आसान नहीं है अव्यवस्था से जुड़़ा कचरा मुक्ति का सवाल

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ज्ञानेन्द्र रावत

बीते दिनों दिल्ली के राजभवन में पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण व निवारण प्राधिकरण की बैठक की अध्यक्षता करते हुए दिल्ली के उपराज्यपाल श्री अनिल बैजल ने दिल्ली में कूड़े की विकराल होती जा रही समस्या पर गहरी चिंता व्यक्त की और इस बाबत सम्बंधित विभागों को प्लास्टिक कचरा जलाने व कूडा फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई करने के आदेश दिये। साथ ही प्रदूषण उत्र्सजन से निपटने के लिए सूक्ष्म स्तर पर अलग नीति बनाने का निर्देश भी दिया। गौरतलब है कि इस बैठक में ईपीसीए के चेयरमैन डा. भूरेलाल, दिल्ली के वन एवं पर्यावरण मंत्री इमरान हुसैन, पर्यावरणविद सुनीता नारायण, मुख्य सचिव, पर्यावरण सचिव सहित निगमायुक्त, दिल्ली पुलिस के विशेष आयुक्त ट्रेफिक, दिल्ली पुलिस और डीपीसीसी के आला अधिकारी मौजूद थे। बैठक में वायु प्रदूषण की समस्या के साथ औद्योगिक रबड़ व प्लास्टिक अपशिष्टों का निपटारे व कूड़ा जलाने की ििस्थ्त की समीक्षा की गई और कहा गया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की एक व्यापक नीति तैयार की जा रही है। दरअसल इस तरह की बैठकों का आयोजन कोई नयी बात नहीं है। इनमें आदेश भी जारी होते हैं, योजनाएं भी पेश की जाती हैं लेकिन उनका किस सीमा तक क्रियान्वयन होता है, इसकी हकीकत किसी से छिपी नहीं है। समस्या की विकरालता इसका जीता-जागता सबूत है। सरकार की नाकामी का इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस बाबत हमारी सरकारें दूसरे देशों से कुछ सीखना ही नहीं चाहतीं। इंडोनेशिया का उदाहरण हमारी सरकारों की आंखें खोलने के लिए काफी है। इंडोनेशिया में ताड़ के पेड़ों से घिरा रहने वाला बाली का समुद्री तट समुद्र में सर्फिंग और तट पर धूप सेंकने के शौकीन पर्यटकों के लिए लंबे समय से आकर्षण का केन्द्र रहा है। इंडोनेशिया संयुक्त राष्ट्रसंघ के पर्यावरण की ’’क्लीन सी मुहिम’’ में शामिल 40 देशों के संगठन में शामिल है। इस मुहिम का एकमात्र लक्ष्य समुद्र को दूषित करने वाले प्लास्टिक के कचरे से मुक्ति दिलाना है। बाली द्वीपों के लिए मशहूर दुनिया के पर्यटकों की पहली पंसद के रूप में जाना जाता है। 17 हजार से अधिक द्वीपों का यह द्वीपसमूह समुद्री कचरा पैदा करने वाले देशों में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। कारण यहां पर सालाना 12.9 लाख टन कचरा पैदा होता है। 2017 में इससे वहां यह समस्या इतनी विकराल हो गई कि बाली में जिमबारन, कुटा और सेमियांक जैसे लोकप्रिय विख्यात समुद्री तटों सहित तकरीब छह किलोमीटर लम्बे समुद्र तट पर फैले कचरे के कारण प्रशासन को आपात स्थिति की घोषणा करने को बाध्य होना पड़ा। अधिकारियों को रोजाना तकरीबन 100 टन कचरे को पास के लैंडफिल तक ले जाने के लिए 700 सफाईकर्मियों और 35 ट्रकों को तैनात करना पड़ा। बाली की घटना से साफ जाहिर है कि कचरे की समस्या व्यवस्था से जुड़ी है। जरूरी है इसके प्रति सरकार की संवेदनशीलता और इसके निपटारे के लिए प्रबल इच्छाशक्ति। यह किसी भी समस्या के निदान की दिशा में बेहद जरूरी है। यह काम कर दिखाया इंडोनेशियाई सरकार ने। इसके लिए उसकी कितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है।
