क्या नारा देकर सब कुछ बदला जा सकता है?

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राकेश शर्मा, कुरुक्षेत्र

जब भी कोई जवान देश की रक्षा करते हुए शहीद होता है तो आखों में आसूं आ जाते है, और उस परिवार पर जो बीतती है, जो सकंट का पहाड़ उस परिवार पर टुटता है वह उस परिवार से बेहतर कोई ओर नही जानता जिस माता-पिता ने अपना

लाल खोया, जिस बहन ने अपना भाई खोया, और जिसकी मांग में सिंदुर भरकर अपने परिवार का हिस्सा बनाने वाला वो पति जो शायद अब लौटकर कभी वापिस नही आयेगा।

बच्चों की आखों में वो पिता के प्रति प्यार जो कभी नसीब नही होता और कुछ ऐसा ही मंजर होता है उस शहीद का जो देश की सेवा करते हुए हंसते-हंसते हुए मौत को गले लगा गया और इसी सिक्के का दूसरा पहलु है किसान जिसको बढ़ी शान से देश का धरती पुत्र भी कहा जाता है। एक देश की सीमा की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग देता है तो दूसरी ओर सीमा पर रहते हुए करोड़ो भारतीयों का पेट भरने वाला वो किसान कर्ज ना चुकाने के कारण मौत को गले लगा लेता है। ये हालत है इस देश के और शायद इसलिए कहा गया है कि ना देश में जवान सुरक्षित है और ना ही किसान?

जय जवान जय किसान का नारा देने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी किसानों और जवानों के जज्बे को सलाम किया और इस नारे को दिया। ताकि किसानों और जवानों को हमेशा ही याद किया जा सके। लेकिन पिछले कुछ सालों से जो भी किसान और जवान के साथ बीत रही है वह बात किसी से छिपी है। हर रोज किसानों की आत्महत्या और जवानों की शहादत दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और देश की सत्ता पर आसीन नेताओं को केवल अपनी कुर्सी की चिंता सताती रहती है, और शायद इसलिए जवान और किसान की मौत भी चुनावी मुद्दों में शामिल होने लगी है। क्या वाकई देश बदल रहा है तो क्यों नही बदली किसानों की तस्वीर आखिर क्यों नही बदल रही जवानों की शहादत की वो लिस्ट जो लगातार बढ़ती जा रही है।

हाल ही के दिनों में 15 अगस्त का जश्न देश के कोने-कोने में मनाया जाएगा। देश के प्रधान सेवक दिल्ली के लाल किले से फिर संदेश देंगें। बात होगी किसानों की, बात होगी जवानों की, लेकिन ना कोई सुधार होगा और ना ही कोई परिवर्तन। 15 अगस्त के पहले जो देश की रक्षा करते हुए जो चार जवान देश के लिए शहीद हुए, उन्हें कभी नही भुलाया जा सकता। आखिर क्यों थम नही रही शहीदों की शाहादत?

संदेश और नारा देकर नेताजी आऐगे फिर तिरंगा फहरायगें देश की रक्षा करते हुए जवानों की खामौश खड़ी मुर्तियों पर पुष्प चढ़ायगें और फिर चले जाएगें। ये पहली बार नही हो रहा, ये तो होता रहेगा और होता आ रहा है। किसान और जवान की बाते करने वाले देश के नेताओंं को ना तो किसान की और ना ही जवान की पीढ़ा का पता है। आखिर क्यों चुनावी दलदल में किसान और जवान को ही फसाया जा रहा है? क्यों मजाक बन गये है देश के जवान और किसान। अगर, ऐसा ही चलता रहा तो सत्ता की चाह रखने वाले नेताओं को कुर्सी कभी नसीब नही होगी। जो नारा दिया जाता है देश के जवानों में जज्बा भरने के लिए जो नारा दिया जाता है किसानों की दशा सुधारने के लिए। आखिर, वह कब पूरा होगा। हां इतना जरूर है कि नारा देकर देश को नही बदला जा सकता। जरूरत है उसको धरातल पर उतारने की, जरूरत है विश्वास जीतने की, जो विश्वास आज देश की सरकारें खो रही है केवल चुनाव जितने के लिए।

                                                                                                   (लेखक एक पत्रकार हैं)

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