आर्सेनिक घुला जहरीला पानी पीने को मजबूर देशवासी

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ज्ञानेंद्र रावत

देश में अभी जून का महीना शुरू भी नहीं हुआ है कि गर्मी ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इसी के साथ देश में जल संकट गहराने लगा है। देश के अधिकांश हिस्सों में पीने का साफ पानी मिलना सपना हो गया है। लोग प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। जो पानी पीने को मिल भी रहा है, उसमें आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानकों से कहीं ज्यादा है। इससे गंभीर जानलेवा बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। देश की अधिकांश आबादी स्थानीय निकायों द्वारा पीने के साफ पानी की समुचित मात्रा में आपूर्ति नहीं किये जाने के कारण भूजल पर ही आश्रित है। वह जैसे तैसे हैण्डपंपों, सबमर्सिबिल पंपों और कुओं के द्वारा ही पीने के पानी की अपनी जरूरत पूरी कर रहे हैुं।

लेकिन पानी में आर्सेनिक घुला होने के कारण त्वचा, फेफड़े और मूत्राशय व अन्य अंगों के कैंसर, त्वचा का फटना, केरोटोइस और नाड़ी सम्बंधित, संतानोत्पत्ति से सम्बंधित जैसी जानलेवा बीमारी की चपेट में आकर अनचाहे मौत के मुंह में जा रहे हैं। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश के 23.9 करोड़ लोग आर्सेनिक युक्त पानी को मजबूर हैं। देश की आबादी का 19 फीसदी हिस्सा खतरनाक स्तर तक आर्सेनिक की मौजूदगी वाला पानी पी रहा है। असलियत यह है कि देश के 153 जिलों के लोग आर्सेनिक युक्त पानी पीने की समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के वैज्ञानिक आर पी सिंह ने अपने एक शोध में इस तथ्य का खुलासा करते हुए कहा है कि आर्सेनिक एक भारी वस्तु है। यह हमेशा सतह की ओर पाया जाता है। घटते भूगर्भीय जल के चलते, खेती में उपयोग में आ रहे रसायन और कारखानों से निकला रसायनयुक्त अपशेष आर्सेनिक की प्रमुख वजह है। यही नहीं कुछ नदियां ऐसे इलाकों और पहाड़ों से होकर गुजरती हैं जहां पर आर्सेनिक तत्व भारी मात्रा में मौजूद रहते हैं। अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान के ऑन्क्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एम. डी. रे इस बारे में कहते हैं कि शरीर में आर्सेनिक की मामूली मात्रा भी यदि लम्बे समय तक रहती है तो कैंसर होने की संभावना कई गुणा तक बढ़ जाती है।

यदि पानी में खतरनाक आर्सेनिक तत्व मौजूद हैं तो फिर यह गंभीर चिंता का विषय है। आर्सेनिक मानव शरीर पर जहरीला असर डालता है। आर्सेनिक पाइजनिंग को चिकित्सकीय भाषा में आर्सिनिकोसिस कहते हैं। यह शरीर में आवश्यक एंजाइंम्स पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ता है। इसकी वजह से शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते हैं। नतीजतन रोगी की मौत हो जाती है। देश में पानी में आर्सेनिक की मात्रा की खतरनाक स्तर तक मौजूदगी का दावा करने वाले वैज्ञानिक डा. आर. पी. सिंह का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के मुताबिक पानी में आर्सेनिक की मात्रा 10 से 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक सुरक्षित होती है।

हमारे देश में 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर को सुरक्षित माना गया है। उनके अनुसार जब मानकों की जांच के लिए 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर आर्सेनिक वाले पानी को एक महीने तक स्वस्थ कोशिकाओं के संपर्क में रखा गया तो उसमें से कुछ रोगग्रस्त हो गईं। पानी में आर्सेनिक की मात्रा को डब्ल्यूएचओ के सबसे कम मानक को शोध में शामिल किया गया। असलियत में हमारे देश में उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, असम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, अरूणाचल और पश्चिम बंगाल में इससे पांच गुणा तक अधिक मात्रा में लोग आर्सेनिक मिला पानी पी रहे हैं। बीते दिनों ग्लोबल जर्नल साइंस में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है कि पाकिस्तानी पंजाब और उसके आस-पास के 60 लाख लोगों पर आर्सेनिक युक्त पानी पीने से कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।

इस बारे में शोध करने वाली संस्था ’’ स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ इक्वॉटिक साइंस एण्ड टेक्नालॉजी’’ ने चेताया है कि इससे भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी खतरा बढ़ गया है। इसके चलते पंजाब के अमृतसर, तरनतारण, कपूरथला, रोपड़, मनसा, फरीदकोट और मोगा जिले में कैंसर केे प्रभावित लोगों की तादाद बहुत ज्यादा पायी गई है। यह चिंता की बात है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड यह स्वीकार करता है कि खेती में अत्याधिक उर्वरकों के इस्तेमाल ने तस्वीर बिगाडऩे में प्रमुख भूमिका निबाही है। पानी में घुला आर्सेनिक ही नहीं, नाइटर््ेट और कॉपर भी जानलेवा बीमारियों को जन्म दे रहा है। पीने के पानी में नाइटर््ेटों की बढ़ी हुई मात्रा के कारण देश के तकरीब 23 करोड़ से ज्यादा लोगों पर पेट के कैंसर, स्नायु तंत्र और दिल की बीमारियों की तलवार लटक रही है। इसके अलावा नाइटर््ेट का जहर बच्चों में मृत्युकारी ब्लू बेबी सिंर्डेम जैसी बीमारियों को जन्म दे सकता है।

इस बीमारी में चार वर्ष तक की आयु के बच्चों के पेट, होंठ व शरीर का रंग नीला पडऩे लगता है। यह स्थिति तब आती है जब रोगी के पेट में मौजूद नाइटर््ेट नाइर्टइट में बदल जाता है और वह खून में हीमोग्लाबिन से क्रिया कर उसकी ऑक्सीजन परिवहन क्षमता को पूरी तरह खत्म कर देता है। ऐसी स्थिति में रोगी को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और अंतत: वह दम तोड़ देता है। यही नहीं पानी में घुला कॉपर महिलाओं का लिवर खराब कर रहा है। गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मंडीकल कालेज, कानपुर के शोध से यह तथ्य सामने आया है।

इस शोध में खुलासा हुआ है कि हैंडपंप का पानी इस्तेमाल करने वाली 20 से 30 साल की उम्र की अधिकतर महिलाओं में इसके लक्षण पाये गए। परीक्षण में पाया गया कि हैंडपंप के पानी में अधिकांश मात्रा में कॉपर और मेटल था जो लिवर खराब होने का कारण बना। सरकार दावे कुछ भी करे जब देश के तकरीब नौ राज्यों की 13,958 बस्तियां प्रदूषित भूजल के इस्तेमाल को विवश हैं, उस स्थिति में हालात की भयावहता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। असलियत यह है कि जबतक देश में लोगों को पीने का साफ और शुद्ध पानी नहीं मिलता, इन बीमारियों से निजात मिलने की उम्मीद बेमानी ही है।           (लेखक एक पर्यावरणविद् एवं वरिष्ठ पत्रकार है)

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