कलयुग में भगवान की सूरत हैं गुरु…

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुःगुरुर्देवो महेश्वरः गुरुःसाक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:॥
आज देश भर में गुरु पूर्णिमा मनाया जा रहा है। आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। माना जाता हैं कि आज के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। माता पिता के बाद गुरु का दर्जा ही एक शिष्य के जीवन में सर्वोपरि होती हैं। गुरु वो होता है जो अपने शिष्य का सम्पूर्ण तथा सर्वागीण रूप से विकास करता है।

इनके अनुसार क्या हैं गुरु की परिभाषा

गुरु का शिष्य के जीवन में विशेष योगदान है। गुरु ही शिष्य के सच्चा मार्गदर्शक होता है। जब बच्चे का जन्म होता है तो उसका पहला गुरु उसकी माँ होती है और जब वो भौतिकतावाद में कदम रखता हैं तो गुरु ही उसके जीवन को सार्थक बनाता हैं बसर्ते शिष्य को सही गुरु का चयन करना चाहिए और गुरु पर बिना किसी संदेह के विश्वास करना चाहिए। शिष्य में अपने गुरु के प्रति समर्पण भाव होना चाहिए। शिष्य को कौतुहलतापूर्वक शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
– भारत भूषण शर्मा, डॉयरेक्टर-कुंदन ग्रीनवैली स्कूल।

गुरु शिष्य को मनुष्य योनि में रह कर मोक्ष की प्राप्ति करवाने में सहायता करता है। गुरु हमे शिक्षा देता हैं और शिक्षा हमारी जिन्दगी को सहज बनाने बनती हैं। गुरु हमे जीवन जीने के तरीके तथा ज़िन्दगी के परम सत्य से अवगत करता है।

– ममता भड़ाना, डॉयरेक्टर-रोज वैली इंटरनेशनल स्कूल।

शरीर के दो हिस्से होते हैं-आध्यात्म और व्यावहारिक। एक सच्चा गुरु मनुष्य को व्यावहारिक ज्ञान देता है। गुरु अपनी शिक्षा से शिष्य के व्यक्तितत्व के सम्पूर्ण विकास करता है।

– आचार्य संतोष जी महाराज, सिद्ध पीठ बांके बिहारी मंदिर।

गुरु तथा अध्यापक में एक विशेष अंतर है। अध्यापक एक विशेष विषय के बारे में ज्ञान देता हैं परन्तु एक गुरु अपने शिष्य को विषय तथा जिंदगी के सभी आचार व्ह्यवहार का सम्पूर्ण ज्ञान देता है। गुरु शिष्य को ज़िन्दगी के सही मायने समझाता है।

– महावीर खंडेलवाल, वरिष्ठ पत्रकार।

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