चुनाव आयोग का भय किस दल को है?

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आजकल देश में देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा के चुनाव का दौर धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है। जैसे-जैसे मतदान

ज्ञानेन्द्र रावत

की तिथि नजदीक आती जा रही है चुनावी प्रचार तेजी पकड़ता जा रहा है। राजनीतिक दल जनता को लुभाने की गरज से लोक-लुभावन नारों, वादों और सब्जबागों से भरे चुनावी पिटारे रूपी अपने चुनावी घोषणा-पत्रों का ऐलान कर रहे हैं। चुनाव आयोग 2015 में ही यह स्पष्ट कर चुका है कि राजनीतिक दल चुनाव में मुफत उपहार और वस्तुऐं देने का वादा नहीं कर पायेंगे। साथ ही उनको यह विस्तार से बताना पड़ेगा कि जो वादे उन्होंने किए हैं, उनको वह कैसे पूरे करेंगे और उनके लिए धनराशि का इंतजाम वह कहां से करेंगे। दरअसल चुनाव आयोग ने साल 2015 में ही चुनाव से पूर्व जारी होने वाले राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों को आदर्श चुनाव आचार संहिता के दायरे में ले लिया था। उस समय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को यह निर्देश जारी किया था कि वह अपने चुनावी घोषणा पत्रों की प्रति चुनाव आयोग को आवश्यक रूप से भेजें। यह भी कि मतदाताओं का विश्वास उन्हीं वादों पर हासिल किया जाना चाहिए जिन्हें पूरा किया जाना संभव हो। उस समय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दिए गए आदेशों के बाद दिया था। निर्देश में आयोग ने साफ-साफ कहा था कि राजनीतिक दल मुफत उपहार और वस्तुएं देने का वादा न करें। राजनीतिक दलों के जो भी वादे हांे वह संविधान के सिद्धांतों के विरुद्व न हो और आचार संहिता के प्रावधानों के अनुरूप हों।

सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा पत्रों को अपवाद के रूप में आचार संहिता के दायरे में लाने का निर्देश दिया था। कोर्ट का मानना था कि घोषणा पत्र चुनाव से पहले जारी किये जाते हैं, जिससे ये आचार संहिता के दायरे में नहीं आते। लेकिन इनमें किये गए वादे चुनाव के मैदान का संतुलन बिगाड़ते हैं जिसके चलते ही कोर्ट ने आयोग को इस बारे में राजनीतिक दलों के लिए दिशानिर्देश बनाने का आदेश दिया था। इसके बाद ही आयोग ने राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श किया और विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किये। वह बात दीगर है कि कुछ राजनीतिक दलों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। उन्हें आयोग का यह कदम रास नहीं आया। उनका इस बाबत कहना था कि वोटरों से वादे करना और उनके समक्ष प्रस्ताव रखना हमारा अधिकार है। भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकबी का कहना था कि घोषणा पत्र पार्टी का वोटरों से किया गया वायदा होता है। इसमें आयोग का दखल नहीं होना चाहिए। घोषणा पत्रों पर सेंसरशिप उचित नहीं है। जबकि कांग्रेस के शकील अहमद का कहना था कि इस मुद्दे पर राष्ट्र्ीय बहस होनी चाहिए। मोदी-केजरीवाल ने जो वायदे किये, उनमें कोई पूरा नहीं हुआ। आयोग के निर्देश के पीछे शायद यही मुख्य वजह है। लेकिन चुनाव आयोग ने तब यह स्पष्ट कर दिया था कि निष्पक्ष चुनाव और सबको समान अवसर देने के लिए वह प्रतिबद्ध है।