 हमारी सरकारें दावे तो बहुत करती हैं लेकिन किसी दूसरे से कुछ सीखना नहीं चाहती। 2017 की घटना देश की राजधानी दिल्ली के गाजीपुर की ही है जहां कूड़े के पहाड़ गिरने से एक बड़ा हादसा हुआ जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। हादसे के बाद कहा गया कि अब कूड़े-कचरे की समस्या राजधानी में विकराल हो चुकी है। इसलिए अब इसका निस्तारण करना ही होगा। कुछ समय के लिए गाजीपुर लैण्डफिल साइट पर कूड़ा डालने पर रोक लगा दी गई। कूड़े को अन्यत्र डालने पर काफी दिनों तक माथापच्ची की गई। एनजीटी ने इस मामले में सरकार और निगमों की उनकी लापरवाही के लिए काफी खिंचाई की। दिल्ली हाईकोर्ट तक ने दिल्ली के उपराज्यपाल श्री अनिल बैजल से कूड़े के निस्तारण के लिए बनी नीति को तीन सप्ताह में लागू करने के निर्देश दिये। साथ ही हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि इस समस्या से निपटने के लिए एक ठोस कानून की जरूरत है ताकि कूड़ा फैलाने वालों से अधिक जुर्माना वसूलने के लिए कानून में भी संशोधन किया जा सके। विडम्बना यह कि अभी तक कचरा प्रबंधन के मामले में दावों के अलावा कुछ कारगर कदम उठाया गया हो, ऐसा दिखाई नहीं देता। कूड़े के निस्तारण और प्रबंधन के बारे में निश्चित कार्ययोजना का पूरी तरह अभाव है। सुप्रीम कोर्ट तक ने दिल्ली सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि वे ठोस कचरे के प्रबंधन के मामले पर गंभीर नहीं हैं। ऐसा लगता है कि इस सम्बंध में कार्यवाही और उचित कदम उठाने के प्रति अधिकारियों में इच्छाशक्ति का अभाव है। यह पूरे देश के लिए एक गंभीर समस्या है। हम अपेक्षा करते हैं कि दिल्ली में ठोस कचरे के प्रबंधन के बारे में एक निश्चित कार्ययोजना और रणनीति तैयार की जायेगी ताकि इसे देश के दूसरे राज्यों में भी अपनाया जा सके।
इससे अकेले दिल्लीवासी ही नहीं, समीपस्थ जिले गाजियाबाद के वाशिंदे तक प्रभावित हो रहे हैं। दिन की बात तो दीगर है, रात में भी आस-पास के सोसाइटियों के वाशिंदों का इसकी बदबू से जीना दूभर हो गया है। उन्हें सांस की बीमारियों, फेफड़ों, आंख, लिवर, दमा, ब्रोंकाइटिस और टीबी जैसी बीमारियों से जूझना पड़ रहा है। सबसे अधिक इसकी मार पांच साल तक के बच्चों को झेलनी पड़ रही है। कूड़े से बच्चे डायरिया, पेट में इन्फैक्शन और कालरा जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। गाजीपुर स्थित कचरे के पहाड़ के आसपास रहने वाले लोगों को दूषित हवा के कारण आये-दिन कूड़ा जलने से सीने व गले में संक्रमण, आंखों में जलन और कई गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। बदबू के कारण लोगों का सांस लेना दूभर हो जाता है, उनका दम फूलने लगता है, उनकी आंखें में जलन होती रहती है। यह लोगों की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण कर देता है। ऐसी स्थिति में बीमारियां लोगों को तेजी से अपनी जकड़ में ले लेती हैं। असल में लैंडफिल साइट पर हर तरह का कूड़ा -कचरा फैंका