अटल, तुम्हे एक बार और आना होगा

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New Delhi/Alive News : राजनीति का मतलब सिर्फ सत्ता की शक्ति हासिल करना नहीं होता, बल्कि अपने व्यक्तिगत सामर्थ्य से उसका लोक समृद्धि का मूल मकसद हासिल करना होता है – अटल बिहारी वाजपेयी न सिर्फ इसकी मिसाल हैं, बल्कि बेमिसाल भी हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी शख्सियत ऐसी बनायी जो कभी प्रधानमंत्री पद की मोहताज नहीं रही. इस बात का एहसास वाजपेयी ने तब भी कराया जब पहली बार प्रधानमंत्री बने और बाद में भी – 2004 में एनडीए की चुनाव हार को भी वाजपेयी ने ‘भारत की जीत’ बताया था.

जवाहरलाल नेहरू से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक जिस किसी भी प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ की बात पर गौर फरमाया जाये तो किसी न किसी बात पर आम राय यही बनती है – वाजपेयी जैसा कोई नहीं!

और यही वजह है कि लंबे अरसे तक विपक्ष के नेता, अरसे तक के एकांतवास में भी रहे वाजपेयी देश की राजनीति के प्रसंग-पटल से कभी ओझल नहीं हुए – क्योंकि हर एक दौर में वाजपेयी का होना जरूरी होता है!

आलोचना राजनीतिक होती है, व्यक्तिगत नहीं
राजनीति में एक खास मुकाम हासिल कर लेने के बाद से अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा ही उस ठीहे पर विराजमान रहे जहां से हर कोई उन्हें बराबर नजर आता. ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनके प्रति सिर्फ उनकी विचारधारा के लोगों की सम्माननीय भावना रही, बल्कि अलग नजरिये वालों ने भी वाजपेयी को कभी अलग नहीं समझा.

बीजेपी से इतर भी कई नेता हर साल 25 दिसंबर को उनके जन्म दिन पर बधाई देने पहुंचा करते और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम भी उनमें शामिल है. ये सिलसिला तब शुरू हुआ जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री हुआ करते थे. वाजपेयी की सोच विशाल ही नहीं व्यापक रही और यही वजह थी कि उनकी बातों का बेजोड़ असर हुआ करता था. ऐसा ही एक वाकया मनमोहन सिंह के साथ भी हुआ.

दुष्यंत कुमार की एक लाइन है – ‘मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.’ कविहृदय वाजपेयी ने तब मनमोहन सिंह को आलोचना का फर्क समझाया. हर आलोचना व्यक्तिगत नहीं होती और राजनीतिक आलोचना को दिल पर नहीं लेते. हां, दिमाग से कभी उतरने भी नहीं देना चाहिये.

बात 1991 की है. तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने वाजपेयी को फोन किया और बताया कि बजट की उन्होंने इतनी सख्त आलोचना की है कि उनके वित्त मंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह इस्तीफा देने के बारे में सोचने लगे हैं.

वाजपेयी ने फौरन डॉक्टर मनमोहन सिंह से संपर्क किया और मुलाकात होने पर समझाया कि कि आलोचना को व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना चाहिए. वाजयेपी ने समझाया कि बजट पर उन्होंने जो कुछ कहा वो क राजनीतिक भाषण था.

विरोध के मामले में हमेशा अटल रहे वाजपेयी
जब इंदिरा गांधी ने पेट्रोल और डीजल की कीमत में 80 फीसदी का इजाफा किया तो अटल बिहारी वाजपेयी ने विरोध का अनोखा रास्ता अख्तियार किया. 12 नवंबर 1973 को वाजपेयी बैलगाड़ी पर सवार होकर संसद भवन पहुंचे थे. वाजपेयी के साथ दो और लोग भी बैलगाड़ी पर बैठे हुए थे. वाजपेयी की पहल का सपोर्ट करते हुए कई नेता साइकिल से भी संसद पहुंचे थे. हालांकि, पेट्रोल बचाने का संदेश देने के लिए इंदिरा गांधी भी उन दिनों बग्घी से चलने लगी थीं.

पाकिस्तान से जंग में जीत के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को दुर्गा की संज्ञा दी थी तो, एक वही थे जो इंदिरा गांधी को माकूल जवाब देने का साहस रखते थे. संसद का ही एक वाकया है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वाजपेयी के बारे में कहा था कि वो हिटलर की तरह भाषण देते हैं और हाथ लहरा लहरा कर अपनी बात रखते हैं.

बाद में सेंस ऑफ ह्यूमर से भरपूर अटल बिहारी वाजपेयी की टिप्पणी थी, ‘इंदिरा जी हाथ हिलाकर तो सभी भाषण देते हैं, क्या कभी आपने किसी को पैर हिलाकर भाषण देते हुए भी सुना है?’

यहां तक कि जवाहर लाल नेहरू भी वाजपेयी के टैलेंट के कायल थे. भारत दौरे पर आये ब्रिटेन के प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए नेहरू ने कहा था, “इनसे मिलिये. ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं. हमेशा मेरी आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूं.”

आपको कश्मीर, हमें पाकिस्तान चाहिए – ‘मंजूर है?’
वाजपेयी की विराट स्वीकार्यता का एक वाकया पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के शासनकाल से जुड़ा है. 27 फरवरी 1994 को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में OIC के जरिये प्रस्ताव रख कर जम्मू-कश्मीर के नाम पर भारत को घेरने की कोशिश की. अगर प्रस्ताव पास हो जाता तो भारत के लिए मुश्किलें बढ़ जातीं.

राव की तो वैसे भी चुनौतियों से घिरी सरकार रही और मुसीबतें कौन मोल ले. राव ने जिस टीम को जेनेवा भेजा उसमें खास तौर पर विपक्ष के नेता वाजपेयी को भेजा. टीम में तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, ई. अहमद, फारूक अब्दुल्ला और हामिद अंसारी थे तो जरूर लेकिन राव को ज्यादा भरोसा वाजपेयी पर ही था. बात देश की थी, सत्ता पक्ष और विपक्ष की राजनीति से बहुत ऊपर. वाजपेयी के राजनैतिक तौर पर दुरूस्त कूटनीतिक जाल में पाकिस्तान ऐसा उलझा कि बगलें झांकने लगा.

पाकिस्तान को घेरते हुए अटल बिहारी वाजपेयी बोले, “आपका कहना है कि कश्मीर के बगैर पाकिस्तान अधूरा है, तो हमारा मानना है कि पाकिस्तान के बगैर हिंदुस्तान अधूरा है, बोलिये, दुनिया में कौन पूरा है? पूरा तो केवल ब्रह्मा जी ही हैं, बाकी सबके सब अधूरे हैं. आपको पूरा कश्मीर चाहिए, तो हमें पूरा पाकिस्तान चाहिए, बोलिये क्या मंजूर है?

बरसों बाद न्यूयॉर्क में वाजपेयी और तब के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ बात कर थे. कुछ ही देर बाद नवाज संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने वाले थे. बातचीत के बीच ही नवाज शरीफ को बुलावे का मैसेज आ गया.

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