कोरोना काली का क्रोध : जलपुरुष

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राजेंद्र सिंह जलपुरुष

कोविड-19 प्राकृतिक क्रोध को शांत होने तक स्वामी शिवानंद सरस्वती जी और साध्वी पद्मावती जी ने गंगा सत्याग्रह को विराम दिया है। आज गंगा तपस्या को साध्वी पद्मावती ने 107 वे दिन और स्वामी शिवानंद सरस्वती जी ने 19वे दिन अपने गंगा सत्याग्रह को हम जैसे 300 व्यक्तियों के आग्रह पर विराम दिया है। उन्होंने कहा ‘कोराना काली का क्रोध है’। वे काली मां और प्रकृति को एक ही मानते है। जब मानव प्रकृति की अवेहलना करता है, तब मानवीय जीवन में प्रकृति पर अतिक्रमण, प्रदूषण और शोषण बढ़ जाता है। यह व्यवहार प्रकृति को प्रकूषित बनाता है।

मानव लालची है। वो अपने लालच को पूरा करने हेतु बुरे से बुरे काम करता है, वायरस भी बनाता है। गंगा जी को बांधो से बांध कर सभी प्रयागों को नष्ट करने की चेष्टा करता है। प्रकृति मानव की जरुरत पूरी करती है, लालच पूरा नही कर सकती है। गंगा जी भी भारतीय आस्था से पर्यावरण का संरक्षण व संतुलन बनाती है। गंगा जी के प्रयाग आस्था और पर्यावरण के रक्षक है। प्रयाग उन्हीें स्थानों को कहा जाता है, जहां गंगा जी के जल की दो या दो से अधिक धारायें मिलकर, गंगा जी के जलगुण की विशिष्टता को बढाती है। गंगा जी की सभी धारायों के मिलने की जगह को प्रयाग नही कहा जाता है। विष्णु प्रयाग, जहां विष्णु गंगा नामक जल धारा अलकनंदा जी में आकर मिलती है। इसी धारा पर विष्णुगाद नामक परियोजना बन रही है। पीपलकोटी, बांध से ‘‘कर्ण प्रयाग‘‘ नष्ट होगा। दोनों बांध परियोजनाओं को भारत सरकार और उत्तराखंड सरकार ने बनाने की स्वीकृति दी है। हमारी धार्मिक संस्कृति की रक्षा करने वाली सरकारों को अपनी मां गंगा पर निर्माणाधीन बांधों को रोकना चाहिए था। ‘प्रयाग‘ गंगा की संस्कृति के संरक्षक है। हम इन्हें नही संभालेगें, तो गंगा नही बचेगी।

स्वामी शिवानंद जी का आमरण अनशन और पद्मावती का भी अनशन, प्रो. जी. डी. अग्रवाल ‘‘स्वामी सानंद जी‘‘ की गंगा के लिए उठाई गई मांगो को पूरा करने हेतु है। स्वामी सानंद जी को स्वामी शिवानंद जी ने उनके गंगासत्याग्रह में अंतिम समय विश्वास दिया था कि, आपके जाने के बाद मैं इसी गंगा तपस्या परम्परा को आगे बढ़ाऊंगा। स्वामी जी स्वंय भी और पूरे मातृसदन के संत इसी गंगा जी के आन्दोलन में लगे है। मातृसदन, गंगा तपस्या को आज भी आगे बढा रहा है। तरुण भारत संघ के उपाध्यक्ष प्रो. जी. डी. अग्रवाल की मांगो को पूरा कराने हेतु यह संस्थान स्वामी सानंद जी की मांगो को पूरा कराने हेतु चेतना, जागरण का कार्य कर रहा है। उनके जीवित रहते 30 सितम्बर 2018 को उन्हीं के द्वारा आरम्भ हुई गंगा सद्भावना यात्रा आज भी गंगा अविरलता के नाम से चालू है। जब तक सरकार गंगा पर बन रहे बांधो का काम रोकेगी नही, तब तक यह गंगा चेतना का कार्य चलता ही रहेगा। कोरोना (काली का क्रोध) शांत होते ही पंचप्रयाग बचाओ सत्याग्रह उत्तराखंड में चलेगा।