देखा जाये तो आज देश के राजनीतिक दल इस सबके बावजूद अपने हिसाब से चुनावी वादे करने में मशगूल हैं। उन्हें न देश की चिंता है, न देश की सुरक्षा की, न देश की आन-बान-शान के प्रतीक राष्ट्र्ध्वज की, न देश की एकता-अखंडता की और न देश की सदियों पुरानी विरासत सांप्रदायिक सद्भाव की। देश खंड-खंड हो जाये, सामाजिक बिखराव, जातिगत वैमनस्यता, धार्मिक विद्धेष चरम पर पहुंच जाये, इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं। पर्यावरण, प्रदूषण आदि मुद्दों पर तो वह कतई गंभीर हैं ही नहीं। डब्ल्यूएचओ ने बीते साल देश के जिन 14 शहरों को विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल किया था, उनमें अभी हालतक कोई सुधार नहीं हुआ है। क्लाइमेट ट्र्ेंड की हालिया रिपोर्ट में इस स्थिति के लिए सरकारों के साथ जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदार माना है। हालात गवाह हैं कि अभी तक उन शहरों में प्रदूषण निगरानी केन्द्र तक नहीं खुले हैं। राजनीतिक दलों को चिंता है तो बस येन-केन प्रकारेण चुनाव जीतने की ताकि देश की सत्ता पर वह काबिज हो सकें। इसके लिए वह धर्म, जाति, संप्रदाय यहां तक कि पंथ की राजनीति करने में भी नहीं चूकते। दलों द्वारा क्षेत्र में जातियों के बाहुल्य के मद्देनजर जातियों का गठजोड-गठबंधऩ और उसी के हिसाब से उम्मीदवारों का चयन इसका जीता-जागता सबूत है। वंचित समूहों और आबादी के हिसाब से नगण्य जातियों की उपेक्षा तो जगजाहिर है। आजादी के बाद से देश की राजनीति में उनकी हिस्सेदारी का तो सवाल ही आखिर कहां उठता है। राजनीतिक दल दावे करने में तो कीर्तिमान बनाते आये हैं। बीते दशक इसके साक्षी हैं। कहने को तो हम विश्व के शक्तिशाली राष्ट्र्ों की पांत में जा खड़े हुए हैं, अंतरिक्ष में पहुंचने का दावा भी कर रहे हैं लेकिन जो सबसे बड़ी विडम्बना है वह यह कि इस दौरान न तो गरीबी हटी, न बेरोजगारी ही खत्म हुई, न भुखमरी का खात्मा हुआ,, न असमानता मिटी, न समुचित चिकित्सा के अभाव में बेमौत मरने वालों की तादाद में ही कोई कमी आई, न कुपोषण की समस्या का खात्मा हुआ। आज हालत यह है देश में कुपोषण के चलते कमजोर बच्चों की तादाद 34.70 फीसदी है। और तो और न अन्नदाता किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं पर ही अंकुश लगा। दुख की बात यह है कि लोकसभा की कुल 543 सीटों में से यदि शहरी इलाकों की 57 सीटें छोड़ दे ंतो 342 सीटें ऐसी हैं जो ग्रामीण इलाकों से आती हैं जहां के किसान ही राजनीतिक दलों की किस्मत का फैसला करते हैं। असलियत यह है कि बीते सालों में खाद्यान्न की कीमतों में भारी कमी के चलते किसानों की कमाई में काफी कमी आई है। साथ ही कर्ज का बढ़ता बोझ और किसान सम्मान निधि की नाकामी उनकी बदहाली का अहम् कारण है। जबकि दावा किया गया था कि इस योजना से 86 फीसदी किसान परिवारों को लाभ मिलेगा।

