बेमानी है बांधों के प्रबंधन में बदलाव : ज्ञानेन्द्र रावत

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बीते दिनों केरल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद माना जा रहा है कि इस बाढ़ का प्रमुख कारण मानसूनी बारिश के साथ इडुकी बांध का कुप्रबंधन था जहां से अचानक लाखों क्यूसेक पानी छोड़ा जाना ही बर्बादी का सबसे बड़ा कारण बना। इसलिए भविष्य में ऐसी घटनाएं ना हों, इसलिए बांध प्रबंधन प्रोटोकाल में तत्काल बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसा अभी केरल में घटित हुआ, ऐसा भी नहीं है, इससे पहले 2006 में गुजरात में उकाई बांध स,े 2014 में तमिलनाडु में अडयार नदी पर बने चेमबरबक्कम बांध से और 2016 में मध्यप्रदेश में बाणसागर बांध से पानी छोड़ने के कारण 2006 में सूरत का 80 फीसदी हिस्सा डूब गया, 2014 में चेन्नई में चेमबरबक्कम बांध से चेन्नई को दशकों बाद प्रलंयकारी बाढ़ का सामना करना पड़ा और 2016 में बाणसागर बांध के कारण बिहार को बाढ़ से तबाही झेलने को विवश होना पड़ा। विडम्बना यह है कि बांधों के निर्माण से लेकर आजतक उसके लाभ, हानि और बाढ़ नियंत्रण सम्बंधी पहलुओं का कभी भी अध्ययन किये जाने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया। फिर हमारे यहां देेश में बहुतेरे बांधों का नियंत्रण अंतरराज्यीय है। अब हमारी सरकार बांधों के प्रबंधन, सुरक्षा मानकीकरण में एकरूपता लाने, राष्ट्र्ीय बांध सुरक्षा समिति और बांध सुरक्षा प्राधिकरण के गठन की खातिर एक विधेयक संसद में लाने पर विचार कर रही है। जहां तक केरल की बात है यहां के अधिकतर बांध पर्यावरण के लिहाज से अतिसंवेदनशील पश्चिमी घाट पर बने हैं। जबकि अधिकतर भूस्खलन की होती घटनाओं से जनधन की हानि यहीं हुई है। गौरतलब बात यह है कि बांधों का निर्माण अधिकतर बिजली उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण के उददेश्य से किया गया था। सच तो यह है कि असलियत में आजादी के बाद से आजतक इस उद्देश्य में भी हमें कामयाबी नहीं मिली। लेकिन फिर भी देश में बांधों का जाल बिछाया जाना जारी है।

समझ नहीं आता कि बांधों से हो रहे पर्यावरण विनाश को लेकर बरसों से पर्यावरणविद चेता रहे हैं लेकिन हमारी सरकार उनकी बातों को बराबर अनसुना करती रही है और बांधों को विकास का प्रतीक बताने का ढिंढोरा पीट रही है जबकि असलियत इसके उलट है। कैग की रिपोर्ट ने कई साल पहले यह साबित भी कर दिया है। इस सबके बावजूद हमारी सरकार पूर्वाेत्तर मंे बड़े बांधों को बनाकर पूर्वाेत्तर को विकास का नमूना दिखाना चाह रही है। पूर्वाेत्तर में कुल 250 से अधिक बांध बनने की प्रक्रिया जारी है। इन बांधों से समूची ब्रह्मपुत्र नदी पर आने वाले भीषण संकट को नकारा नहीं जा सकता। उस हालत में जबकि यह समूचा क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र पांच में आता है और यहां भू-स्खलन हमेशा होता ही रहता है। सच यह है कि बांधों ने पर्यावरणीय शोषण की प्रक्रिया को गति देने का काम किया है जबकि बांध समर्थक इसके पक्ष में सिंचाई, जल, विद्युत आदि सुविधाओं, रोजगार और मत्स्यपालन आदि कार्यों में बढ़ोतरी का तर्क देते हैं। विश्व बांध आयोग के सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि बांध राजनेताओं, प्रमुख केन्द्रीयकृत सरकारी-अंर्तराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाआंे और बांध निर्माता उद्योग के अपने निजी हितों की भेंट चढ़ जाते हैं। हमारी सरकार है कि वह दूसरे देशों से सबक लेने को तैयार नहीं है जो अपने यहां बांधों को खत्म करते जा रहे हैं।

