एक झील जिसमे पानी की बजाय मिलता है कंकाल

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Uttarakhand/ Alive News : जब कभी भी हम समझते हैं कि प्रकृति के बारे में हम सब-कुछ जान गए हैं तभी प्रकृति हमारे समक्ष कुछ और गूढ़ रहस्य ला कर पटक देती है. जैसे बंजर में अनायास ही फूट पड़ने वाले जल के सोते का दिख जाना तो वहीं कई बार घोर सन्नाटे को चीर कर सुनाई पड़ने वाली चीखें.

इन्हीं रहस्यमयी चीजों के दिखने के क्रम में देवभूमि उत्तराखंड का रूपकुंड झील भी आता है. इस झील को स्थानीय लोग भुतहा कहते हैं और इस झील में आपको सिर्फ मानव कंकाल ही देखने को मिलेंगे.

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आखिर क्या है इसके पीछे का रहस्य ?
यह स्थान निर्जन है और हिमालय पर लगभग 5029 मीटर (16499 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है. इन कंकालों को 1942 में नंदा देवी शिकार आरक्षण रेंजर एच. के. माधवल ने दोबारा खोज निकाला. हालांकि इन हड्डियों के बारे में रिसर्च के अनुसार वे 19वीं सदी के उतरार्ध के हैं. इससे पहले विशेषज्ञों द्वारा यह माना जाता था कि इन लोगों की मौत महामारी, भूस्खलन या बर्फीले तूफान से हुई थी.

1960 के दशक में एकत्र सैम्पल्स की कार्बन डेटिंग ने अस्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि वे लोग 12वीं सदी से 15वीं सदी तक के बीच के थे. इस हिसाब से यह कंकाल लगभग 900 साल पुराने हैं. स्थानीय लोग इसके पीछे नंदा देवी के प्रकोप बड़ी वजह मानते हैं.

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क्या है ऑक्सफोर्ड का निष्कर्ष ?
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय रेडियोकार्बन प्रवर्धक यूनिट में हड्डियों की रेडियोकार्बन डेटिंग के अनुसार इनकी अवधि 850 ई. में निर्धारित की गयी है. यह अनुमान 30 वर्षों तक ऊपर-नीचे हो सकता है.

खोपड़ियों के फ्रैक्चर के अध्ययन के बाद, हैदराबाद, पुणे और लंदन में वैज्ञानिकों ने यह निर्धारित किया कि लोग बीमारी से नहीं बल्कि अचानक से आये ओला आंधी से मरे थे. और बाद के दिनों में उस क्षेत्र में आए भूस्खलन के साथ कुछ लाशें झील में बह गईं.

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आज यह कुंड तीर्थ भी है…
अब तक इस बात का निर्धारण नहीं किया जा सका है कि यहां पाए जाने वाले नरकंकालों का समूह तब कहां जा रहा था, लेकिन रूपकुंड, नंदा देवी पंथ की महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा के मार्ग पर स्थित है जहां नंदा देवी राज जाट उत्सव लगभग प्रति 12 वर्षों में एक बार मनाया जाता था.

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