कैसे बचेगी जलवायु परिवर्तन के खतरों से दुनिया : ज्ञानेन्द्र रावत

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ज्ञानेन्द्र रावत

जलवायु परिवर्तन की समस्या समूचे विश्व के लिए एक गंभीर चुनौती है। असलियत यह है कि इस समस्या से समूचा विश्व जूझ रहा है। इससे निपटने की दिशा में वह चाहे कोपेनहेगन हो, वारसा हो, दोहा हो, पेरिस हो, या फिर वह चाहे बॉन सम्मेलन ही क्यों न हो, किसी से भी कोई कारगर परिणाम सामने नहीं आ सका है। बीते माह सैनफ्रांसिस्को में ग्लोबल क्लाइमेट एक्शन समिट में जलवायु परिवर्तन के खतरों और चुनौतियों से निपटने की जिम्मेवारी संभालने वाली एजेंसियों के प्रमुखों ने पेरिस सम्मेलन के समझौते के अनुरूप लक्ष्यों को हासिल करने के उपायों की पर्याप्तता पर गहन चर्चा की। इसमें एक अधिकारिक समझौते पर सहमति भी बनी। इसमें कहा गया कि जलवायु परिवर्तन से कृषि, वन और भूमि क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हैं। अभी तक इन क्षेत्रों पर ध्यान ही नहीं दिया गया है। क्योंकि इन क्षेत्रों की गतिविधियों से होने वाला उत्सर्जन काफी चुनौतीपूर्ण है।

इन क्षेत्रों में सुधार बेहद जरूरी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वाहनों, ट्रेनों और विमानों के मुकाबले कृषि कार्य, वनीकरण, खाद्यान्न उत्पादन की प्रक्रिया में ज्यादा उत्सर्जन होता है लेकिन दुखदायी बात तो यह है कि इन क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए दुनिया में खर्च की जा रही धनराशि का महज तीन फीसदी ही इन क्षेत्रों में खर्च किया जा रहा है। इसका दुष्परिणाम खाद्यान्न संकट के रूप में सामने आयेगा। यह भूमि की क्षमता में नई तकनीक के इस्तेमाल के बिना असंभव है। जाहिर है कि इस मुद्दे पर आगामी महीने पोलेंड में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की ’कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज’ की बैठक में चर्चा होगी। समझौते के अनुसार पोलेंड में ’कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज’ में इन क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए न सिर्फ चर्चा की जाये बल्कि 2030 तक कृषि एवं खाद्यान्न क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में कम से कम 30 फीसदी की कमी लाने और वनों एवं परिवास के बेहतर संरक्षण के उपाय ताकि वे अधिकाधिक मात्रा में कार्बन सोख सकें के लक्ष्य निर्धारित किये जायें जो सभी राष्ट्रों के लिए बाध्यकारी हों।

स्थिति की भयावहता की ओर संकेत तो बीते दिनों दक्षिण कोरिया के इंचियोन शहर में जलवायु परिवर्तन पर जारी आईपीसी की रिपोर्ट ही करने के लिए काफी है। उसमें कहा गया है कि अंर्तराष्ट्र्रीय समुदाय को वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दूरगामी प्रभाव से बचने के लिए शीघ्र ही आपात स्तर पर प्रयास करने होंगे अन्यथा गंभीर नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। आईपीसी की मानें तो यदि मौजूदा दर से वैश्विक तापमान बढ़ता रहा तो वर्ष 2030 से 2052 तक के बीच तापमान में बढ़ोतरी 1.5 डिग्री सेल्सियस हो सकती है। हमारी धरती अबतक एक डिग्री सेल्सियस गरम हो चुकी है, अब तापमान में हर 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी मानव जाति के लिए गंभीर नतीजे की आहट होगी। विश्व मौसम संगठन प्रमुख की मानें तो कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है।

अगर जल्द कदम नहीं उठाये गए तो हालात भयावह होंगे। उनके अनुसार कार्बन डाई ऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में त्वरित कटौती नहीं की गई तो सदी के अंत तक तापमान में बढ़ोतरी खतरनाक स्तर तक पहुंच जायेगी। यह पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के लक्ष्य से उंचा होगा। संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछली बार धरती पर इसी तरह के हालात 30 से 50 लाख साल पहले थे। उस समय समुद्र का जलस्तर आज के मुकाबले 20 मीटर उंचा था। ब्रिटेन की ओपेन यूनीवर्सिटी और शेफील्ड यूनीवर्सिटी का ताजा अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक तापमान का अगले 100 सालों में 1.5 डिग्री सेल्सियस से उपर नहीं बढऩे देने का लक्ष्य हासिल कर लेने के बावजूद विश्व के संवेदनशील क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से जूझना पड़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण पूर्व एशियाई मानसून क्षेत्र जैसे विश्व के क्षेत्रों को अपरिवर्तनीय क्षति होने का अंदेशा है क्योंकि यह विशेष रूप से वैश्विक तापमान में परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हैं।

जहां तक भारत का सवाल है, बरसों से दुनिया के वैज्ञानिक, शोध, अध्ययन इस बात की चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन से भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता बुरी तरह प्रभावित होगी, सूखा पड़ेगा, समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, समुद्र तटीय इलाकों में रहने-बसने वाले लोग विस्थापन के शिकार होंगे, नतीजतन करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार होकर मौत के मुंह में जाने को विवश होंगे। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की सालाना समीक्षा रिपोर्ट भी इस बात को प्रमाणित करती है कि जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव देश की आधी आबादी पर पड़ा है जिसके चलते देश का 17 फीसदी आर्थिक उत्पादन प्रभावित हुआ है। इससे देश के भौगोलिक क्षेत्र का कुल 20 फीसदी हिस्सा खतरे में है।

