सात जमात पास ने 6 हजार लोगों को दिया रोजगार

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सीमा पर जवान और इंड्रस्टी में सिक्योरिटी मेन से पहचान बनाई सीताराम शर्मा ने

‘जब हौसले हो बुलंद तो मंजिल दूर नही होती, दिल में हो कुछ करने की चाह तो उसकी हार नही होती।’ यह पंक्तियां सीही गांव निवासी एवं हरियाणा इंड्रस्टीयल सिक्योरिटी सर्विस के मालिक सीताराम शर्मा पर सटीक बैठती है। सीताराम शर्मा फरीदाबाद की ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने देश की सीमा पर जवान और इंड्रस्टी में अच्छे सिक्योरिटी सर्विस मेन के रूप में पहचान बनाई है। सीताराम शर्मा देश और देश के नागरिकों को सर्वाेपरी मानते है, उनमें देशभक्ति कुट-कुट कर भरी हुई है। उनकी बड़ी उपलब्धि यह है कि सात जमात पास कर देश की सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेने के लिए आर्मी में भर्ती हुए तथा भारत-पाक के बीच सन् 1971 की लड़ाई में अपनी देशभक्ति का परिचय दिया। आर्मी से आने के बाद आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए उन्होंने अपनी आर्मी बना ली, जिसमें आज छह हजार जवान (सिक्योरिटी गार्ड)काम कर रहे है। आर्मी से आने के बाद कैसे बनी इंड्रस्टी की आर्मी और क्या था सीताराम शर्मा जी का इस आर्मी (सिक्योरिटी सर्विस)को बनाने के पीछे उद्देश्य। सीताराम शर्मा से यह जानकारी हमारे संवाददाता शफी सिद्धीकी ने ली जिसके कुछ अशं इस प्रकार है:-

प्र.-सीताराम जी, आपने एजुकेशन पूरी किए बिना आर्मी ज्वांईन की, उसके पीछे परिवारिक मजबूरी थी या कोई और कारण रहा ?
उ.-मैं आपको बताना चाहूंगा कि मैंने आर्मी 1968 में ज्वांईन की, उस समय लोग अपने बच्चों को आर्मी में भेजना पसंद नही करते थे। मैं देश के बारे में रेडियों पर सुनता रहता था कि आज पाकिस्तान की सेना देश की फलानी सीमा में प्रवेश कर रही है तो कभी चीन ने हमला कर दिया। ये खबर मेरे दिमाग में देशभक्ति पैदा कर रही थी और मुझे एक दिन आर्मी में देश के लिए कुछ करने का मौका मिला, मैं यह मौका छोडऩा नही चाहता था, तभी मैंने आगे पढ़ाई नही की और आर्मी ज्वांईन कर ली। हां, उस समय परिवार बड़े होते थे कमाने वाला एक ही होता था, जिस कारण से आर्थिक हालात भी आड़े आ रहे थे। आप उसको भी देश सेवा के साथ-साथ परिवार सेवा भी मान सकते हैं।

प्र.-आप भारत-पाक युद्ध में हिस्सा ले चुके हैं, क्या युद्ध के अनुभव को पाठकों से साझा करेंगे?
उ.-मैं भारत-पाक युद्ध में जवान के तौर पर लड़ाई लड़ चुका हूं और वो दिन मेरे लिए एक परीक्षा से कम नही थे। भारत-पाक युद्ध 4 जनवरी 1971 को हुआ था उस समय देश की प्रधानमंत्री श्रीमति इंद्रा गांधी थी, उन्होंने युद्ध के आदेश उस वक्त दिए थे जब पाक सेना के टेंक लॉगेवाला (राजस्थान) सेक्टर में एट्रीं कर गए थे और युद्ध छीड़ गया था, उस समय सेना के जवानों की छुट्टीया रद्द कर दी गई थी, यह युद्ध 17 दिनों तक चला। हमारी सेना ने पाक सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए तथा वायु सेना ने देश की सर जमी पर नापाक ईरादे लेकर आए पाकिस्तान के सैनिकों को मार गिराया। बडे मजे की बात तो यह थी कि सीमा पर हम युद्ध लड़ रहे थे और देश के अंदर सैनिकों की सलामती एवं युद्ध जीतने के लिए हवन चल रहे थे।

प्र. शर्मा जी, आप देश के चिंतनशील नागरिक है आपने देश के लिए काम किया और आज देश के नागरिकों के लिए काम कर रहे हैं, क्या आपको पीड़ा नही होती जब संवैधानिक पद पर बैठने वाले लोग आधारहीन, भडक़ाऊ बयान देते है, इस पर आपकी क्या राय है?
उ.- सर, पीड़ा से ज्यादा शर्म आती कि मेरे इतने बड़े देश में संवैधानिक पदों पर बैठने वाले लोग देश की गरिमा का बिना ध्यान दिए कुछ भी बोल जाते है। इसका असर देश की जनता पर बूरा पड़ रहा है। इस पर इन पढ़े-लिखे लोगों को सोचना की आवश्यकता है। हां, मैं कहता हूं लोकतंत्र है। लेकिन मर्यादीत भाषा का प्रयोग राष्ट्रहीत में है। इस देश में अलग-अलग भाषा, अलग-अलग धर्म के लोग, अलग-अलग ऋतुएं, सैंकड़ो राजनैतिक दल, नदियों का संगम है, विभिन्नता के बाद भी एकता है। फिर भी ये राजनैतिक लोग देश को संसार में बदनाम करने में लगे रहते है इसके मेरे पास दर्जनों उदाहरण है। देश में संवैधानिक पद पर विराजमान लोगों को सोचना चाहिए कि आप की गैर-जिम्मेदारी के कारण देश में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।

प्र. शर्मा जी, आपने आर्मी की नौकरी छोडऩे के बाद सिक्टयोरिटी इंस्टीटयूशन ओर्गनाईज करने का विचार कैसे बनाया?
उ. हंस कर जबाव देते हुए, इसके पीछे मेरी पत्नी का हाथ था, इससे पहले मैंने फ्रीक इंडिया में सर्विस ज्वांइन की, लेकिन मेरे गांव से कंपनी काफी दूर होने के कारण मुझे जॉब छोडऩा पड़ा। कुछ दिनों बाद फिर जॉब की तलाश में निकला तो रास्ते में एक सिक्योरिटी गार्ड जॉब का एक बोर्ड टगा हुआ देखा। मैंने उस इंस्टीटयूशन में फील्ड ऑफिसर पद के लिए चयनित किया गया और तकरिबन दो माह के बाद किसी बात पर संस्था के मैंनेजर से बहस हो गई और मैंने वहां से नौकरी छोडक़र खुद अपना संस्था शुरू कर दिया।

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