जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर दिल्ली के लोग

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ज्ञानेन्द्र रावत

देश की राजधानी दिल्ली के लोग आजकल जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। इसका अहम् कारण पड़ोसी राज्यों यथा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं पंजाब के किसानों द्वारा जलायी जाने वाली पराली को बताया जा रहा है। जबकि सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते वाहन, उनपर अंकुश न लगना, समय पर उनकी जांच न होना, इससे होने वाली प्रदूषण में 40 फीसदी, औद्योगिक क्षेत्र में 48 फीसदी की बढ़ोतरी की भी इसमें अहम् भूमिका है लेकिन पराली का योगदान सर्वाधिक है।

यह कटु सत्य है। असलियत यह है कि मौजूदा समय में देश की राजधानी दिल्ली की हवा देश में सबसे ज्यादा खराब है। ठंड शुरू होने से पहले ही दिल्ली एनसीआर की हवा देशभर में सबसे ज्यादा खराब हो गई है। राजधानी दिल्ली के अलावा गुजरात में अहमदाबाद ही एकमात्र ऐसी जगह है जहां हवा की गुणवत्ता बेहद खराब स्थिति तक पहुंच गई है। अक्सर पाया जाता है कि अक्टूबर महीने के अंत और नवम्बर महीने की शुरूआत में दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण कुछ अधिक ही होता है लेकिन इस बार ठंड का असर कुछ पहले ही दिखाई देने लगा जिसके चलते प्रदूषण की मार समय से पहले ही दिल्ली वासियों को बेजार कर रही है।
क्योंकि समूची दिल्ली भयंकर प्रदूषण की चपेट में है। यह कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं होगा कि दिल्ली गैस चैम्बर का रूप अख्तियार कर चुकी है। यही वो अहम् वजह है जिसने राजनीतिक दलों को सियासत करने का एक और सुनहरा मौका दे दिया है। दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसैदिया कहते हैं कि दिल्ली समेत उत्तर भारत के लोग कुछ राज्यों और केन्द्र सरकार की नाकामी के चलते ऐसे हालात में रहने को मजबूर हैं। दिल्ली का प्रदूषण खतरनाक स्थिति तक पहुंचने के पीछे यहां के अंदरूनी कारण नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों खासकर हरियाणा और पंजाब में जलायी जा रहीे पराली है। पुराने अध्ययन इसके जीते-जागते प्रमाण हैं।
देखा जाये तो पंजाब और हरियाणा में लगभग 30 मिलियन टन से भी अधिक पराली का कुल उत्पादन होता है। इसमें लगभग 23 मिलियन टन पराली हर साल दोनों राज्यों के किसानों द्वारा जला दी जाती है। जबकि इस साल अभी 90 फीसदी से अधिक फसल की कटाई होना बाकी है। इन दिनों वे ही किसान अपनी फसल काट रहे हैं जिन्हें आलू, मटर और चारे का उत्पादन करना है। जब पूरी फसल कटेगी, उस समय स्थिति क्या होगी, इसकी कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
इससे साफ है कि आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह होगी। जबकि पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यह दावा करते नहीं थकता कि बीते दो सालों की तुलना में इस साल पराली जलाने की घटनाएं पांच गुना तक कम हुईं हैं। यह समझ से परे है। उस हालत में जबकि पंजाब में पराली के निपटारे की दिशा में किसी खास तकनीक का भी प्रयोग नहीं किया गया है। यहां गौरतलब है कि बीते साल पराली से होने वाले प्रदूषण की समस्या के समाधान हेतु दिल्ली के मुख्ष्मंत्री अरविंद केजरीवाल चंडीगढ़ जाकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मिले थे। उस समय कहा गया था कि 2018 में ऐसा नहीं होगा। लेकिन पराली जलाने वाले किसानों के लिए उचित योजना न होने के कारण वे पराली आज भी जला रहे हैं जिसका असर यहां दिखाई दे रहा है।
