किसी राजनैतिक दल की प्राथमिकता नहीं पर्यावरण

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ज्ञानेन्द्र रावत

आज पर्यावरण क्षरण का सवाल समूचे विश्व के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इस बारे में आईपीसीसी रिपोर्ट सहित दुनिया की ढेरों रिपोर्टें, वैज्ञानिक अध्ययन और शोध खुलासा करते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण उपजे खराब मौसम के परिणाम स्वरूप प्रलयंकारी घटनाएं बढ़ेंगी। तेजी से बढ़ते तापमान के चलते गर्मी में लोगों की मौत का सिलसिला बढ़ेगा, ग्लेशियरों का पिघलना तेज होगा जिससे नदियों का जलस्तर बढ़ेगा। ऐसे में बाढ़ की विभीषिका का सामना करना आसान नहीं होगा। इससे जहां फसलें बर्बाद होंगी, खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ेगा, वहीं सूखे की गिरफ्त में आने वाले इलाकों में भी इजाफा होगा। इसका असर खाद्यान्न उत्पादन पर तो पड़ेगा ही, भयंकर पेयजल संकट भी उत्पन्न होगा।

नतीजतन खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी, कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या बढ़ेगी। खेती आधारित अर्थव्यवस्था वाले हमारे देश के लिए जो मानसून पर निर्भर है, काफी खतरनाक होगा। साफ है कि कोयला और उच्च कार्बन उर्त्सजन से भारत के विकास और अर्थव्यवस्था पर खराब असर पड़े बिना नहीं रहेगा और देश में जीवनस्तर सुधारने में प्राप्त उपलब्धियां नकार दी जायेंगी। जरूरत है स्वच्छ और सुरक्षित उर्जा की तरफ तेजी से कदम बढ़ाने की। इसलिए इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए अभी हमारे पास मौका है। यदि इसे हमने गंवा दिया तो बहुत देर हो जायेगी। संयुक्त राष्ट्र् महासचिव एंतोनियो गुतारेस भी इससे चिंतित हैं । वह कहते हैं किजलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया तेजी से काम नहीं कर रही है। इस मुद्दे पर तत्काल कार्यवाही की जरूरत है। यही वजह है कि उन्होंने अगले महीने दक्षिणी पोलैंड के काटोवाइस शहर में होने वाले सीओपी 24 जलवायु सम्मेलन से पहले 2015 में पेरिस में हुए जलवायु सम्मेलन समझौते को लागू करने के लिए सभी देशों से साथ आने का अनुरोध किया है।
विडम्बना यह है कि हमारे देश में सरकारें इस बारे में ढिंढोरा तो बहुत पीटती हैं लेकिन इस पर वे कभी गंभीर नहीं रहतीं। इसका सबूत है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में और मौजूदा दौर में हो रहे देश के पांच विधान सभा चुनावों में देश के राजनीतिक दलों के लिए पर्यावरण के मुद्दे की कोई अहमियत नहीं रही। दुख है कि आजादी के बाद से आज तक किसी भी राजनीतिक दल ने पर्यावरण को चुनावी मुद्दा बनाया ही नहीं। इस विधान सभा चुनाव में चाहे सत्ताधारी भाजपा हो, विपक्षी पार्टी कांग्रेस हो या वामपंथी दल हों, या फिर सपा, बसपा, राकांपा, टीडीपी, टीआरएस या कोई अन्य दल, किसी ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में पर्यावरण के सवाल को अपना मुद्दा नहीं बनाया। कारण बिल्कुल साफ है कि यह मुद्दा चुनावों में न तो उनकी जीत का आधार बनता है और न इससे उनका वोट बैंक मजबूत होता है।
उनकी नजर में यह बेकार का सवाल है। जबकि पर्यावरण का जीवन के साथ अमिट सम्बंध है। इसके बिना जीवन असंभव है। दुनिया के वैज्ञानिक और जीव विज्ञानियों का मानना है कि अब दुनिया को पर्यावरण की रक्षा के लिए तुरंत जरूरी कदम उठाने होंगे। इसको हमें आर्थिक लाभ से परे उठकर अपने दिमाग और दिल को जीवन के मूल्य और सिद्धांतों से जोड़कर न केवल देखना होगा बल्कि पर्यावरण की रक्षा के उच्च आदर्शों का भी पालन करना होगा तभी कामयाबी मिल सकेगी।