सरकार को समझ आना जरुरी है। गंगा सत्याग्रही किसी के विरोधी नही है। गंगा जी के गंगत्व के संरक्षक है। गंगा जी भारतीय आस्था और पर्यावरण की संरक्षक है। इन्हें दोनों सरकारे विरोधी मानकर अपमानित कर रही है। सरकारे जब भी ऐसा प्रयास करती है, तो सत्याग्रह और भी ज्यादा तेज व प्रभावी बनता है। आज जो ‘‘गंगा सत्याग्रह‘‘ को विराम दिया है वह राष्ट्रहितों को सर्वोपरि मानकर गंगा जी के सम्मान में ही है। माई गंगा से कमाई ही करती रहेगी, बांध निर्माण नही रोकेगी तो मां गंगा जी के लिए पुनः अच्छी तैयारी से, यही सत्याग्रह चलेगा।

अब मां काली ने स्वंय ही गंगा जी के बांधो का निर्माण कार्य लाॅकडाउन से रुकवा दिया है। सरकार को समझना चाहिए कि पंचप्रयाग भारतीय आस्था और पर्यावरण रक्षा के लिए है, इन्हें बचायें। गंगा जी पर बांध बनेगें तो पंचप्रयाग नष्ट हो जाऐगें। प्रयागों को बचाने हेतु बांधो का निर्माण रोके।

गंगा नामकरण देवप्रयाग से ही आरंभ होता है। यहां अलकनंदा जी और भागीरथी मिलती है। इसके ऊपर रुद्धप्रयाग में मंदाकनी और अलकनंदा जी मिलती है। इसके ऊपर कर्ण प्रयाग में पिण्डरगंगा जी, अलकनंदा में आकर मिलती है। नंदप्रयाग में नंदाकिनी आकर मिलती है। धौलीगंगा पिण्डर में ही मिलकर, अलकनंदा का तेज प्रभाव बनाती है। यहां से ही अलकनंदा का नाम प्रभावी बनता है। विष्णु प्रयाग में विष्णु गंगा जी मिलती है। इस प्रकार भारत में प्रयाग शब्द का अर्थ – जहां जल धाराओं के मिलने से जलगुण विशिष्टता बढे, वही प्रयाग होता है। यह आस्था वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। इसे ही 2018 में नीरी नागपुर, भारत सरकार की एपेक्स संस्थान के शोध से यह सत्य बाहर आया है।

 गंगा जी का बायोफाॅज दूसरी नदियों से भिन्न है। जहां इसके प्रयाग है, वहां यह गुण अधिक है। अतः विष्णु, नंद, कर्ण, रुद्ध और देव, इन पांचो के जल शब्दों के अर्थभाषा से प्रयाग का जलशब्द मिलकर नदियों को उनकी वाणी प्रकट करता है। ये नदियां ही भारत की वाणी है। इनमें प्रवाहित जल ही भारत की भाषा है।

अतः गंगा जी का सत्याग्रह जिसे आज स्वामी शिवानंद सरस्वती ने विराम दिया है, वह गंगा जी पर बन रहे बांधो से नष्ट होते प्रयागों को बचाने के लिए है। गंगाजल विशिष्टता का संदेश देने वाले ‘‘प्रयाग’’ और इन्हें बनाने वाली नदियों मां गंगा की जल की धाराये हमारी भाषा और वाणी है। इसे बचाने वाला “गंगा सत्याग्रह‘‘, को बडी तैयारी हेतु विराम दिया है। गंगा सत्याग्रह गंगा का रखवाला है। गंगा अविरलता से निर्मल बनेगी यही ‘‘सत्य‘‘ है। गंगा को स्वास्थ्य रखने हेतु अविरलता प्रदान कराना सरकार का कर्तव्य है। वह पालना करें। इसी आग्रह के लिए स्वामी शिवानंद सरस्वती और साध्वी पद्मावती की गंगा तपस्या चालू थी। सत्याग्रह (तपस्या) अहिंसक हेाती है। अब प्राकृतिक प्रकोप ने हिंसा शुरु कर दी तो स्वामी जी ने इस कोरोना हिंसा तक, अपनी तपस्या को विराम दे दिया है। गंगा जी की निर्मलता-अविरलता हेतु बांध रुकवाने तक, गंगा सत्याग्रह जारी रहेगा।

(लेखक जलपुरुष के नाम से प्रख्यात मैग्सेसे एवम स्टॉकहोल्म वॉटर प्राइज से सम्मानित पर्यावरणविद तथा तरुण भारत संघ के अध्यक्ष हैं। यहां प्रकाशित लेख उनके निजी विचार हैं।)

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