कातोवित्से जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से कुछ बदलाव नहीं होगा : ज्ञानेन्द्र रावत

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बीते दिनों पोलैंड के कातोवित्से शहर में 2 से 14 दिसम्बर तक चला संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन सम्मेलन बिना किसी निर्णय के समाप्त हो गया। यह सम्मेलन जिसमें दुनिया के तकरीब 200 देशों ने भाग लिया, का अधिकांश समय पेरिस सम्मेलन के लक्ष्यों को लागू करने में हुई बहस में ही बीता और अंतिम दिन तक कोई परिणाम सामने नहीं आ सका। सबसे बड़ी बात यह कि इस सम्मेलन में दुनिया के देश अधिकतर समय में वित प्रवाह आदि मुद्दों को लेकर विकासशील और विकसित देशों के बीच पैदा गतिरोध सम्मेलन के आखिरी दिन तक दूर करने में ही लगे रहे। दुख इस बात का है कि इसके बावजूद वह अपने उद्देश्य में नाकाम ही रहे। जबकि अब इसमें कोई दो राय नहीं कि जलवायु परिवर्तन के चलते पैदा दुष्प्रभावों को मानवता के सामने खड़े सबसे बड़े और भयावह संकट के रूप में देखा जा रहा है। यह सबसे बड़ा चिंतनीय विषय है कि यदि अब भी नहीं चेते तो हालात से निपटना टेढ़ी खीर होगी। यही वह अहम् वजह है जिसके कारण संयुक्त राष्टर्् ने कहा है कि हम मानवता के समक्ष विनाश का पर्याय बनकर खड़े जलवायु परिवर्तन को रोकने की अपनी योजना के क्रियान्यन से अभी बहुत दूर खड़े हैं। यदि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस की मानें तो हम अभी अपेक्षा से बहुत कम प्रयास कर रहे हैं। इस दिशा में हमारी गति बहुत ही धीमी है। जबकि हमें जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने की दिशा में तेजी से काम करना होगा। उन्होंने इसकी अहमियत का ध्यान दिलाते हुए कहा भी है कि इस अवसर को बेकार में गंवाना बेरोक बढ़ते जाते जलवायु बदलाव को थामने के आखिरी मौके को गंवाने, कमजोर करने के समान होगा। यह न केवल अनैतिक, बल्कि आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम होगा। इस मुद्दे पर तत्काल कार्यवाही की जरूरत है।
असलियत यह है कि मौजूदा सदी के अंत तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान कम करने के लक्ष्य को तभी पूरा किया जा सकता है कि जब जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्र्सजन को वर्ष 2030 तक आधा कर दिया जाये। वर्ष 2015 में हुए पेरिस सम्मेलन में भी वैश्विक तापमान दो डिग्री सेल्सियस से कम रखने का लक्ष्य रखा गया था। जबकि विभिन्न शोध और अध्ययन रिपोर्टों के अनुसार 2030 तक वैश्विक तापमान में एक डिग्री की बढ़ोतरी होगी, 2040 तक यह 1.5 और 2065 तक दो डिग्री तक हो जायेगी। आईपीसीसी तक ने यह साफ कर दिया है कि यदि रोकथाम के समय रहते कारगर उपाय नहीं हुए तो 2100 तक यह बढक़र चार डिग्री तक हो सकती है। विडम्बना यह है कि अमरीका और रूस आदि देश आईपीसीसी की रिपोर्ट को ही खारिज करते आये हैं। यह देश इन प्रयासों से अब भी दूरी बनाये हुए हैं। सम्मेलन में अमरीकी प्रतिनिधियों ने यह साफ कर दिया है कि दुनिया जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल करती रहेगी।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो यह बार-बार कहते रहे हैं कि पेरिस समझौते को ही खारिज कर देना चाहिए। पेरिस समझौते से अमरीका को अलग कर चुके ट्रंप कहते हैं कि पहले चीन और जापान समेत संपूर्ण एशिया और अन्य देश उत्सर्जन कम करें। जाहिर है कि इस तरह के अमरीकी रवैये से जलवायु परिवर्तन रोकने के प्रयासों को ही नुकसान पहुंचेगा। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। जबकि अमरीका की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्टर््ेशन की रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि अमरीका ने जलवायु परिवर्तन पर अंकुश के प्रयास नहीं किये तो उसे सदी के अंत तक अरबों-खरबों डालर की बहुत बड़ी क्षति का सामना करना पड़ेगा। यह अमरीका के कई राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद से कहीं बहुत अधिक होगा। पूरी दुनिया पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्र्सजन में अधिकाधिक कटौती का दबाव है। आईपीसीसी की बीते महीने आई रिपोर्ट में जिस तरह तापमान में डेढ़ और दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी का आकलन किया गया था, उसके बाद पूरी दुनिया में इसे डेढ़ डिग्री तक सीमित रखने की जरूरत महसूस की जा रही है।
