कोरोना का कहर, त्योहारों के रंग पड़े फीके

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Faridabad/Alive News: कोरोना का प्रभाव लोगो के साथ साथ त्योहारों पर भी दिखाई दे रहा है इससे आम दिन और त्यौहार के दिन में कोई भिन्नता नजर  नहीं आ रही है।  पूरे भारत वर्ष में वैशाखी का त्यौहार अलग- अलग तरीकों व नाम से मनाया जाता  है।

असम में इस  त्यौहार को बिहू के नाम से जाना जाता  है, वहीं  बंगाल में भी इसे पोइला बैसाख कहते हैं तथा बिहार में इसे सतुआन के रूम में मनाया जाता है। परन्तु इस वर्ष लोग कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन से त्यौहार को पहले की भांति नहीं मना पा रहे है। वैशाखी पर फसल पक कर तैयार हो जाती है, और पूरा गांव इकट्ठा होकर इसकी खुशी मनाता है परन्तु इस बार कोरोना ने लोगों को घरों में ही कैद कर दिया है ।

क्या है वैशाखी की मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार पंजाब में 13 अप्रैल 1699 को दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी और नए साल के प्रारम्भ पर आज के दिन को हर्षोउल्लास से मनाया जाता है, तो वही इस दिन को हरियाणा में फसल पक कर तैयार होने की ख़ुशी में मनाया जाता है। पंजाब में इस दिन लोग ढोल नगाड़ो पर नाचते है तथा लोगो के घर जाकर को नववर्ष की बधाइयाँ देते है साथ ही आज के दिन विभिन्न प्रकार के पकवान बनते है।

कहा जाता है कि आज के दिन गंगा मईया धरती पर आई थी इसलिए लोग आज के दिन गंगा किनारे जाकर मां गंगा की आरती करते है। इसके अलावा वैशाखी के दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है अतः इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं। आज के दिन से ग्रीष्म ऋतू की शुरुआत हो जाती है।

 

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