भूस्खलन का कारण है प्रकृति में मानवीय दखलंदाजी

0
50
ज्ञानेन्द्र रावत

भूस्खलन एक ऐसी आपदा है जिसका सामना कमोबेश हर मौसम में करना पड़ता है। इससे जहां मिनटों में सैकड़ों जिंदगियां तबाह हो जाती हैं, गांव बह जाते हैं, मकान ध्वस्त हो जाते हैं, लोग सोते-सोते मौत के मुंह में चले जाते हैं, कुछ मवेशी मकानों के गिरने से दब जाते हैं और कुछ भारी बारिश से पानी के तेज बहाव में मलबे के साथ बह जाते हैं।

भूस्खलन से जहां रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं, इसके कारण भारी बारिश से नदियों में जलस्तर में हुई बढ़ोतरी और पानी के मलबे के साथ सडक़ों-हाईवे पर बहने से यात्रियों को कई-कई दिनों तक रास्ते ठीक होने तक भूख-प्यास से बेहाल होकर अनेकों दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है, ट्रेनों का आवागमन अवरुद्ध होता है, वहीं सडक़ों पर पत्थरों के गिरने के चलते कभी-कभी अवरुद्ध रास्तों को खोलने में कई-कई दिन लग जाते हैं, नतीजतन यातायात तो प्रभावित होता ही है, जन-धन की हानि होती है, शिक्षण संस्थानों को बंद करना पड़ता है और दैनिक उपयोगी वस्तुओं खासकर खाने-पीने की वस्तुओं की आपूर्ति भी अत्याधिक रूप से प्रभावित होती है।

यह स्थिति कभी-कभी तो हफ्ते दो हफ्ते तक रहती है। यही नहीं इससे घरोहरों पर भी खतरा पैदा हो जाता है। इसके चलते स्थानीय प्रशासन द्वारा हालात पर काबू पाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। आपदा मोचन बल दुर्गम पर्वतीय स्थानों पर तात्कालिक राहत पहुंचाने में त्वरित कार्यवाही कर अपनी भूमिका का निर्वहन करता है, उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है। हमारे देश के पहाड़ी अंचलों में अक्सर जहां तीर्थ यात्राएं होती ही रहती हैं, वहां भूस्खलन के चलते यात्राओं का बाधित होना आम बात है।

असलियत में भूस्खलन की घटनाएं अक्सर पहाड़ी इलाकों में ज्यादा देखने में आती हैं। वैज्ञानिक शोध प्रमाण हैं कि इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण है, वह है जंगलों में लगने वाली आग, वह चाहे प्रकृति प्रदत्त कारणों से लगी हो या फिर मानवीय दखलंदाजी के कारण। सबसे बड़ी बात यह है कि गर्मियों के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों में लगने वाली आग से वनस्पति, जैवविविधता और पर्यावरण को तो बड़े पैमाने पर नुकसान होता ही है, बारिश के मौसम में भूस्खलन का भी वह अहम् कारण बनती है। देखा जाये तो इसके लिए मानवीय गतिविधियां ही प्रमुख रूप से जिम्मेवार हैं। इस सच्चाई को दरगुजर नहीं किया जा सकता। इसमें करोड़ों की राशि का हर साल नुकसान होता है।

इस बारे में शूलिनी यूनीवर्सिटी, सोलन, हिमाचल प्रदेश में पांच साल तक किये गए शोध में जो खुलासा किया गया है, वह इस बात को प्रमाणित करता है कि भूस्खलन के पीछे जंगलों में लगी आग एक अहम् कारण है। शोधकत्र्ता प्रो. डा. अदेश सैनी जिन्होंने पांच साल चले इस शोध के उपरांत निष्कर्ष निकाला कि पेड़ों की जड़ें जमीन पर अपनी पकड़ बनाये रखती हैं। अक्सर होता यह है कि किसान और बागवान जंगल में उपजी खरपतवार और झाडिय़ों के खात्मे के लिए जंगलों में, खेतों में और मैदानों में आग लगा देते हैं, बिना यह जाने-समझे कि उन्हें इसकी कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसके परिणाम स्वरूप न केवल जैवविविधता, वनस्पति और पर्यावरण की जो हानि होगी, उसकी भरपायी होना असंभव है। क्योंकि वह अपनी इस कारगुजारी के दुष्परिणामों से परिचित ही नहीं हैं।

