2 मिनट की शोहरत और देश की छवि धूमिल

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740 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में से केवल तीन-चार कैम्पस में ही अल्ट्रा लेफ्ट और नक्सल विचारधारा वाले छात्र आंदोलन पर उतरे हुए हैं। भाजपा के विरोधी लोग इनका इस्तेमाल सामाजिक उन्माद पैदा करने और वोट बैंक की राजनीति के लिए कर रहे हैं।

कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला और जेएनयू में राष्ट्र विरोधी नारे की घटना का इस्तेमाल एनडीए की छवि खराब करने के लिए कर रही हैं। ये पार्टियां अन्य कैम्पस में भी माहौल खराब करने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन उनकी यह कोशिश फेल रही क्योंकि अधिकत्तर छात्रों का मानना है कि इन घटनाओं की वजह से उनकी कक्षाओं पर असर पड़ा है। एक बार भी छात्रों के भविष्य और देश की छवि के बारे में सोचे बिना वे गैर जिम्मेदाराना और निंदनीय हरकतें कर रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारों और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के विवाद में कूद पड़े। उन्होंने ये नहीं सोचा कि उनका यह अपरिपक्व कदम दो मिनट की शोहरत तो दिला सकता है, लेकिन इससे उनकी पार्टी और देश की छवि को कितना नुकसान पहुंचेगा। विचारों की आजादी पर बहस बहुत बड़ी हो सकती है। कांग्रेस और लेफ्ट नेता राष्ट्रविरोधी नारों को सही ठहराने में लगे हुए हैं। कुछ विपक्षी पार्टियां सच्चाई को ढकते हुए एनडीए सरकार की यह छवि बनाने में लगी हुई हैं कि आज के वक्त सरकार की आलोचना ही राष्ट्रद्रोह है। लेकिन सच्चाई ज्यादा दिन छुपी नहीं रह सकती। सरकार विरोधी नारे समझ में आते हैं, लेकिन कोई राष्ट्रविरोधी नारों को कैसे सहन कर लेगा। मतभेद स्वीकार्य हैं, लेकिन देश का बंटवारा चाहने वालों को सहन नहीं किया जा सकता। 740 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में से केवल तीन-चार कैम्पस में ही अल्ट्रा लेफ्ट और नक्सल विचारधारा वाले छात्र आंदोलन पर उतरे हुए हैं। विपक्षी पार्टियों का कहना है कि ऐसा माहौल सभी यूनिवर्सिटीज में बना हुआ है। भाजपा के विरोधी लोग इनका इस्तेमाल सामाजिक उन्माद पैदा करने और वोटबैंक की राजनीति के लिए कर रहे हैं। सामाजिक उन्माद फैलाने, कैम्पस में विद्रोह के लिए कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां जिम्मेदार हैं। काग्रेस के लिए राष्ट्र और पार्टी से ऊपर खुद का परिवार और खुद के हित हैं। वहीं लेफ्ट दलों के लिए सिस्टम को कमजोर करना उनकी विचारधारा का हिस्सा है। दुर्भाग्य से मीडिया भी छात्रों में अशांति का माहौल पैदा करने के लिए जिम्मेदार है। जेएनयू विवाद को समझने के लिए मुद्दे की जड़ तक जाना होगा। जेएनयू लेफ्ट विचारधारा का गढ़ रहा है। सत्ता में 60 साल तक रहने वाली कांग्रेस ने हमेशा शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों को अपने गिरफ्त में रखा। कांग्रेस राज से लाभ पाने वाले लेफ्ट विचारधारा रखने वाले चाहते थे कि उनकी सत्ता बरकरार रहे। कांग्रेस और लेफ्ट नेता हमेशा विरोधी विचारों के लिए असहिष्णु रहे हैं। वे जनता के नजरिए को दबाकर अपने विचार थोपना चाहते हैं। वे ‘असहिष्णुता’ के बारे में चीख रहे हैं, वहीं उनकी विचारधारा से तात्लुक रखने वाले इतिहासकार, कॉलमनिस्ट और सामाजिक नेता पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा अभिमानी हैं। रोहित की आत्महत्या का केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय की छवि खराब करने के लिए