‘होनोरी एनिमल वेलफेयर अफसर से बनी बेज़ुबानों का सहारा’

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प्रीती दूबे
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पीपल फॉर एनिमल्स एनजीओ की प्रबंधक प्रीती दूबे संपूर्ण निष्ठा और ईमानदारी के साथ इस संस्था को चला रहीं हैं। इन्होने लगभग अपना पूरा जीवन पशुओं के नाम कर दिया है। इनकी निरंतर कोशिश यही रहती है कि वे किसी तरह से भटकते हुए पशुओं को उनके हक़ दिलवा सके, बिमारी में उनका अच्छे से इलाज करवा कर उन्हें पुनः स्वस्थ जीवन प्रदान करवा सके। इस एनजीओ को श्रीमती मेनका संजय गाँधी द्वारा अधिकार दिए गए हैं और प्रीती दूबे जी ये आश्वासन दिलाती हैं कि वे इस नेक काम को बहुत अच्छे तरीके से कर रही हैं। सेक्टर-86, बाई पास रोड, गुज्जर चौक, भूढेना, फरीदाबाद में स्थित यह एनजीओ व्यथित,घायल और चोटिल पशुओं को स्नेह और पारिवरिक माहौल  प्रदान करते हैं। इस एनजीओ के माध्यम से वे पशुओं के खिलाफ होने वाली क्रूरता के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं और यह सन्देश देते हैं की इंसानों की ही तरह जानवरों को भी दर्द, तकलीफ होती है, इनका भी परिवार होता है और सभी की ही तरह इन्हें भी जीवन जीने का संपूर्ण अधिकार है। उनका कहना है कि इस काम में उनका साथ मंगेतर प्रतीक डुल्लू दे रहे हैं। इनके साथ हुई अलाइव न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ तिलक राज शर्मा के निर्देशन में संवाददाता महक वर्मा द्वारा की गयी ख़ास बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं।

आपको पशुओं के लिए काम करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
पशुओं से मुझे सदा से ही बहुत लगाव रहा है और उनके लिए काम करना मेरा पैशन है। मैं एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया, बल्लबगढ़ से ट्रेनिंग लेकर होनोरी एनिमल वेलफेयर अफसर बनी हूँ।

इस काम के लिए आपको सबसे ज़्यादा प्रोत्साहन किससे मिलता?
इस काम में आगे बढ़ने के लिए श्रीमती मेनका गाँधी जी मुझे निरंतर प्रोत्साहित करती रहती हैं।

एनजीओ को लेकर आपकी भविष्य की योजनाओं क्या हैं?
मैं आपको बता दूँ कि हमारा समाज इन बेज़ुबानों के प्रति संवेदनशील हो और जिस प्रकार लोग अपने हक़ की लड़ाई लड़ते हैं, वे इन बेज़ुबानों के भी हक़ को ध्यान में रखते हुए उनकी क़द्र करें, इसके लिए हमने सोचा है की हम विद्यालयों में कैंपेन करें क्योंकि वे ही हमारे आने वाला कल हैं। इसके साथ साथ मैं फरीदाबाद में गायों के लिए अस्पताल बनवाना चाहती हूँ ताकि हम गायों का इलाज और सर्जरी यहीं पर करवा सकें। मैं चाहती हूँ कि बेज़ुबानों के साथ होने वाले जुर्मों के खिलाफ सख्त कार्यवाई की जाए। और जो भी आज तक के नियम बनाए गए हैं पशुओं के कल्याण के लिए उन्हें सिर्फ कागज़ों पर नहीं बल्कि असल ज़िन्दगी में भी लागू किया जाए।