हालात इतने विषम हैं कि देश के तकरीब 151 जिलों के पेड़-पौधे, फसलें और मवेशियों के उपर खतरा मंडरा रहा है। अध्ययन के मुताबिक देश की कुल 2.80 हेक्टेयर गेंहूं की फसल में से 90 लाख हेक्टेयर फसल पर तापमान में बढ़ोतरी का दुष्प्रभाव पड़ा है। इससे चावल, गेंहूं, मक्का आदि अनाजों की पोषकता में भी तेजी से कमी आती जा रही है। तेजी से बदलता मौसम न सिर्फ अर्थव्यवस्था बल्कि राजनीति और समाज को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। यह चिंतनीय तो है ही, खतरनाक संकेत भी है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि मौजदा दौर में जिस तेजी से तापमान में बढ़ोतरी हो रही है, उससे ऐसा लगता है कि आने वाले 50-60 साल बाद तापमान में बढ़ोतरी की दर 3 से 3.5 डिग्री तक हो जायेगी। उस समय की स्थिति की कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

हमारे देश में जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के दावे तो बहुतेरे किये जाते हैं लेकिन पेरिस सम्मेलन के समझौते के अनुरूप तापमान बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित किये जाने के प्रयास के मामले में हमारा देश कोसों दूर है। हमारे पर्यावरण मंत्री तक यह स्वीकारते हैं कि पर्यावरण रक्षा के मामले में अधिकारी लापरवाह हैं। ब्राउन टू ग्रीन-2018 की रिपोर्ट इस कथन की जीती-जागती प्रमाण है। उसके अनुसार 2030 तक भारत में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी करीब-करीब दोगुणे की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। अभी यह 2454 मिलियन टन के करीब है जो 4570 मिलियन टन तक पहुंव जायेगी। यह उत्सर्जन दो डिग्री तापमान बढ़ोतरी के परिदृश्य से भी बहुत ज्यादा है। जबकि भारत ने 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की तीव्रता में 33-35 फीसदी कमी लाने की घोषणा की थी। यह पेरिस समझौते के डेढ़ डिग्री के लक्ष्य से भी कम है।

फिर वैश्विक तापमान बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए 2040 तक कोयला आधारित बिजलीघरों को बंद करना एक बहुत बड़ी चुनौती है। यह एक असंभव कार्य है। यदि ऐसा किया जाता है तो क्या कोयला से उत्पन्न बिजली की कमी को सौर एवं पवन उर्जा से पूरा किया जा सकता है। जबकि हकीकत में हम इस मामले में भी कोसों दूर हैं। वह बात दीगर है कि भारत ने इस दिशा में काफी प्रयास किये हैं और नवीन उर्जा के क्षेत्र में महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किये हैं लेकिन यह भी सच है कि भारत अमेरिका, चीन और यूरोपियन यूनियन के बाद चौथा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जन देश है। इन हालातों में पेरिस समझौते के तहत निर्धारित लक्ष्य को पाना एक सुनहरा सपना नही तो और क्या है।

वैसे तो प्राणी मात्र का जल, जलस्रोत, वायु, जैवविविधता, वन्यजीव, वर्षा, स्वास्थ्य, जीवजंतु, जलचर, पक्षी, खाद्यान्न आदि प्रकृति से जुड़ी हरएक वस्तु से अभिन्न रूप से सम्बंध है या यूं कहें कि इनके बिना प्राणी मात्र अधूरा है। लेकिन आज ये सभी जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों की चपेट में हैं। खाद्यान्न के बिना मानव का जीना असंभव है। जब कृषि ही जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से अछूती नहीं है, उस दशा में मानव के जीवन की आशा बेमानी होगी। इसलिए जरूरी है कि जलवायु के अनुकूल खेती की जाये। साथ ही पानी का बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर आगे बढ़ा जाये। इससे ही जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का मुकाबला कर पाना संभव होगा।

बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि जैसी आपदाओं को दृष्टिगत रखते हुए कृषि की विशिष्ट नीति बनाने जाने की बेहद जरूरत है। यदि प्राकृतिक संसाधनों के अनुरूप खेती नहीं की जायेगी तो कृषि क्षेत्र को विनाशकारी परिणामों से बचाना असंभव होगा। भारत के मामले में यह साफ है कि जलवायु परिवर्तन का खतरा भारत पर ज्यादा है। इस तथ्य को हमारे केन्द्रीय मंत्री सुरेश प्रभु खुद स्वीकारते हैं। यहां संसाधन भी कम हैं जबकि आबादी बहुत जयादा। मौसम की मार का दंश भी हमारा देश कम नहीं झेल रहा। वह कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने का अब वक्त आ गया है। उस वक्त पर अमल कब होगा, यह समझ से परे है। बहरहाल भारत को विभिन्न क्षेत्रों के लिए अपने उत्र्सजन लक्ष्य नये सिरे से निर्धारित करने होंगे तभी कुछ उम्मीद की जा सकती है।

लेखक एक पत्रकार एवं पर्यावरणविद् है

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