गौरतलब है कि आज भारत समेत दुनिया के बड़े बांधों को ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। ब्राजील के वैज्ञानिकों के शोध इस तथ्य का खुलासा कर इसकी पुष्टि कर रहे हैं। उनसे स्पष्ट हो गया है कि दुनिया के बड़े बांध 11.5 करोड़ टन मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं। भारत के बांध कुल ग्लोबल वार्मिंग के पांचवे हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। वे सालाना तीन करोड़ 35 लाख टन मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं। इससे स्थिति की भयावहता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि दुनिया के कुल 52 हजार के लगभग बांध और जलाशय मिलकर ग्लोबल वार्मिंग पर मानव की करतूतों के चलते पड़ने वाले प्रभाव में चार फीसदी का योगदान कर रहे हैं। इस तरह इंसानी करतूतों से पैदा होने वाली मीथेन में बड़े बांधों की अहम् भूमिका हैै। भारत में बड़े बांधों से कुल मीथेन का उत्सर्जन 3.35 करोड़ टन है जिसमें जलाशयों से 11 लाख टन, स्पिलवे से 1.32 करोड़ टन और पनबिजली परियोजनाओं के टरबाइनों से 1.92 करोड़ टन मीथेन का उत्सर्जन होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत के जलाशयों से कुल मीथेन का 4.58 करोड़ टन उत्सर्जन हो सकता है। ब्राजील के नेशनल इंस्टीटयूट फाॅर स्पेस रिसर्च के वैज्ञानिकों इवान लीमा एवं उनके सहयोगियों द्वारा किया गया शोध यह मिथक तोड़ता है कि बड़ी पनबिजली परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली साफ होती है और वह पर्यावरण पर दुष्प्रभाव नहीं डालती है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि बिजली बनाने में बांध में पानी जमा कर के उससे टरबाइनों को चलाना सभी दृष्टि से सबसे सुरक्षित होता है। असल में बांधों के निर्माण से लोगों के विस्थापन और कुछ पर्यावरणीय अड़चनों के अलावा अभी तक बांधों के सामने कोई बड़ी समस्या आड़े नहीं आई है। लेकिन बदली स्थिति में वैज्ञानिकों के अनुसार बांधों में जमा होने वाली गाद के साथ-साथ अधिकाधिक मात्रा में आर्गेनिक मैटीरियल भी जमा होते हैं जिनका विघटन मीथेन पैदा करता हैै। बांधों की आयु के अनुसार मीथेन की मात्रा भी स्वाभाविकतः बढ़ती जाती है।

