लॉकडाउन का इतिहास 3 सौ साल से अधिक पुराना

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जे. बी. शर्मा

पाठको, विश्वमहामारी के दौर में व्यापक स्तर पर दुनिया भर में कोविड-19 की रोकथाम के लिए एक नमूने के रूप में प्रयोग में लाए गए लॉकडाउन के बारे बात करने से पहले हम अपने देश के 6 वें प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी की 28वीं पुण्य तिथि पर उन्हें शत शत नमन करते हुए भावस्थ श्रद्धांजलि प्रकट करते हैं। काश श्री राजीव गांधी पर दरिंदो द्वारा तामिलनाडू के सिरीपरियंबतूर में 21 मई, 1991 में उन पर आतंकी हमला न किया गया होता तो संभवत: आज की देश तस्वीर कुछ और ही होती। एक बार फिर उस पुण्यात्मा को शत शत नमन।

आइए अब बात करते हैं लॉक डाउन के इतिहास की। जिसके लिए हम मदद लेंगे अग्रेज़ी भाषा में पेरिस में रहने वाले पत्रकार धनंजय खादिलकर द्वारा लिखे एक लेख की और समझने की चेष्ठा करेंगे कि उन्होंने लॉक डाउन के आरंभ होने के संबंध में क्या लिखा है?

यह बात ठीक है कि आज कोरोना वायरस के दौर में हममें से ज्य़ादा तर लोग यही समझे बैठे होंगे कि कोविड-19 – विषाशाणु की अभी तक न तो वैक्सीन तैयार हुई है और न ही कोई उपयुक्त- उपयोगी उपचार। इसलिए विश्व समुदाय ने लॉक डाउन और क्वैरिटाइन करने के नमुने को ही सबसे उपयुक्त और कारगर मान लिया है। जब कि ऐसा नहीं है। अब खुलेआम आवाज़े उठ रही है कि कोविड-19 से लडऩे के लिए लम्बा लॉक डाउन हरगिज़ न कारगर है न उपयोगी। बल्कि लंबे समय तक लॉक डाउन के कारण देश की इकोनोमी का भट्टा बैठ जायेगा और जोकि बैठ भी गया है।

पत्रकार खादिलकर लिखते हैं कि संभवत: इटली के पुनर्जागरण के दौर में जब वहां प्लेग फैला था तो इटली की राजधानी फलोरैंस में लॉक डाउन को स्वास्थ संबंधी आपात स्थित से निपटने के लिए संघटित अनुक्रि या के रूप में प्रयोग में लाया गया था।

इटालीयन पुनर्जारण के दौर में बर्कबैक यूनिवर्सिटी,लंदन के प्रौ. जोहन हैण्डरसन लिखते हैं कि,‘‘प्लेग की छवि हमेशा ऐसी बनाई गई जिसने जन-साधरण के स्वास्थ के लिए नवजागरण और आरंभिक आधुनिक क ाल में कुछ नुमनों को मुख्यत: लंबी चलने वाली योजनाओं के रूप में पेश किया ’’ । वहीं इटली का मूल्यांकन प्लेग से असरदार मापदंड से लडऩे की प्रक्रिया के लिए मुख्य केन्द्र माना गया। हैण्डरसन के अनुसार उक्त मापदंड इटली में 15वीं, 16वीं और 17वीं शताब्दी से प्रकट होने लगे थे और 17वीं शताब्दी के मध्य में इन मापदंडों को पूरे ज़ोर के साथ लागू होते देखा गया जब प्लेग अपने पूरे शबाब पर था। और आज कोविड-19 के मापदंडों और इटली के फलोरैंस में 4 सौ साल के उन मापदंडों में तुल्यता देखी जा सकती है। महामारी से लडऩे की प्रक्रिया में आधिकारिक तौर पर पहले मरीज़ से संपर्क साधना उसे ढूंढना और मरीज़ को किसी निष्कर्ष पर पहुंचाने का लक्ष्य रखना था।