पीएफए, पशुओं के हित में काम करने वाले अन्य एनजीओ से अलग कैसे है?
पीएफए सम्पूर्ण रूप से स्वयं संचालित संस्थान है जिसे सरकार से कोई सहायता नहीं मिल रही है। ये एनजीओ सिर्फ कहता नहीं हैं बल्कि वास्तव में पशु कल्याण में काम करता है। हमारे पास हमारा खुद का एनिमल बर्थ कंट्रोल यूनिट है जिसे हमने स्वयं डिज़ाइन किया है। नस बंदी के बाद हम पशुओं के दाएं कान पर निशान लगा देते हैं, जिससे यह याद रहता है कि इस जीव से अब किसी को कोई खतरा नहीं है और ना ही ये अब अपनी प्रजाति आगे बढ़ा सकता है, जबकि कुछ अन्य संस्थाएं केवल यह कहती हैं कि उन्होंने इस दिशा में काम किया है, मगर किया नहीं होता। इन सबके इलावा हम पशुओं को एक ऐसे परिवार दिलवाते हैं जहां उनको अपनाया जा सके और प्यार मिले।

आप जनता और सरकार से किस प्रकार के सपोर्ट की अपेक्षा रखते हैं?
जनता से मैं बस यही अपेक्षा रखती हूँ कि वे जानवरों के प्रति नेक और मेहरबान रहें। उन्हें खाना और पानी समय समय पर देते रहे। जो खाना वे मंदिरो में चढ़ाते हैं उसे इन भूखे बेज़ुबान पशुओं को दें। आर्थिक रूप से थोड़ा थोड़ा उन संस्थाओं को अवश्य दें जो वाकई इस क्षेत्र में काम कर रही हैं या करना चाह रही हैं। और हो सके तो दवाइयां और जानवरों का खाना भी दें। या फिर उन्हें पाल ही लें। सरकार की वजह से हमें फंड्स की बहुत कमी है। नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग के साथ संस्था का आवारा कुत्तों की नसबंदी के लिए एमओयू जुलाई 2018 में हुआ था जिसके बाद से उन्होंने आवारा पशुओं के लिए अस्पताल में ट्रीटमेंट शुरू किया था। लेकिन सितम्बर 2018 से वो फंडिंग भी बंद हो चुकी है। इस समय पशु चिकित्सकों और संस्था के कर्मचारियों तक की फीस और तनख्वाहें नहीं दी जा रही हैं। ये पहली संस्थान है जिसने फरीदाबाद शहर के आवारा पशुओं की चिकित्सा और नस बंदी का काम शुरू किया है। दूसरी ओर सरकार की ओर से भी किसी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिल रही।

अभी तक आपने कितने आवारा पशुओं की नस बंदी का कार्य किया है?
हमने नस बंदी का काम जुलाई, 2018 से शुरू किया है। हमारा लक्ष्य प्रति माह 300 पशुओं का लिंग निकाल कर नस बंदी करने का होता है। हम हर महीने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होते हैं और जनवरी 2019 में हमने 400 पशुओं की रिप्रोडक्टिव ग्रोथ को रोक दी थी।

पशुओं के ट्रीटमेंट और बाकी कामों के लिए फाइनेंस कैसे व्यवस्थित किये जाते हैं?
एक आवारा कुत्ते के ट्रीटमेंट पर कुल खर्च करीब 1500 /- रुपये आता है। संस्थान को नगर निगम द्वारा 850 /- रुपये प्रति नस बंदी के हिसाब से देना तय हुआ था लेकिन समय पर वो भी नहीं मिल पा रहा है। इनके ट्रीटमेंट के लिए हमे चिकित्सकों को कॉल कर कर के बुलाना पड़ता है क्योंकि यहाँ पशुओं के लिए कोई अस्पताल नहीं है। अस्पताल में खुद के खर्चे पर उनका वाहन जाता है और उसके साथ में कैप्चर टीम जाती है। पहले पकड़ते हैं फिर ट्रीटमेंट करने के बाद उन्हें छोड़ने का कार्य भी संस्था के खर्चे पर ही होता है। ऐसे में संस्था आर्थिक तंगी से जूझ रही है। क्योंकि जो काम एमसीएफ को करना चाहिए वह भी संस्था ही करती है फिर भी एमसीएफ की ओर से कोई सहयोग नहीं है, न ही वे कुछ करते हैं। यदि फरीदाबाद के नगर निगम क्षेत्र में कोई पशु दुर्घटना ग्रस्त है या फिर बीमार है तो हमारी संस्था के हेल्पलाइन नंबर 8527273027 पर कॉल कर सकते हैं। उनकी संस्था पूरी सहायता करेगी।

 
 
  
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