21वीं सदी की अर्थव्यवस्था और मानव संसाधन विकास

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जगदीश चौधरी

(एक व्यंग) अर्थशास्त्री कहते हैं कि 21वीं सदी मानव संसाधन विकास की है इसमें मनुष्य सबसे ज्यादा खर्च अपने ऊपर करेगा।  अर्थ यह हुआ कि पहले घर में बचत करके, भूमि या सोना खरीद कर रखा जाता था परंतु अब वह अपने व्यक्तित्व विकास में खर्च करेगा। अब तो विद्यालयों की लाटरी निकलने की संभावना और भी ज्यादा बढ़ गई हैं क्योंकि अब शायद लोग और ज्यादा खर्च शिक्षा पर करेंगे क्योंकि इसको तो स्पष्ट रूप से मानव संसाधन विकास से जोड़ा गया है तो हमने भी विचार किया कि अब तो एक विद्यालय ही खोला जाए और मानव संसाधन के विकास के साथ हमारा भी विकास हो जाए।

हम तो रहे निपट अध्यापक इसलिए सीधा सीधा लगे हिसाब जोड़ने की एक विद्यालय हेतु कम से कम सरकारी मापदंड क्या होंगे और कितना खर्च आएगा। फिर यह पता लगाने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय गया। कई दिन की परिक्रमा के बाद पता चला की “सरकार की वेबसाइट पर जाकर यह सब देखो यहां क्यों तंग करने आ जाते हो, अब ऐसे लोग विद्यालय चलाएंगे।” एक क्लर्क जो मुझसे कम पढ़ा लिखा और विचारा किस्म का था वो मुझे मेरे बिचारे पन का एहसास कराता हुआ बोला।

फिर मालूम हुआ कि यदि वेबसाइट पर जितने नियम और उप नियम दिए हैं उनको समझने हेतु कोई अन्य डिग्री या डिप्लोमा करना पड़ेगा इससे तो अच्छा है किसी ऐसे व्यक्ति से मिले जो पहले से ही विद्यालय चलाता हो । अब कई विद्यालयों के चक्कर काटे। पहले समझते थे कि बच्चों के दाखिला हेतु हम परेशान रहते हैं परंतु अब पता चला कि विद्यालय प्रमुखों से सूचना पाना, की विद्यालय कैसे खोला जाए कुछ तोर- तरीके, नियम और रास्ते पता चल जाए तो हमारी भी चल निकले, ये ज्यादा मुश्किल है।

इसी आशा निराशा के बीच झूलता हुआ मैं एक पार्क में बैठा था एक सज्जन झूलते झूमते हुए आए और मेरे नजदीक बैठ गए। मैंने पढ़ा था पहले अनपढ़ आदमी के चेहरे से उसके मन का सब पता चल जाता था पर आजकल हम पढ़े लिखो के चेहरे से सब टपकता है। हम चाहे दूसरों को कितना बेवकूफ बनाने की कोशिश करें परंतु वास्तव में बन खुद ही रहे होते हैं।

वह बोला “साहब क्यूँ दुखी बैठे हो ? क्या परेशानी है” मैंने उसकी बात को अनसुना किया कि यह एक तो अनपढ़ सा आदमी और मैं पढ़ा लिखा, भला इस की बात क्यूँ सुनो और दूसरा मै शराबी-कबावियो के मुंह क्यूँ   लगूँ। वैसे मैं बता दूं कि आजकल शिक्षा में यह जरूर सीखते हैं कि जो अपने से ज्यादा चमकदार और शान शौकत वाला लगे उसकी बात ध्यान से सुनो और उसी को इज्जत दो बाकी सब तो यूं ही है मैंने भी इसी नियम का पालन किया और अपनी दुनिया में खोया रहा।

शायद वह कोई ज्यादा ही भला मानस था कि मेरी शक्ल से मन स्थिति भाँप गया और डटा रहा मुझसे बात करने को, और मानो वह परमात्मा ने भेजा मेरे कष्ट हरने को। बोला “साहब बता भी दो क्या परेशानी है” मेरी अकड़ भी जवाब देने लगी और अब मैं भी शिक्षित से मनुष्य बनने लगा क्योंकि मुझे पिछले 15 दिनों में इतनी आत्मीयता से बोलने वाला यह पहला व्यक्ति मिला। मैंने अपनी विपदा रखी “विद्यालय खोलना चाहता हूं , मानव संसाधन का विकास करूंगा अपना-सबका विकास साथ साथ करूंगा। लेकिन फिलहाल कर नहीं पा रहा हूं । विद्यालय खोलना तो दूर उसको ठीक से समझ भी नहीं पा रहा हूं।”

उसने कहा  “देखो जनाब सबसे पहले 2 एकड़ जमीन का इंतजाम करो । फिर ये-वो कम से कम 5 से 7 विभागों से एन.ओ.सी. प्रमाण पत्र हेतु चक्कर काटो। अगर बच जाओ तो कम से कम दो तीन करोड़ की इमारत खड़ी करो। फिर भी बच जाओ तो फिर फाइल शिक्षा विभाग में लगाओ। जो सामान और साधन जिसका शायद कभी उपयोग ना हो उनकी पहले से व्यवस्था करो। अब भी  बच जाओ तो रिहाईसी- गैर रिहाईसी, approved non approved लाल डोरा आदि को झेलो।