सबसे बड़ी बात यह कि पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों ने 2020 तक विकासशील देशों को प्रतिवर्ष 100 अरब डालर की आर्थिक सहायता देने पर सहमति प्रदान की थी लेकिन यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि अभी तक विकसित देश इस मद में वर्ष 2016 के दौरान केवल 55 अरब डालर की राशि ही इक_ी कर सके हैं। यह राशि न केवल लक्ष्य से बहुत दूर थी बल्कि जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की दिशा में इस राशि का मात्र एक चौथाई ही दिया गया। हरित कोष में अभी तक केवल 6 अरब डालर की राशि का एकत्रित न होना विकसित देशों की उदासीनता को ही दर्शाती है। यही नहीं कात्सोवित्से के जलवायु वित के मसौदे में 2020 के बाद के जलवायु वित्त को लेकर कोई नये दीर्घावधि लक्ष्य पर सहमति बनी ही नहीं। जबकि विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन सम्बंधी कार्रवाइयों की लागत कम से कम तकरीब 100 अरब डालर से कहीं अधिक होगी।
उस हालत में जबकि अकेले जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन सम्बंधी कार्यों में तकरीबन लागत 140 से 300 अरब डालर प्रतिवर्ष आने वाली है। इस मसौदे में केवल पिछले 100 अरब डालर के लक्ष्य तक ही सीमित रखा गया और विकसित देशों से उसी लक्ष्य को हासिल करने का आह्वान किया गया। साथ ही मसौदे में आशा के अनूरूप पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों द्धारा जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु संकल्प पूर्ति हेतु अपने देशों में बजटीय प्रावधान के उल्लेख का न किया जाना और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से विस्थापित 12 करोड़ लोगों की क्षतिपूर्ति के सवाल पर कोई सहमति न होना समझ से परे है।
सच तो यह है कि भारत समेत राष्र्टें ने उत्र्सजन में कमी के जो लक्ष्य पूर्व में निर्धारित किये हैं, वह तापमान बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री तक सीमित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। दरअसल जलवायु परिवर्तन से होने वाले खतरों को कम आंका जा रहा है। जबकि हकीकत में अध्ययनों-शोधों ने साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन की चपेट में आने वालों की तादाद में बीते चार सालों के दौरान हमारे देश में लगभग 200 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2012 से 2016 के बीच यह तादाद चार करोड़ को पार कर गई है। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण तापमान में बढ़ोतरी और तबाही की बढ़ती घटनायें हैं। इसका असर सबसे ज्यादा कम आय वाले देशों पर पड़ रहा है। इसमें भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की सूची में शीर्ष पर है।
लांसेट की रिपोर्ट इसका प्रमाण है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के खतरों से होने वाली मौतों में हमारे देश में उच्च आय वाले देशों की तुलना में सात गुणा ज्यादा मौतें होती हैं और घायल व विस्थापित होने वाले लोगों की तादाद हमारे यहां छह गुणा ज्यादा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 20 फीसदी हिस्सा जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे में है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव देश की आधी आबादी पर पड़ा है जबकि देश का 17 फीसदी आर्थिक उत्पादन बुरी तरह प्रभावित है। 2.80 करोड़ हेक्टेयर गेंहूं की खेती में 90 लाख हेक्टेयर खेती पर बढ़ते तापमान का दुष्प्रभाव पड़ा है।