जाता है जिसके चलते हवा में कई तरह के विषैले कीटाणु मौजूद रहते हैं। यही स्थिति गाजियाबाद के इंदिरापुरम में अभयखण्ड स्थित एक बहुत बड़े प्लाट पर अवैध तरीके से बने डम्पिंग ग्राउण्ड की है। इस बाबत प्रशासन का मौन समझ से परे है। यहां एनजीटी के आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। मोहन नगर व वसुन्धरा में खुले आसमान के नीचे कूड़ा, बेहटा हाजीपुर गांव की मौलाना आजाद, शिव वाटिका, संगम विहार आदि में तार जलाकर तांबा, एल्यूमिनियम   निकालने का कारोबार धड़ल्ले से जारी है जिसे रोक पाने में प्रशासन खुद को अक्षम पा रहा है। इससे समीपस्थ इलाके के लोगों में सांस, टीबी जैसी बीमारियों की चपेट में आने का खतरा बना हुआ है। जरूरत है कि यहां के लोगों की लगातार स्वास्थ्य सम्बंधी जांच की जाये लेकिन इस पर किसी का कोई ध्यान ही नहीं है। जबकि इस बारे में इंडियन मेडिकल काउंसिल भी चेता चुका है।
देखा जाये तो कूड़े के मामले में हमारे विकल्प बहुत ही सीमित हैं। ऐसी स्थिति में कूड़ा-कचरा निपटान बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। देश में एक साल में कुल 44 लाख टन कूड़ा-कचरा हर साल निकलता है। इसमें 22 फीसदी अकेले घरेलू गंदगी होती है और 50 फीसदी से अधिक कागज, पु_ा या लकड़ी आदि होती है। सरकार मानती है कि देश के कुल कूड़े-कचरे का केवल पांच फीसदी का ही वह निपटान करने में सक्षम है। उसकी मानें तो इतनी बड़ी तादाद में कूड़े-कचरे को एक जगह इक_ा करना व उसे दूसरी जगह ढोकर ले जाना दुरूह काम है। राजधानी दिल्ली में ही रोजाना तकरीब सात हजार मीट्र्कि टन कूड़ा-कचरा निकल रहा है। जबकि इसका 57 फीसदी कूड़ा-कचरा यमुना में बहा दिया जाता है। यह स्थिति तब है जबकि इसमें से अधिकांशत: प्लास्टिक, कागज, गत्ते के टुकड़े, धातु आदि को कचरा बीनने वाले निकालकर बेच देते हैं। शेष तकरीब तीस फीसदी कूड़े-कचरे का निपटान कर पाने में दिल्ली के तीन-तीन निगम अपने को असमर्थ पा रहे हैं। कहने को दिल्ली में पॉलीथिन पर बंदिश है। लेकिन वह केवल दिखावा है और आज भी बेरोकटोक 585 टन के करीब प्लास्टिक कचरा रोजाना निकल रहा है। इसमें मेडीकल और इलैक्ट्र्ॉनिक कचरा प्रदूषण में और जहर घोल रहा है। यह पानी को प्रदूषित करने में अहम् भूमिका निबाह रहा है।
यह तय है अलग-अलग तरीकों से इसे बढ़ाने में समाज की बहुत बड़ी भूमिका है लेकिन इसके निपटान की व्यवस्था का दायित्व तो सरकार पर ही है। यह सच है कि 2021 तक दिल्ली के कूड़े की मात्रा 16 हजार मीट्रिक टन हो जायेगी जिसकी आशंका सरकार को पहले से ही है। इसलिए इस मामले में सरकार की नाकामी को दरगुजर नहीं किया जा सकता। यह अकेले देश की राजधानी की बदहाल तस्वीर है, पूरे देश की हालत क्या होगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन यह तय है कि कूड़े-कचरे के ढेरों के चलते लोग जानलेवा बीमारियों की चपेट में आकर अनचाहे मौत के मुंह में जाते रहेंगे। इसको झुठलाया नहीं जा सकता।
                                                                     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् हैं)

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