राजनीतिकरण कर दिया गया। अगर उसकी आत्महत्या हैरान करने वाली थी, तो उसके बाद क्या हुआ? राजनीतिक दलों ने कैम्पस को अपना ठिकाना बना लिया और रोहित को श्रद्धांजलि देने का ढोंग किया। अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन (एएसए) जो कि सीधे तौर पर अल्ट्रा लेफ्ट से जुड़ा है, फासीवादी विचारधारा के लिए जाना जाता है। यह संगठन अपने राजनीतिक विरोधियों को भी धमकाता रहा है। इस संगठन ने पुलिस को रोहित का शव नहीं उठाने दिया था और उनके साथ हाथापाई और गालीगलौच की। गौर करने वाली बात यह है कि दलितों की दुर्दशा और एएसए की गतिविधियां दोनों ही अलग-अलग मुद्दे हैं। एएसए के खिलाफ बोलने को दलितों के खिलाफ न समझा जाए। पीएम मोदी दलितों का पूरा समर्थन करते हैं। दलित और पिछडे़ वर्ग से सबसे ज्यादा सांसद भाजपा से हैं। कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां रोहित आत्महत्या की घटना को दलित विरोधी मुद्दा बनाना चाहती हैं। याकूब मेमन के लिए नमाज-ए-जनाजा पढ़ने को लेकर एएसए क्या सफाई देगी? यह राष्ट्रविरोधी गतिविधि हैदराबाद यूनिवर्सिटी कैम्पस में की गई थी। इसमें नारे लगाए गए थे कि ‘तुम कितने याकूब मेमन मारोगे’, ‘अगर आप एक याकूब को मारोगे तो, हर घर से हजारों याकूब मेमन पैदा होंगे’। एएसए ऐसे विचार रखती है और इन गतिविधियों का समर्थन करती है। दूसरे तथ्य पर गौर किया जाए तो दत्तात्रेय ने किसी भी छात्र का नाम नहीं लिया था और न ही उन्होंने किसी को जातिवादी और राष्ट्रविरोधी कहा था। एक जिम्मेदार प्रतिनिधि और सांसद के नाते उस नोट को आगे बढ़ाया था, जिसमें कहा गया था कि विश्वविद्यालय जातिवादी, अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी राजनीति का अड्डा बना गया है। एचआरडी मिनिस्ट्री ने भी वह नोट यूनिवर्सिटी को भेजते हुए इस पर सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए। इस पर एक झूठा एजेंडा चलाकर लोगों को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि दत्तात्रेय के पत्र ने रोहित को आत्महत्या करने को मजबूर किया है। साथ ही यह भी बताया जा रहा है कि रोहित को वजीफा नहीं दिया जा रहा था। हालांकि, इनका यह दावा बैंक डिटेल से झूठा साबित हुआ। दत्तात्रेय ने पत्र में वही बातें लिखी थी जो कांग्रेस सांसद वी हनुमंत राव ने नवंबर 17, 2014 को एचआरडी मिनिस्टर को लिखी थी। राव ने पत्र में हैदराबाद यूनिवर्सिटी में ‘किस ऑफ लव’ जैसे समारोह पर चिंता जाहिर की थी। साथ ही इसमें जातिवाद की बात भी कही गई थी। मानव संसाधन मंत्रालय ने दत्तात्रेय के पत्र पर वही कार्रवाई की जो उन्होंने राव के पत्र पर की थी। कांग्रेस के राज में भी हैदराबाद यूनिवर्सिटी द्वारा काफी संख्या में छात्रों को निलंबित और बाहर निकाला गया था। कांग्रेस के कार्यकाल में 10 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या की थी। उस वक्त न गांधी और न ही सीताराम येचुरी के पास यूनिवर्सिटी जाने का वक्त नहीं था। सरकार कैम्पस का इस्तेमाल सामाजिक उन्माद फैलाने और गंदी राजनीतिक के लिए नहीं होने देगी। जेएनयू में भगवान राम का पुतला जलाने, देवी दुर्गा को वेश्या के रूप में दिखाने और महिषासुर व अफजल गुरु को शहीद बताने को कोई कैसे सहन कर सकता है। जेएनयू और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के मामलों में यह जांचना जरूरी है कि कहीं विश्वविद्यालयों के सीधे-साधे छात्र कहीं देश विरोधी ताकतों द्वारा इस्तेमाल तो नहीं हो रहे हैं।

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