कृषि क्षेत्र की पैदावार में 4 से 5 फीसदी की कमी दर्ज की जा चुकी है। इससे अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुए बिना नहीं रही है। इससे भारत को प्रति वर्ष उसकी जीडीपी को 1.5 फीसदी का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसमें दिनोंदिन तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। वह बात दीगर है कि देश में जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं लेकिन वह नाकाफी हैं। अगर तापमान को 1.5 डिग्री से अधिक बढऩे दिया गया तो यह निश्चित है कि आने वाले समय में देश निर्जन और गरीब हो जायेगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि जलवायु परिवर्तन की समस्या से समूची दुनिया जूझ रही है लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है कि हमारा देश इससे सर्वधिक प्रभावित है। इससे कृषि क्षेत्र के लिए मुसीबतें बढ़ी हैं। दुनिया भर में बारिश की सालाना तय मात्रा की आधी बारिश अब महज 12 दिन में ही हो जाती है। मौजूदा हालातों के चलते यह समय घटकर इस सदी के अंततक 11 दिन ही रह जायेगा। एकदम से कम समय में भारी बारिश होने से बाढ़ की प्रबल संभावना जिससे फसलों की बर्बादी व जन-धन की हानि होगी, गर्मी की अवधि बढ़ेगी, समुद्र का जलस्तर बढऩे से अरब सागर और तटीय क्षेत्र में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा, इससे तटीय इलाकों में रहने बसने वाले लोगों के जीवन के साथ पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान होगा, गंगा, ब्रह्मपुत्र व महानदी के मुहाने के आसपास के वाशिंदों के जीवन पर खतरा बढ़ेगा, सूखा पड़ेगा, मक्का, चावल, गेंहूं, आदि दूसरे अनाजों की पैदावार में कमी आयेगी, गेंहूं-चावल की गुणवत्ता और खाद्य-पदार्थों की उत्पादकता प्रभावित होगी, पशुधन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, पानी के स्रोतों में कमी आयेगी और मलेरिया, डेंगू जैसे कीटजनित रोगों में बेतहाशा वृद्धि होगी।
यहां यह गौरतलब है कि भले भारत ने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने में अपने प्रयासों से अपनी रैंक में सुधार कर लिया है और जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए काम कर रहे देशों की वैश्विक सूची में भारत को 11वां स्थान दिया गया है जबकि पिछले साल भारत 14वें स्थान पर था। यहां यह जान लेना जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक सीसीपीआई 2019 शीर्षक रिपोर्ट को जर्मन वॉच, न्यू क्लाइमेट इंस्टीट्यूट तथा क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क ने तैयार किया है। इसमें यूरोपीय संघ समेत 56 देशों ने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए कियसे जा रहे उपायों का विश्लेषण किया गया है। ये 56 देश कुल मिलाकर 90 फीसदी कार्बन उत्र्सजन के लिए जिम्मेदार हैं। इसमें पेरिस समझौते तहत तापमान बढ़ोतरी को दो डिग्री नीचे रखने के उपायों का विश्लेषण किया गया है। इसमें मौजूदा कार्बन उत्र्सजन, हरित उर्जा के इस्तेमाल, प्रति व्यक्ति उत्र्सजन के आंकड़ों को आधार बनाया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 56 में से 40 देशों के उत्र्सजन में कमी आई है। इसके बावजूद यह अब भी लक्ष्य के हिसाब से काफी नहीं है। यही वजह है कि रिपोर्ट में पहले तीन स्थान किसी भी देश को नहीं दिए गए हैं। चौथे स्थान पर स्वीडन रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि दुनिया में सबसे बड़े प्रदूषक देशों में से चीन को 33वें और अमेरिका को 58वें स्थान पर रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार जी-20 देशों के समूह में शामिल आठ देशों यथा जापान, तुर्की, रूस, आस्टर््ेलिया, कनाडा, सउदी अरब, अमेरिका तथा कोरिया का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है।
भारत में कोयला आधारित परियोजनाओं की मंजूरी से स्थिति भयावह होती जा रही है। इसलिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। देश में कोयला आधारित बिजली घर बंद करना एक बहुत बड़ी चुनौती है। चिंता की बात तो यह है कि कोयले के इस्तेमाल से पैदा होने वाले बेहद महीन कणों की वजह से हुए प्रदूषण से समूची दुनिया में तकरीब 16 फीसदी लोगों की मौत होती है। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में इस पर काबू पाना असंभव है। पर्यावरण जैसे अहम् मुद्दे पर अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित प्रयास से ही कामयाबी की उम्मीद की जा सकती है। इस दिशा में वैश्विक स्तर पर प्रयास बेमानी ही कहे जा सकते हैं। पोलैंड के कातोवित्से में हुआ सम्मेलन इसका सबूत है। इसलिए जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटना अभी एक सपना ही कहा जायेगा। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।

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