हमारे यहां जब जब चुनाव की बात आती है, सबसे पहले गरीबी के मुद्दे की चर्चा होने लगती है। आजादी के बाद से जितने भी चुनाव देश में हुए, सभी में गरीबी अहम् मुद्दा रही। सबसे बड़े दुख की बात यह है वह आजतक मिट नहीं पायी। आजादी के सात दशक बाद भी देश में वैश्विक दासता के मामले में दुनिया में सबसे ज्यादा गुलाम भारत में हैं। असलियत में देश में तकरीब 1.33 करोड़ से 1.47 करोड़ लोग आज भी गुलामी के किसी न किसी रूप के शिकार हैं। जबकि समूची दुनिया में यह आंकड़ा 2.98 करोड़ के आसपास है। वाॅक फ्री फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार हमारा देश दुनिया के उन दस देशों में शामिल है, जिनमें गुलाम बनाकर रखे गए लोगों की कुल तादाद दुनिया के कुलजमा गुलामों की 76 फीसदी ठहरती है। आधुनिक गुलामी के मामले में सर्वाधिक प्रसार वाले दस देशों यथा मौरीतानिया, हैती, पाकिस्तान, नेपाल, मोल्डोवा, बेनिन, कोटे डि आईवोरे, गाम्बिया और गाबोन में हमारे देश का नम्बर चैथा है। इसकी जड़ में गरीबी, जाति प्रणाली का बरकरार रहना, दलित व आदिवासी समुदाय की महिलाएं व बच्चों का इसकी चपेट में ज्यादातर आना, सीमा पार से आव्रजन के तहत आने वाले कम क्षमता के आप्रवासियों का अधिकतर इसकी चपेट में आना, कर्ज के बदले बंधुआ या बंधक प्रणाली का जारी रहना अहम् कारण है। असल में गरीबी वह अहम् कारण है जिसके कारण नागरिकों के गुलामी में पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। लोग कर्ज लेने के बाद अधिकतर आधुनिक गुलामी के चक्कर में फंस जाते हैं। इसमें सबसे बड़ी बात यह कि यदि कानून प्रभावी तरीके से लागू हो तो नागरिकों को गुलामी के शिकंजे में पड़ने से बचाया जा सकता है। अगर गरीबी का खात्मा हो गया होता तो गुलामी का नामोनिशान ही न रहता। जाहिर है गरीबी हटाने के वायदे तो किये जाते रहे लेकिन उसे मिटाने की दिशा में गंभीरता से कभी अमल नहीं किया गया।

जैसाकि सेंटर फाॅर मीडिया स्टडीज का मानना है कि देश का यह चुनाव दुनिया का सबसे मंहगा चुनाव है। इसका कुल खर्च 500 अरब के आंकड़े तक को पार कर जायेगा। देश का यह चुनाव अमेरिका के राष्ट्र्पति और वहां के निचले सदन कांग्रेस के 2016 के चुनावों के 455 अरब डाॅलर के खर्चे को भी पीछे छोड़ एक रिकार्ड कायम करेगा। भारत जैसे देश के लिए इतना भारी भरकम चुनावी खर्च चिंता का सबब जरूर है। क्योंकि जिस देश के आम आदमी के लिए रोजाना खर्च के लिए 250 रुपये तक मयस्सर नहीं होते, वहां प्रति मतदाता पर होने वाला खर्च 560 रुपये के करीब पहुंच जाये, यह विचार का विषय है। जाहिर है चुनावी खर्च में मितव्यता किये जाने की दिशा में चुनाव आयोग भी गंभीर नहीं दिखाई देता। उस स्थिति में प्रत्याशी द्वारा खर्च पर अंकुश की बात बेमानी सी लगती है। भले प्रत्याशी द्वारा चुनावी खर्च की सीमा तय है लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि खर्च उससे बीसियों गुणा ज्यादा होता है। एक पूर्व लोकसभा प्रत्याशी द्वारा किया गया खुलासा इसका ज्वलंत प्रमाण है। प्रत्याशी द्वारा चुनाव बाद खर्च का जो ब्यौरा दिया जाता है, उससे सच्चाई कोसों दूर होती है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि चुनाव जीतने के बाद येन केन प्रकारेण वह अपने चुनाव में हुए खर्चे की भरपायी करेगा या वायदों को पूरा करने में अपनी उर्जा लगायेगा। बहरहाल 23 मई को रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने आ जायेगा कि किसके कितने वायदों पर देश की जनता ने मुहर लगायी है और चुनाव आयोग के निर्देशों का किस दल या प्रत्याशी ने कितना पालन किया है। यह तो भविष्य ही बतायेगा। चुनाव आयोग का विगत इतिहास किसी कठोर कार्यवाही की गवाही तो नहीं देता।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् है)

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