इसमें दो राय नहीं कि हमारे देश में हर साल तकरीबन 49 हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र आग लगने से बर्बाद हो जाता है। पूरे देश में हर साल आग से जलकर बर्बाद होने वाला वनक्षेत्र देश के एक राज्य हरियाणा के कुल क्षेत्रफल से भी ज्यादा है। मौजूदा दौर में स्थिति यह हो गई है कि जंगलों में आग की घटनाएं अब आम तो हो ही गई हैं, देशव्यापी हो चुकी हैं। कोई राज्य और जिला अब ऐसा नहीं बचा है जहां आग लगने की घटनाएं न होती हों। आग लगने की घटनाएं सबसे ज्यादा देश के 20 जिलों में पाई गई हैं। इनमें 19 जिले तो पूर्वोत्तर के ही हैं एवं एक जिला महाराष्ट्र का शामिल है। वनक्षेत्र में आग लगने की 44 फीसदी घटनाएं तो इन 20 जिलों में ही होती हैं जबकि इन जिलों में देश के कुल वनक्षेत्र का केवल 16 फीसदी ही वनक्षेत्र है। इसका खुलासा तो हमारे केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री डा. हर्षबर्धन खुद बीते दिनों वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और विश्व बैंक द्वारा तैयार रिपोर्ट में कर चुके हैं। यह खतरनाक संकेत है। जरूरत है इस बारे में तत्काल कदम उठाये जायें।

अक्सर होता यह है कि जब जंगल में आग लगती है तब पेड़-पौधे सूख जाते हैं। नतीजतन पेड़-पौधों की जड़ें कमजोर पड़ जाती है। इससे जमीन टूट जाती है। छोटी-छोटी पहाडिय़ां ही नहीं, बड़ी-बड़ी पहाडिय़ां भी खिसक जाती हैं। पहाडिय़ों के खिसकने की घटनाएं हीं भूस्खलन का कारण बनती हैं। कभी-कभी ये घटनाएं बड़ी आपदा का रूप धारण कर लेती हैं जो जान-माल के साथ-साथ करोड़ों-अरबों की राशि और सम्पत्ति के नुकसान का कारण बनती हैं। डा. सैनी के अनुसार इसके वैज्ञानिक परीक्षण प्रमाण हैं कि यदि पहाड़ों पर हरियाली बरकरार रहे तो पहाड़ कभी ना गिरे। यह प्रमाण है कि पर्यावरण की अनदेखी कर विकास के लिए पहाड़ों से हम जिस कदर निर्दयतापूर्वक पेड़ों का खात्मा कर रहे हैं, पहाड़ों को हरियाली से महरूम कर रहे हैं, भूस्खलन उसका ज्वलंत प्रमाण है। यह भी एक कटु सच्चाई है कि जंगलों के विनाश से कृषि-बागवानी में कीटनाशकों और यूरिया के इस्तेमाल में बेहद इजाफा हुआ है। वनों के रहने से जीवाश्म खेतों तक पहुंचते हैं। लेकिन जंगलों के खात्मे के चलते वह प्रक्रिया भी खत्म हो जाती है और जीवाश्म भी खत्म हो जाते हैं।