फिर भी यदि क्षमता रह जाए तो FD बनवानी पड़ेगी । अब फिर जो जो लोग आपके विद्यालय के निरीक्षण को आएंगे उनकी भगवान की तरह आरती करो, भोग लगाओ और चढ़ावा भी चढ़ाओ।  चाहै अब अपना सबकुछ ख़त्म करके बैंक के बाद सगे- मित्रों से उधार लो। फिर जब ऐसी स्थिति में आ जाओ की सांस निकलने वाली हो शायद विद्यालय शुरू कर सको”।। उनकी ज्ञानवाणी जारी रही ” फिर हर समय बच्चों के अभिभावक खड़े होंगे की इतनी फीस भी कहीं होती है ? आज बच्चे कुछ ज्यादा सीख कर नहीं आए। यूनिफॉर्म भी कैसी लगायी है ? , इस विद्यालय से तो वही अच्छा था। ये लोग पानी की व्यवस्था भी नहीं कर सकते?  

हमारे यहां तो बस भेजनी ही पड़ेगी चाहे एक ही बच्चे के लिए इंतजाम करो । ये किताबें कहां से ढूंढ कर लाए जो सिलेबस में लगाई । कम से कम 1 वेटिंग रूम तो बनवा दो। टीचर तो कुछ ढंग के ले आओ। उस विद्यालय में तो क्रिकेट एकेडमी भी खुली है यहां तो ऐसा कुछ है नहीं। आज छुट्टी क्यों की ? आज भी छुट्टी नहीं की ? हमें उन्होंने भेजा है फीस तो कम करनी पड़ेगी। उस विद्यालय की बिल्डिंग इससे सुंदर है । यहां तो कुछ भी नहीं।” उसकी बातें मेरे अंदर तक जा रही थी क्योकि यह सब कार्यालय प्रक्रिया का ट्रेलर पिछले 15 दिनों में देख चुका था और माता पिता का ऐसा व्यवहार तो पिछले 15 वर्षों से हर पी टी एम मे देख ही रहा हूं।

फिर उन सज्जन ने रोड के दूसरी ओर इशारा करते हुए कहा “देखो वहां कितनी रौनक है। अब शाम के 7:00 बजे हैं लेकिन अभी भी कितनी भीड़” मैंने देखा एक बोर्ड जिस पर लिखा था ठेका शराब, देशी व अंग्रेजी। मैंने कहा “इन शराब की दुकानों को यहां पार्क के पास एन.ओ.सी. कैसे मिल जाती है?” अब मैं उसके सामने बेचारा सा था उन्होंने सहजता से जवाब दिया “इनसे सभी ऑफिस वाले खुश हैं क्योंकि यह खूब खिलाता- पिलाता है । इसलिए जहां कहो वहां एन.ओ.सी. पाता है। रिहायशी क्षेत्र हो या गैर रिहायशी, औद्योगिक हो या शैक्षणिक । राजमार्ग हो या फिर जंगल ही क्यों न हो सभी जगह इनके लिए उपलब्ध हैं। और तो और ग्रीन बेल्ट में भी ले लो,  वह भी 4 दिन में तैयार । मैंने कहा “एन.जी.टी., न्यायालय, प्रशासन यह सब ? ।

” ये सब क्या बिना मनुष्यो का है” । उसने अब मेरी तरफ ज्यादा निरीह प्राणी की तरह व्यवहार करते हुए कहा। “इसमें ज्यादा खर्च होता नहीं, कम चलने का सवाल ही नहीं , जगह जो तुम्हें पसंद हो, किसी विभाग को तकलीफ नहीं। लोग तो तुम देखी रहे हो टूट कर पढ़ते हैं । इसमें (शराब) कमी निकालना तो दूर केवल खरीद पाए तो समझो उनकी साधना सफल।” फीश की तरह न तो रेट कम करवाएंगे न हीं सिफारिश लाएंगे, उधारी का कोई मतलब ही नहीं । किसी मौसम का असर नहीं । बाजार में तेजी तो इसमें भी तेजी बाजार में मंदी तो इसमें और ज्यादा तेजी। साल में केवल तीन छुट्टी, वो भी केवल सटर गिराने जैसी।

मैंने कहा 21वीं सदी में तो मनुष्य अपने ऊपर खर्च करेगा फिर इस रोजगार का भविष्य ? उन्होंने कहा “इससे ज्यादा सीधा सपाट कोई अपने ऊपर क्या खर्च करेगा?  इधर खरीदा उधर अपने ऊपर खर्च ।” अर्थशास्त्र की ऐसी व्याखया मैंने पहले न सोची थी और न ही सुनी। मुझे महसूस हुआ कि ज्ञान वाकई अनेक रूपों में प्रकट होता है ओर कहि से भी मिल सकता हैं। आज के परिपेक्ष्य में अच्छाई क्या है ओर बुराई क्या, इसे समझना भी आसान नही । सत्य को परेशान किया जा सकता है किन्तु पराजित नही। यह मेरा सायद वही वक़्त है। अब मेरी आंखों के आगे सारा आकाश ऐसे घूम रहा था जैसे मोहन राकेश ने घुमाया था। मैं दोबारा से सोचने लगा, 21 वी सदी और मानव संसाधन विकास की अर्थव्यवस्था।

(लेखक बालाजी महाविद्यालय के निर्देशक एवं  विश्व जल परिषद फ्रांस के सदस्य हैं)

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