देश के राजनीतिक दल आज इस पर ध्यान न दें लेकिन इस सच्चाई को नकार नहीं सकते कि मानवीय स्वार्थ के चलते हुए तापमान में बदलाव का दुष्परिणाम जहां सूखा, ग्लेशियरों के पिघलने, खाद्य संकट, पानी की कमी, फसलों की बर्बादी, मलेरिया, संक्रामक और यौन रोगों में वृद्धि के रूप में सामने आया, वहीं इसकी मार से क्या शहर, गांव, धनाढ्य-गरीब,शहरी-उच्च-निम्न वर्ग या प्राकृतिक संसाधनों पर सदियों से आश्रित आदिवासी-कमजोर वर्ग कोई भी नहीं बचेगा और बिजली -पानी के लिए त्राहि-त्राहि करते लोग जानलेवा बीमारियों के शिकार होकर मौत के मुंह में जाने को विवश होंगे। वैज्ञानिकों ने भी इसकी पुष्टि कर दी है।
असल में तापमान में वृद्धि पर्यावरण प्रदूषण का ही परिणाम है। देश ने आजादी मिलने के बाद चहुंमुखी प्रगति की है, उसके बावजूद गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, लिंगभेद, जातिभेद, गैरबराबरी और सांप्रदायिक विद्वेष मिटाने में हम नाकाम रहे हैं। देश के भाग्यविधाताओं ने आजादी के बाद तेज विकास को ही सबसे बड़ी जरूरत माना। वह हुआ भी लेकिन इसमें सबसे बड़ा नुकसान हमारे जीवन का आधार पर्यावरण का हुआ जिसे मानवीय स्वार्थ ने विनाश के कगार पर पहंुचा दिया है।
प्राचीन काल से हमारे जीवन में परंपराओं-मान्यताओं का बहुत महत्व है। हमारे पूर्वजों ने धर्म के माध्यम से पर्यावरण चेतना को जिस प्रकार हमारे जन-जीवन में बांधा, उसे संरक्षण प्रदान किया, वह उनकी गहन व व्यापक दृष्टि का परिचायक है। हमारी संस्कृति वन प्रधान रही है। उपनिषदों की रचना वनों से ही हुई। हिमालय, उसकी कन्दरायें योगी-मुनियों की तपस्थली रहे जहां उन्होंने गहन साधना कर न केवल जीवन दर्शन के महत्व को बतलाया बल्कि यह भी कि वन हमारे जीवन की आत्मा हैं। वृक्ष पूजन की परंपरा पर्यावरण संरक्षण का ही तो प्रयास है। वट, पीपल,खेजड़ी, तुलसी आदि की उपादेयता-उपयोगिता इसका जीवंत प्रमाण है। देव पूजन में तुलसी पत्र का उपयोग आवश्यक कर उसको प्रतिष्ठा प्रदान करना पर्यावरण को स्वच्छ एवं सुभाषित रखने के उद्धेश्य से प्रेरित एवं सौंदर्यबोध का परिचायक है।
वनस्पति की महत्ता को आदिकाल से पर्यावरण चेतना के अभिन्न अंश के रूप में प्रमुखता दी गई है। जीवों को हमने देवी-देवताओं के वाहन के रूप में स्वीकार किया है। इनकी महत्ता न केवल पूजा-अर्चना में बल्कि पर्यावरण संतुलन में भी अहम् है।  जल देवता के रूप में प्रतिष्ठित और नदियां देवी के रूप में पूजनीय हैं। इनको यथासंभव शुद्ध रखने की मान्यता और परंपरा है। पूर्व मंे लोग आसमान देख आने-वाले मौसम, भूमि को देख भूजल स्रोत और पक्षी, मिट्टी एवं वनस्पति के अवलोकन मात्र से भूगर्भीय स्थिति और वहां मौजूद पदार्थों के बारे में बता दिया करते थे। यह सब उनकी पर्यावरणीय चेतना के कारण संभव था। यह प्रमाण है कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता हमारी परंपराओं-मान्यताओं का अभिन्न अंग था। लेकिन आज हम उससे कोसों दूर हैं।