 बीते साल केन्द्र सरकार ने राजधानी में प्रदूषण पर लगाम लगाने और उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसानों को राहत देने के लिए उनसे पराली खरीदने का निर्णय लिया था। उसका मानना था कि केन्द्र इस पराली से बिजली बनाऐगा। उस समय लिए सरकार के निर्णय के अनुसार धान की फसल कटने के बाद खेतों में बचे अवशेष यानी पराली के निस्तारण के लिए अपने निर्णय को इस समस्या के समाधान हेतु इसे बड़ा बाजार मुहैया कराने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया था। सरकार ने तब कहा था कि अब थर्मल पॉवर स्टेशनों में ईंधन के तौर पर कोयले के साथ 10 फीसदी पराली जलायेगी।
वह किसानों से एनटीपीसी के माध्यम से 5500 रुपये प्रति टन के हिसाब से पराली खरीदेगी। इससे प्रदूषण की समस्या हल होगी, वहीं किसानों को भी फायदा होगा। एनटीपीसी पराली खरीदने के लिए टेंडर जारी करेगी और पॉवर स्टेशनों में पराली का इस्तेमाल अनिवार्य किया जायेगा। पराली का बाजार तैयार कर सीधे तौर पर या किसी सेवा प्रदाता के माध्यम से या उसके साथ किसान समझौता कर बोली लगा सकते हैं। एक अनुमान के अनुसार एक एकड़ में करीब दो टन से अधिक पराली होती है। सरकार के अनुसार इस योजना से किसानों को 11 हजार रुपये प्रति एकड़ का फायदा होगा।
इसके अलावा बीते साल ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि वह इस भीषण समस्या का स्थायी समाधान निकाले। यही नहीं पराली से कम्पोस्ट खाद बनाने की दिल्ली हाईकोर्ट से भी मांग की गई थी। इसे मनरेगा से जोडऩे का सुझाव दिया गया था। इससे जहां किसानों की पैदावार बढ़ती, वहीं प्रदूषण पर भी लगाम लगती। पंजाब सरकार ने तो यहां तक कहा था कि केन्द्र पुआल प्रबंधन मशीनों का सौ फीसद खर्च उठाये। मौजूदा समय में इन मशीनों की खरीद में केन्द्र 60 फीसदी और 40 फीसदी खर्च राज्य को उठाना होता है। पंजाब सरकार ने इस बाबत एनजीटी से निर्देश जारी करने की भी मांग की थी। एनजीटी ने इस सम्बंध में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली को कड़े निर्देश जारी किये थे। पंजाब सरकार ने पराली नहीं जलाने वाले किसानों को प्रति कुंतल पराली पर 100 रुपये के मुआवजे की घोषणा की थी लेकिन किसी अन्य राज्य ने इस बाबत कोई कदम नहीं उठाया और न केन्द्र सरकार ने ही पुआल प्रबंधन मशीनों की खरीद में राज्य को कोई राहत ही दी। पंजाब सरकार ने एनजीटी को सुझाव दिय ाथा कि सौर उर्जा अभियान की तरह ही बायोमास उर्जा अभियान चलाया जाये। इसमें पुआल का इस्तेमाल किया जाता है। पंजाब सरकार ने केन्द्र से मांग की थी कि राज्य में कार्ड बोर्ड बनानेवाली निर्माण इकाइयों को कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व से मुक्त किया जाये।
