नौनिहालों के लिए तनाव का कारण बने भारी भरकम बस्ते का बोझ

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Kurukshetra/Alive News : बच्चों का बचपन वैसे तो खेल कूद कर ही व्यतीत होता रहा है और बचपन होता भी इसलिए है कि उनको किसी भी प्रकार की चिंता ना हो लेकिन, अब शायद बचपन की परिभाषा ही बदल गई है और बहुत कम दिखाई देता है नौनिहाल अपना जीवन के शुरूआती दिनों में तनाव में न हो। इस भाग दौड़ वाली जिंदगी में सब को आगे निकलने की होड़ लग गई है जिसका प्रभाव बचपन पर भी पड़ा है।

छोटी सी उम्र में भारी भरकम बस्ते का बोझ ,और पढ़ाई की चिंता बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास में बाधा बनता जा रहा है। बच्चों पर बस्तों का बोझ उनके लिए जानलेवा साबित हो रहा है और इसकी चिंता किसी को भी नही अभिभावक स्कूल संचालकों से शैक्षणिक सत्र के दौरान ऐसी मांग करता रहा है कि बच्चों कि किताबों को कम किया जाए ताकि उनके बस्ते का बोझ को हल्का किया जा सके। स्कूल संचालकों की मनमानी और शिक्षा विभाग की अनदेखी के कारण ये असंभव होता जा रहा है।

इन सबके बीच एक बात भी जानना जरूरी है कि जो स्कूल जितना अधिक होमवर्क देता है वह स्कूल उतना ही बड़ा माना जाता है। इस तरह से होमवर्क कुल मिलाकर एक कर्मकाण्ड़ का रूप ले चुका है जिसका विकल्प ढुंढना जरूरी है। नन्ही उम्र में पढ़ाई का दबाव बच्चों का कुठिंत बनता जा रहा है। जिसके परिणाम समय-समय पर हम सभी के सामने आते रहते हैं। वैसे तो निजि स्कूलों में पढ़ाई करने वाले बच्चों के बैग का भार 12 से 15 किलोग्राम तक होता है और छोटी कक्षा में पढऩे वाले बच्चों के बैग का भार 4 से 5 किलो तक देखा जा सकता है जो काफी खतरनाक साबित हो रहा है।

क्या कहते हैं जानकार-
हड्डी रोग विशेषज्ञ की माने तो बस्ते का बोझ बच्चे के वजन से दस फीसद से अधिक नही हेाना चाहिए अर्थात 10 किलो यदि बच्चे का वजन है तो उसके बैग का वजन एक किलो से अधिक नही होना चाहिए। यदि बैग का वजन अधिक होगा तो बच्चे को काइफोसिस होने की आशंका होती है। इस बीमारी में बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होती है। यदि बैग की पट्टी पतली है तो कंधे की नसें दबेंगी जिससे रक्त संचरण प्रभावित होगा और बच्चे के कंधे सहित रीढ़ की हड्डी में हर समय दर्द बना रहेगा।

क्या कहते है अभिभावक-
बलविन्द्र सिंह, धर्मपाल, व राजकुमार ने बताया कि बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा है स्कूल में आने जाने में ही बच्चे पूरी तरह से थक जाते है। होमवर्क के बाद, टयूशन की ङ्क्षचता बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास में बाधा बनती जा रही है। इसलिए स्कूल संचालकों का चाहिए कि बच्चों के बस्ते के थोड़ा हल्का किया जाये। आज के समय स्कूल धनकुबेर बनते जा रहे है और ये बात सरकार भी मानती है और समझती है लेकिन बच्चों के भारी भरकम बस्तों की परेशानी से कोई भी निजात नहीं दिला पा रहा है। जिस कारण उनकी कमर और कंधों में भी दर्द होने की समस्या निरंतर बढ़ती जा रही है।

कोर्ट के आदेश के बाबजूद भी नही निकल रहा समाधान-
2012 में दिल्ली उच्च न्यायलय ने भी सुझाव दिया था कि बस्ते का वजन बच्चे के वजन के दस प्रतिशत से अधिक नही होना चाहिए इस साल के शुरू में मुंबई हाई कोर्ट ने इस संबध में एक सामाजिक संस्था की सिफारिश पर बस्ते का वजन कम करने का निर्देश दिया था और स्कूलों की इस मामले में जवाबदेही तय की गई थी। कोर्ट के आदेश के बाद भी महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के सभी स्कूलों में बस्ते के बोझ पर नियंत्रण लगाने की बात कही थी। लेकिन इसके बाबजूद बस्ते के विकल्प की तलाश अब तक नही हो पायी है। अक्सर देखा गया है कि कई स्कूलों में बहुमंजिला इमारतें बनी हुई हैं जिनकी सीढिय़ों पर चढने में भी बच्चों को काफी मशक्क्त करनी पड़ती है।

क्या है गाइड़ालाईन-
बच्चों के बढ़ते हुए बस्ते के बोझ को लेकर बाकायदा गाइड़ालाईन जारी कि गई जिसमें बताया गया कि कक्षा एक व दो के बच्चों के बैग का वजन 2 किलो। कक्षा तीन से चार तक के बच्चों के बस्ते का वजन 3 किलो।
कक्षा पांच से लेकर आठ तक के बच्चों के बस्ते का वजन 4 किलो।
कक्षा नौ व दस में जाने वाले बच्चों के स्कूल बैग का वजन 6 किलो से अधिक नही होना चाहिए।

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