प्रकृति के रंगों से खेलें होली

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लेखक-ज्ञानेन्द्र रावत

होली का पर्व ऋतु परिवर्तन से जुड़ा संपूर्ण भारत का मंगल उत्सव है। शिशिर और हेमंत के बाद बसंत के आगमन की सूचना देता फाल्गुन मास वातावरण में हर्षोल्लास का रंग घोलने और जीवन की नीरसता दूर कर उसमें मधुरता के संचरण का काल है। वैदिक काल में भी ऐसे अवसरों पर लोग हास्य-परिहास, व्यंग-विनोद की भावना से आतप्रोत हो तन्मय होकर पूरा रस लेते थे। भविष्येत्तर पुराण में उल्लेख है कि होली को रंग उत्सव के रूप में मनावें और अबीर, गुलाल और चंदन को एक-दूसरे को लगावें। हाथों में पिचकारियां लेकर एक-दूसरे के घर जायें, रंग डालें और हास्य-विनोद में जुट जायें। लगभग आधी सदी पहले तक हमारे यहां होली टेसू, केसर, मजीठ आदि कुदरत के रंगों से खेली जाती थी। लेकिन आज बाजारीकरण के दौर में कुदरत के रंग न जाने कहां खो गए हैं और हम अपनी संस्कृति और सभ्यता को लगभग भुला ही बैठे हैं। अब तो होली पर पेंट, वार्निश व काले रंग जो राग-द्वेष बढ़ाते हैं, का प्रयोग बहुलता से होता है। हमारे यहां टेसू के वृक्ष का जिक्र ग्रंथों में मिलता है। इसको पलाश, त्रिशंकु और ढाक भी कहते हैं। इसके फूलों के रंग का प्रयोग होली पर प्राचीन काल से होता आया है। केसर का रंग केसर के पौधे से प्राप्त होता है। लेकिन यह महंगा है। कहा जाता है कि एक पौंड केसर में ढाई से पांच लाख सूखे वर्तिकाग्र पाए जाते हैं जिनको इकट्ठा करने के लिए कम से कम 71 हजार के लगभग फूलों कों तोड़ना पड़ता है। रत्नाकर ने अपनी कविताओं में टेसू के साथ मजीठ के रंग का वर्णन किया है। मजीठ के पौधे की जड़ से सिंदूरी रंग प्राप्त होता है। कुमायूं में इसे मजेठी व कश्मीर में टिंजाड़ू कहते हैं। इसका इस्तेमाल होली के दिन किया जाता है। इसी तरह एक पेड नील का है जिसके रंग का इस्तेमाल पहले होली पर किया जाता था। इनके अलावा डेढ़ सौ से भी ज्यादा ऐसे पेड़-पौधे हैं, जिनकी प्राकृतिक रंगों का उपहार देने में महत्वपूर्ण भूमिका है। गेंदा, गुलाब आदि ऐसे फूल हैं जिनके बने रंग स्वास्थ्य के लिए कदापि अहितकर नहीं हैं। बस इन्हैं 24 घंटे पानी में भिगोने और उसके बाद उसे मसलकर कपड़े से छान लेने की जरूरत है। यही नहीं चुकंदर को पानी में डालकर गहरा भूरा रंग भी बनाया जा सकता है।

प्राकृतिक रंगों से होली खेलना अनेकों बीमारियों से बचाता है। ये न तो शरीर के लिए हानिकारक है,ं न रंग में भंग के कारण बनते हैं। अक्सर बाजार में मिलने वाले गुलाल में अभ्रक और रेत आदि मिला होता है। रंगों को गहरा व चटख बनाने की खातिर मिलाए गए रसायन त्वचा पर दुष्प्रभाव डालते हैं। इनके आंख पर पड़ने से आंखों की रोशनी तक चली जाती है। देखने में सुन्दर, आकर्षक लगने और आंखों को सुकून देने वाले इन रंगों में माइका, अम्ल, क्षार, कांच के टुकड़े तक पाये जाते हैं। ये त्वचा, नेत्र रोग, कैंसर व सांस जैसे रोगों के कारण बनते हैं। गुलाल को रंगीन बनाने में ज्यादातर भारी घातुओं का इस्तेमाल होता है, जो जाने-माने सिस्टेमिक टाॅक्सिन हैं। ये न केवल गुर्दे, जिगर और हड्डियों में जमा हो जाते हैं बल्कि शरीर के मेटाबाॅलिक कामकाज को भी प्रभावित करते हैं। यदि ये आंख में चले जायें तो ओकुलर सर्फेस को क्षतिग्रस्त कर सकता है। इससे दृष्टिहीनता का खतरा रहता है। इसलिए होली पर प्राकृतिक रंगों का उपयोग हितकर है। होली के रंग में तन-मन दोनों रंग जायें, तभी होली के पर्व का आनंद आप नई उमंग और उल्लास के साथ उठा पायेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् हैं)

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