असलियत में विकास के दुष्परिणाम के रूप में जंगल वीरान हुए, हरी-भरी पहाडि़यां सूखी-नंगी हो गयीं, जंगलों पर आश्रित आदिवासी रोजी-रोटी की खातिर शहरों -महानगरों की ओर पलायन करने लगे, पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा गया, वन्यजीव विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए और जीवनदायिनी नदियां प्रदूषित हो गईं। हमने यह कभी नहीं सोचा कि यदि वे विलुप्त हो र्गइं तो इतिहास के साथ हमारा आने वाला कल भी समाप्त हो जायेगा। देखा जाये तो पिछले करीब 40-50 बरस से डीजल और बिजली के शक्तिशाली पंपों के सहारे कृषि, होटल उद्योग और नगरीय जरूरतों की पूर्ति की खातिर अत्याधिक जल का दोहन, औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकले विषैले रसायनयुक्त अपशेष-कचरे, उर्वरकों-कीटनाशकों के अत्याधिक प्रयोग से भूजल के प्राकृतिक संचय व यांत्रिक दोहन के बीच के संतुलन बिगड़ने से पानी के अक्षय भंडार माने जाने वाले भूजल स्रोत के संचित भंडार अब सूखने लगे हैं।
भूजल स्तर दिनों-दिन तेजी से गिरता जा रहा है। वह 50 फीसदी से भी ज्यादा प्रदूषित होकर पीने लायक नहीं बचा है। दुनिया के वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु में बदलाव के चलते सदानीरा गंगा और अन्य नदियों के आधार भागीरथी बेसिन के प्रमुख ग्लेशियरों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अब तो हिमाच्छादित क्षेत्रों में जलवायु में हलचल बढ़ने से हजारों-लाखों बरसों से जमी बर्र्फीली परत तक पिघलने लगी है। यदि यही स्थिति रही तो अगले 50 बरसों में गोमुख ग्लेशियर समाप्ति के कगार पर पहुंच जायेगा। इसका दुष्परिणाम नदियों के थमने के रूप में सामने आयेगा। यह सबसे खतरनाक स्थिति होगी ।
पर्यावरणविदों का मानना है कि धरती को बचाने के लिए हरियाली बेहद जरूरी है जो दिनोंदिन खत्म होती जा रही है। सरकार दावा भले करे लेकिन हकीकत यह है कि वन क्षेत्र घट रहा है। देश का एक भी मैदानी क्षेत्र ऐसा नहीं है जो 33 फीसदी वन क्षेत्र के मानक पर खरा उतरता हो। वनों के क्षेत्रफल में कमी के साथ उनकी गुणवत्ता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। आज उत्तर प्रदेश के 5.9, बिहार के 7.8 और पश्चिम बंगाल के 14 फीसदी क्षेत्रफल में ही वन बचे हैं जबकि राज्य सरकारों का ध्यान आर्थिक विकास पर ही केन्द्रित है, उनकी प्राथमिकता सूची में न जंगल हैं और न नदी है।
आज भीषण सूखे और सतह के उपर के तापमान में हुई खतरनाक बढ़ोतरी से वाष्पीकरण की दर तेज हुई है,नतीजन कृषि भूमि सिकुड़ती जा रही है और खेत मरुस्थल में तब्दील होते जा रहे हैं। बारिश की दर में खतरनाक गिरावट और मानसून की बिगड़ी चाल के चलते कहीं देश सूखे और कहीं बाढ़ के भयावह संकट से जूझ रहा है। कहीं बिजली तो कहंीं पानी का संकट गहरा गया है। पर्यावरण पर प्रदूषण के बादल मंडरा रहे हैं। पर्यावरण स्वच्छता में देश की राजधानी दिल्ली का प्रदर्शन बीमारू राज्यों से भी बदतर है।
देश में आज पर्यटन विकास के नाम पर पर्यावरण की अनदेखी हो रही है। पर्यावरण को रोजगार से नहीं जोड़ा जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण की कोशिशों में बहुराष्ट्र्ीय कंपनियों के हित की जगह जन-भागीदारी को अहमियत दी जाये। लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। यदि हम समय रहते कुछ कर पाने में नाकाम रहे तो वह दिन दूर नहीं जब इंसान, जीवजंतु और प्राकृतिक धरोहरों तक का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् हैं)
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