकुण्ड हस्तशिल्प मेला आज देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी विख्यात है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सूरजकुण्ड मेला फरीदाबाद शहर की पहचान बना है और हरियाणा की संस्कृति और इतिहास को मजबूती प्रदान करने वाला यह मेला आज खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जिस सूरजकुण्ड के कारण मेला अस्तित्व में आया आज वहीं कुण्ड बदहाली की हालत में खण्डहर में दबदील है। प्रर्यटक इसे फिर से अपनी पुरानी पहचान लौटते देखना चाहते है। कई साहित्यकार और शहर के पत्रकारों ने शासक सूरजपाल की धरोहर पर लेख लिखें है और लेख पढऩे के बाद पुरातत्व विभाग से लेकर इतिहास की खोज करने वाले बुद्धिजीवियों ने यहां का अवलोकन किया। परन्तु जो लेख में छपा वह कुण्ड में न होना हरियाणा पर्यटन विभाग की लापरवाही का कारण है। इसके अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए राज्य सरकार ने कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

surajkun lake

लगातार तीस वर्षो से राज्य सरकार और पर्यटन विभाग कुण्ड के नाम पर संचालित मेले से करोड़ो की आमदनी तो करते रहें है, लेकिन एतिहासिक धरोहर के स्वरूप को बरकरार रखने के लिए बजट नही बनाया गया। हालांकि मेला ग्राऊंड में पहुंचने के बाद देखा जा सकता है कि हैदराबाद से चार मिनार को उठाकर यहां स्थापित कर दिया गया, वहीं छत्तीसगढ़ के भव्य गेट के निर्माण के साथ ही यहां मेले में भाग लेने वाले बाकी राज्य की भी छाप आपको दिखाई पड़ जाएगी लेकिन कुण्ड के नाम पर पर्यटन विभाग के द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।

कला प्रेमियों को अच्छा प्लेटफार्म और मंच प्रदान करने वाला यह मेला आज खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। सूरजकुण्ड के नाम से जाना जाने वाला यह मेला आज कलाकारो और विदेशी बालाओं की चकाचौध में गुम होता जा रहा है। आज सूरजकुण्ड मेला तो सबकी जुबान पर है लेकिन जिसके नाम पर इस मेले का नाम रखा गया है, आज वह कुण्ड ही गुमनामी की कगार पर जा पहुंचा है। कुण्ड आज पूरी तरह से सुख चुका है, लेकिन इसकी तरफ पर्यटन विभाग को कोई ध्यान नही जा रहा है। कुण्ड आज पत्थरो का एक गड्ढा मात्र बनकर रह गया है। पर्यटन विभाग ने इस कुण्ड के लिए टिकट तो रखी हुई है लेकिन इसके रख-रखाव पर उनका कोई ध्यान नही है। आज कुण्ड की यह दशा देखकर प्रशासन और सिस्टम की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खडे हो रहे है।

surajkun lake-1कुंड का महत्व 

उगते सूरज की तरह दिखने वाला यह सूरजकुंड फरीदाबाद से आठ कि.मी. दूरी पर अरावली की गोद में बसा है। इसे तोमर वंश के शासक सूरजपाल द्वारा बनवाया गया था। इस कुंड के बीचों-बीच भव्य सूर्य मंदिर है, जो राजा ने सूर्य देवता की उपासना के लिए तैयार कराया था। बताया जाता है कि 10वीं शताब्दी में यहां कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा का प्रमाण मिलता है। छठ पूजा के अवसर पर इस कुंड का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस कुंड का आकार उगते सूर्य के रूप में है, जो समृद्धि का प्रतीक है। छठ पूजा में पहले दिन डूबते हुए सूर्य की पूजा होती है। अगले दिन उगते हुए सूर्य की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है। जिस तरह से सूरजपाल ने इस जलाशय का निर्माण कराया था। यह कुण्ड सूर्य पूजा का प्रतीक है।

लवर प्वाईट बना कुण्ड 

कुण्ड आज खंडहर में दबदील हो चुका है, कुण्ड में पानी न होने से यह पूरी तरह से सुख गया है और आजकल यह प्रेमी युगलो का अड्ढा बना हुआ है, इसकी सीढिय़ों पर कई प्रेमी जोडे बैठे नजर आ जाते है जोकि एकांत में कुछ समय व्यतीत करने की चाहत लिए यहां आते है।
कुण्ड से अंजान लोग : सूरजकुण्ड मेले में लाखो पर्यटक आते है और मेले का लुत्फ उठाते है पर कुण्ड के महत्व से अनभिज्ञ रह जाते है। जिस सुर्य देवता एवं कुण्ड को लेकर मेले का आयोजन पिछले तीस सालों से किया जा रहा है, आज वहीं कुण्ड गुमनामी की कगार पर जा पहुंचा है, और पर्यटन विभाग उसे गुलजार करने में असमर्थ साबित हुआ है।

बूंद-बूंद को तरसा कुण्ड

 कभी पानी से लबालब भरा रहने वाला कुण्ड आज पानी की एक बूंद के लिए भी तरसता है। पिछले कई सालों से कुण्ड सुखा पड़ा है। प्रयर्टन विभाग कुण्ड को पानी से भरना तो दूर इसकी देखरेख पर भी कोई ध्यान नही दे रहा है। अपनी खुबसुरती और महत्व के लिए चर्चित कुण्ड आज गुमनाम और खण्डहर हो चुका है।

क्या बोले प्रर्यटन मंत्री

 शिक्षा एवं प्रर्यटन मंत्री रामबिलास शर्मा का कहना है कि कुण्ड के रख-रखाव के लिए योजना बनाई जा रही है, सभी प्रर्यटन स्थलों के लिए विशेष कमेटी बनाकर जल्द कार्य शुरू कर दिया जाएगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here