वह इटली में प्रारंभिक आधुनिक काल में प्लेग का महत्वपूर्ण वृतांत रहा। हैण्डरसन आगे बयान करते हैं कि ऐसे में सरकार-प्रशासन ने प्लेग के पहले मरीज़ को ढ़ूंढऩे और उससे पहचानने का लक्ष्य साधा जो शहर या देश में प्लेग को लेकर आया और उसके सम्पर्क में आने वाले लोगों को 40 दिन के लिए घर में या शहर के बाहर किसी बड़े क्वरैनटाइन सेंटर में आइसोलेट कर दिया। ऐसे में पहली बात तो यह कि 15वीं और 17वीं शताब्दी के बीच इटली में जब जब प्लेग फैला तो वहां लॉक डाउन और क्वरेैनटाइन जैसे मापदंडों की ज़्ारूरत महसूस की गई। कहना $गलत न होगा कि आज कोरोनावॉयरस के दौर में लॉक डाउन और क्वरैनटाइन जैसा महामारी कहें या विश्वमारी से लडऩे या उसे काबू पाने का भारत-जनित मापदंड या उपाय है।

आइए पाठको यह भी जाने कि 1631 में इटली की राजधानी फलौरैंस में बसने वाली आबादी को भी क्वरैनटाइन किया गया था। उस समय भी उन लोगों को अपने घरों की छतों या फिर बॉलकनी में खड़े हो कर आपस में बातचीत करने या फिर गाने आदि की इजाज़त दी गई थी। यहां तक कि वर्तमान में कोविड- 19 के दौर में भी हमने देखा कि इटली और स्पेन में लोगो ठीक उसी तरह गाते देखा। हैण्डरसन आगे लिखते हैं कि उस दौर में भी स्वास्थय अधिकारियों ने लोगो को इस बात के लिए निगरानी में रखा था कि वे घरों में रहें।

हैण्डरसन आगे वृतांत में यह भी स्पष्ट करते है कि 17वीं शताब्दी के मध्य में फैले प्लेग के दौर में जगह-जगह सेनेटाइस करने और लोगों के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में प्रवेश को बार्डरस् पर निषेध कर दिया गया था। उन्होंने यह भी लिखा है कि उस दौर मेें भी प्लेग अलग-अलग शहरों में प्लेग फैलने का सीज़न भी अलग -अलग ही था। हैण्डरसन के अनुसार फलोरैंस में फैला प्लेग करीब एक साल तक चला था। ऐसे में 17 वीं शताब्दी में फलोरैंस की कुल 75 हज़ार आबादी का 12 प्रतिशत हिस्सा मृत्यु को प्राप्त हुआ था। इन हालात मेें दूसरे शहरों से व्यापरिक गतिविधियां भी बंद कर दी गई थी। वहीं दूसरी अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापार बंद हो गया था जिसके चलते इटली को खासी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा था।

वहीं फलोरैंस जहां प्रमुखत: टैक्सटाइल इण्डिस्ट्री अत्याधिक सक्रिय थी को अत्याधिक नकुसान उठाना पड़ा था। हमने पाठकों बता दें कि हैण्डरसन ने अंत में लिखा है कि फलोरैंस में आखिकार जो सख्तियां प्लेग से लडऩे के लिए बरती गई उन में ढील देनी पड़ी। क्योंकि अन्य शहरों में तुलनात्म रूप से प्लेग से लडऩे के जो उपाय ढूंढ़े गए थे वे अधिक कारगर साबित हुए थे।

ऐसे में हम अपने पाठकों बता दें कि उस दौर में दमन की अपेक्षा दया को कैसे चुना और सही माना यानि अंग्रेज़ी भाषा में जिसे कहा (Compassion over repression)  जाता है। जैसा कि हैण्डरसन ने लिखा कि फलोरैंस यानि इटली की राजधानी जो थी वह टैक्सटाइल इण्डिस्ट्री का गढ़ था। इसलिए यह आर्थिक गतिविधियों के केन्द्र माना जाता था। ऐसे में वक्त़ की नज़ाकत को भांपते हुए वहां की ऑथोरटी ने इकोनोमिक तंगी को गति प्रदान करने के लिए अंत: समझौता किया और उक्त इण्डिस्ट्री को खुलकर काम करने की इजाज़त दी।

Our readers now must understand some of the concluding points to writer described. The other salient feature of the way the Florentine authorities handled the outbreak was the relatively mild system of justice. “ A high percentage of the 550- odd people who broke the quarantine rules were let off with simply a few days of imprisonment or minor fines. Although some were punished severely, overall the system appears to have been more compassionate when compared with measures taken by some other cities, such as Milan and Rome, during the plague outbreak in 17th century in Italy.”

                    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक है)

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