इस विनाश के लिए 90 फीसदी तो हम खुद ही जिम्मेदार हैं। इसके लिए किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। असलियत में हम वनों की आग में जीवाश्म के जलने से होने वाली हानि के बारे में अनजान हैं। जब फसलों के सहयोगी जीवाश्म आग से जल जाते हैं, तो उस हालत में उन्हें दोबारा उसी स्थिति में लाने में चार साल तक का समय लग जाता है। कई सालों से काम कर रहे जीवाश्म फसलों की गुणवत्ता और उपज की मात्रा को बनाये रखने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यही बात खेतों पर भी लागू होती है। इसको उन्होंने आग के बाद घासनियों की गुणवत्ता पर होने वाले बदलाव पर शोध के जरिये साबित किया। उन्होंने बताया कि हमने आग से प्रभावित वन और दूसरे सामान्य क्षेत्र चिन्हित किये। दोनों ही स्थानों से उन्होंने घास पैदा होने में मददगार सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित किये। शोध में उन्होंने पाया कि जिन स्थानों में चार साल से आग लगने की घटना नहीं हुई, उन जीवाश्मों ने बेहतर उत्पादन किया और जिन स्थानों पर आग की घटनाएं हुई, जहां जीवाश्म जल गया , वहां नहीं। वहीं भूस्खलन की घटनाएं भी बढ़ीं हैं।

इस बारे में एक अन्य वनस्पति वैज्ञानिक डा. के. एस. वर्मा जो नौणी यूनीवर्सिटी के जाने-माने वनस्पति वैज्ञानिक हैं, का कहना है कि भूस्खलन के और भी कारण हैं। लेकिन आग प्रमुख कारण है। जब पहाड़ के जंगल में आग लगती है तो वहां हरियाली तो खत्म हो जाती है। इससे जमीन पर पकड़ कम हो जाती है। बारिश होने के बाद जब धूप निकलती है तो पहाड़ फटने लगता है। पहाड़ के फटने की स्थिति में भूस्खलन होता है जो तबाही का कारण बनता है। पानी का रिसाव भी एक अहम् कारण है। पहाड़ों पर पानी के स्रोत भी इसमें अहम् भूमिका निभाते हैं। जहां-जहां पत्थरों के ढेर पर पहाडिय़ां टिकी हैं, अटकी हुई हैं, वहां से अक्सर जरा सी हलचल भूस्खलन का कारण बनती है। भूस्खलन की घटनाएं बारिश में ही नहीं, गर्मियों और सर्दियों में भी होती हैं।

यहां यह जान लेना बेहद जरूरी है कि डा. सैनी जो हिमाचल प्रदेश में सोलन स्थित शूलिनी यूनीवर्सिटी के बायो टैक्नोलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर के साथ-साथ सेंटर फॉर रिसर्च ऑन हिमालियन सस्टेनेबिलिटी एंड डवलॅपमेंट प्रोजेक्ट के डायरेक्टर भी हैं, ने यूनीवर्सिटी परिसर में ही एक संग्रहालय तैयार किया है जिसमें सभी लाभकारी जीवाश्रूमों को संग्रहीत किया है। इनको एक फ्रिज में रखा गया है जिसका तापमान माइनस 60 तक रखा जाता है। उन्होंने अपने शोध के परिणामों को किसानों तक पहुंचाने का अभियान छेड़ा हुआ है। वह अपने अभियान के तहत सहयोगियों सहित ग्राम पंचायतों सहित अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर जनता को जागरूक कर रहे हैं।

दुख इस बात का है कि इस खतरे को सरकार और जनता समझ नहीं रही है। जबकि सरकार खुद इसका खुलासा कर चुकी है कि 49 हजार वर्ग किलोमीटर वनक्षेत्र हर साल दावानल की भेंट चढ़ जाता है जो चिंतनीय है। यह जानते-समझते हुए कि जंगल की यह आग ही भूस्खलन का प्रमुख कारण है। विडम्बना यह कि हमारे पर्यावरण मंत्री यह स्वीकार कर चुके हैं कि जनता पर्यावरण विनाश के खतरों के प्रति जागरूक नहीं है। अब विचारणीय यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? इसलिए इस ओर तत्काल ध्यान दिया जाना जरूरी है तभी जैव विविधता, वनस्पति और पर्यावरण सुरक्षित रह सकता है।

लेखक एक पत्रकार एवं पर्यावरणविद् है

Print Friendly, PDF & Email

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here