आंकड़ों के अनुसार चीन द्वारा सालाना 44 लाख टन बड़े बांधों से मीथेन छोड़ी जाती है जबकि भारत के बाँध उससे 7.5 गुणा से ज्यादा मीथेन छोड़ रहे हैं। तात्पर्य यह है कि 42.5 करोड़ टन कार्बन हाई आॅक्साइड के बराबर भारत के बांध मीथेन का उत्सर्जन करते हैं। कारण यह है कि भारत उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में आता है और तापमान की वृद्धि मीथेन उत्सर्जन बढ़ाने में अहम् भूमिका अदा करती है। यह सही है कि ग्रीन हाउस गैसों में मीथेन दूसरी बड़ी प्रदूषक गैस (कार्बन डाई आॅक्साइड का भाग 72 फीसदी व मीथेन का 23 फीसदी) है। यदि भारत में बड़े बांधों पर जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उन पर दृष्टिपात करें तो यह लगता है कि भारत के बांधों से उत्सर्जित मीथेन का यह अनुपात थोड़ा ज्यादा हो सकता है। इसके बावजूद फिर भी अनुमानतः यह 1.7 करोड़ टन सालाना के आस-पास तो है ही। यदि इसकी भारत में सन् 2000 में अधिकारिक तौर पर उत्सर्जित 184.9 करोड़ टन कार्बन डाई आॅक्साइड से तुलना करें जिसमें बड़े बांधों से होने वाला उत्सर्जन शमिल नहीं है, तो स्पष्ट है कि भारत में कुल कार्बन डाई आॅक्साइड उत्सर्जन का 18.7 फीसदी बड़े बांधों से होने वाला मीथेेन होता है। हमारी परेशानी यह है कि हमारा देश सालाना 3.35 करोड़ टन मीथेन छोड़ता है जबकि ब्राजील 2.18 करोड़ टन। उसका नम्बर दुनिया में मीथेन छोड़ने वाले देशो में भारत के बाद दूसरा है। आज समूचे विश्व में हाइड्रो पाॅवर पर निर्भरता दिन-ब-दिन तेजी से बढ़ती जा रही है। उस हालत में ब्राजील की शोध रपट स्थिति की भयावहता की ओर संकेत अवश्य करती है। यह रपट भारत ही नहीं अन्य विकसित राष्ट्रों के लिए भी खतरे की घंटी है। यह अध्ययन ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरों की ओर आगाह जरूर करता है। भले भारत ऊर्जा की नई टेक्नाॅलाॅजी स्वैच्छिक तौर पर अपनाने में लगा है, फिर भी अब भारत सरकार के ऊपर निर्भर है कि वह बड़े बांधों से ग्लोबल वार्मिंग के असर का पता लगाने की दिशा में क्या कदम उठाती है क्योंकि औद्योगिक दुनिया में तेजी से अपनी हैसियत बढ़ा रहा भारत ग्लोबल वार्मिंग के लिए कम जिम्मेवार नहीं है। आज इस पर विचार किया जाना चाहिए कि ऊर्जा के लिए बांध कहां तक उचित हैं और ये पर्यावरण के लिए कितना बड़ा खतरा साबित हो रहे हैं ? जबकि दुनिया के वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग के लिए बांधों को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। असलियत में आज हम सब एक तरह के बिजली के कंवल को ओढ़े हुए हैं। इसलिए कुछ करना होगा। क्योंकि कोई भी देश ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से अपने आस-पास हो रहे पर्यावरण क्षरण से बचा नहीं रह पायेगा।’

ऐसी स्थिति में गंगापुत्र के नाम से विख्यात आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर, 86 वर्षीय जल वैज्ञानिक जीडी अग्रवाल जिन्हें आज देश स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से जानता है, का गंगा पर बन रहे बांधों के विरोध में बीती 22 जून से जारी आमरण अनशन किसी भी दृष्ध्टि से गलत नहीं ठहराया जा सकता। वह बात दीगर है कि सरकार उसे महत्वहीन करार देकर उस पर ध्यान न दे। चंूकि वह वैज्ञानिक हैं, इसलिए वह पर्यावरण, गंगा की निर्मलता, अविरलता और उसके जल के कभी न खराब होने वाले विशिष्ट गुण के बारे में भलीभांति जानते भी हैं कि बांधों के चलते सुरंगों में कैद गंगाजल का वह विशिष्ट गुण अब खत्म होता जा रहा है जिसके लिए गंगा समूची दुनिया में जानी जाती है। ऐसा लगता है कि सरकार न तो बांधों के खत्म करने के बारे में विकसित देशों का अनुसरण कर रही है और न गंगा के भविष्य के बारे में ही कोई निर्णय कर रही है। मौजूदा हालात गवाह हैं कि यदि यही हाल रहा और सरकार संवेदनहीनता के दायरे से बाहर नहीं निकली तो स्वामी निगमानंद की तरह ही स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद गंगा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देंगे और देश एक प्रख्यात जल वैज्ञानिक और गंगाभक्त को खो देगा। इसमें दो राय नहीं।

ज्ञानेन्द्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं पर्यावरणविद्।

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