बीते साल ही केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने पराली जलाने की निगरानी उपग्रह से कराये जाने की घोषणा की थी और जापान ने तो साल की शुरूआत में ही इस समस्या से निपटने में मदद की पेशकश की थी लेकिन हुआ कुछ नहीं जिसका नतीजा सबके सामने है। किसानों की मानें तो एक एकड़ खेत में पराली जलाने में एक से डेढ़ हजार रुपये का खर्च आता है, वहीं खेत में मल्चर, रूटावेटर जैसी मशीनों के जरिये पराली के प्रबंधन किये जाने में पांच से छह हजार रुपये प्रति एकड़ का खर्च आता है जो पराली जलाने में आने वाले खर्च से पांच गुना ज्यादा है। यह खर्च कर पाना किसानों के बूते के बाहर की बात है। ऐसे में इस समस्या का समाधान कौन करेगा। इसकी जिम्म्ेदारी कौन लेगा ? यह बहस का विषय है। इस बाबत यदि मुख्यमंत्री केजरीवाल की मानें तो वे कहते हैं कि हम बेहद दुखी हैं। केन्द्र सरकार, हरियाणा और पंजाब सरकार किसानों के लिए कुछ नहीं कर रही है। इसी का कारण है कि वहां के किसान पराली जलाने को मजबूर हैं। नतीजतन दिल्ली एनसीआर के लोग जहरीली हवा या यूं कहें के गैस चैम्बर में सांस लेने को मजबूर हैं।
इस बाबत सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण प्राधिकरण ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ेंगे क्योंकि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाये जाने से उठने वाले धुंऐं और हवा का रुख दिल्ली की ओर होगा। इससे जलने वाली पराली का धुंआं दिल्ली के आसमान पर छा जायेगा। फिर मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार एक नवम्बर से मौसम की स्थिति विपरीत होने का अनुमान है। वहीं पर्यावरणविद् एवं ईपीसीए की सदस्य सुनीता नारायण के अनुसार इस दौरान हवा की गति कम होऩे की आशंका है। क्योंकि इस दौरान पंजाब एवं हरियाणा में सबसे ज्यादा पराली जलाई जाती है। फिर 7 नवम्बर को दिवाली भी है, पटाखों से भी प्रदूषण बढ़ेगा, साथ ही सर्दी भी दिन-ब-दिन बढ़ रही है। भले केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक 1 से 10 नवम्बर के बीच दिल्ली एनसीआर में निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई हो, इसके बावजूद हालात बिगड़ेंगे, प्रदूषण बढ़ेगा। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यदि पराली जलाने पर नियंत्रण लगाने में सरकार नाकाम रही तो 2050 तक फसलों के अवशेष जलाने से होने वाले प्रदूषण में करीब 45 फीसदी की बढ़ोतरी हो जायेगी।
इसका खुलासा बीते दिनों ‘जर्नल ऑफ क्लिनर प्रोडक्शन’ नामक शोधपत्र में किया गया है। इसके अलावा सर्दी में प्रदूषण की वजह से हृदय, श्वांस, फेफड़े, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, सांस की नली में सिकुडऩ, घुटन, ब्रेन स्र्टेक, डिमेंशिया, जोड़ों एवं आस्टियोपोरोसिस आदि रोगों के शिकार लोगों की तादाद में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी ही, नवजात बच्चों के फेफड़े तक प्रभावित होंगे। उस हालत में जबकि देश में आमतौर पर वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों का प्रतिशत 23 से भी अधिक है और संक्रामक बीमारियों में सांस सम्बंधी बीमारियों का प्रतिशत 69 से कहीं ज्यादा है। और यह कि शंघाई और बीजिंग से भी ज्यादा मौतें वायु प्रदूषण से दिल्ली में होती हैं। हालात गवाह हैं कि बीते चार महीनों में दिल्ली की हवा सबसे ज्यादा खराब हुई है। पिछले तीस दिनों में वायु प्रदूषण की मात्रा में 11 गुणा बढ़ोतरी दर्ज की गई है और जब वायु गुणवत्ता सूचकांक 400 का आंकड़ा भी पार कर गया हो, तब यह खतरनाक संकेत है कि दिल्ली के लोग मौत के मुहाने पर खड़े हैं और उनका कोई पुरसाहाल नहीं है।

लेखक एक पत्रकार एवं पर्यावरणविद् है

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