क्यों करते हैं लोग बुजुर्गों को नजऱअंदाज?

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ज्ञानेन्द्र रावत

आज भारतीय समाज में बुजुर्गों का कोई पुरसाहाल नहीं है। कहने को तो वह प्यार और सम्मान के हकदार हैं लेकिन असलियत में वह पूरी तरह उपेक्षित हो चुके हैं। आज की युवा पीढ़ी न केवल वरिष्ठजनों के प्रति लापरवाह है, बल्कि वह उन लोगों की समस्याओं के प्रति जागरूक भी नहीं है। वह पड़ोस के बुजुर्गों को तो सम्मान दिखाने के लिए तत्पर दिखती है लेकिन अपने ही घर के बुजुर्गों की उपेक्षा करती है, उन्हें नजरअंदाज करती है। रिसर्च एण्ड एडवोकेसी सेंटर ऑफ एजवेल फाउण्डेशन के सर्वेक्षण के अनुसार 59.3 फीसदी लोगों का मानना है कि समाज और घर में बुजुर्गों के साथ व्यवहार में विरोधाभास है।

केवल 14 फीसदी का मानना है कि घर हो या बाहर दोनों ही जगह बुजुर्गों की हालत एक जैसी है, उसमें कोई अंतर नहीं है। जबकि 25 फीसदी के अनुसार घर में बुजुर्गों का सम्मान खत्म हो गया है। कुछ फीसदी की राय में घर में बुजुर्गों को सम्मान दिया जाता है। असलियत यह है कि परिवार के सदस्य अपने घर के बुजुर्गों को हल्के में लेते हैं, इसके बावजूद बुजुर्ग उन पर अपना अधिकार तक नहीं जताना चाहते। वह उस उम्र में भी सक्रिय रहना चाहते हैं। सर्वेक्षण की मानें तो 50 फीसदी लोग यह मानते हैं कि कार्यस्थलों पर भी उनके साथ भेदभाव होता है जिसके चलते उनकी पदोन्नति भी प्रभावित होती है। तात्पर्य यह कि बुजुर्ग हर जगह उपेक्षित हैं और आज की युवा पीढ़ी उन्हें बेकार की चीज मानने लगी है, वह यह कदापि नहीं सोचती कि उनके अनुभव उनके लिए बहुमूल्य हैं जो उनके जीवन में पग-पग पर महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

आज सबसे बड़ी समस्या बुजुर्गों को पर्याप्त संरक्षण की है जिसका आज अभाव है। देश का सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय भले उनकी तादाद 2011 की जनगणना के मुताबिक 8.6 फीसदी माने जिसके हिसाब से यह करीब 10.40 करोड़ के आसपास होती है। जबकि संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 60 साल की उम्र पार कर चुके लोगों की तादाद 84.10 करोड़ है। वर्तमान में विश्व की मौजूदा आबादी तकरीब 7.3 अरब है, जिसमें 12 फीसदी लोग बुजुर्ग की श्रेणी में आते हैं। दुनिया में 2050 में कुल आबादी होगी 9.8 अरब जिसमें बुजुर्ग आबादी 22 फीसदी होगी।

जबकि भारत में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है। बुजुर्गों की यह तादाद 2026 तक 18 करोड़ और एक अनुमान के मुताबिक 2050 में 20 फीसदी का आंकड़ा पार कर जायेगी। संयुक्त राष्ट्रजनसंख्या कोष के आंकलन की मानें तो भारत में 2050 में ऐसी स्थिति आ जायेगी जब देश में बुजुर्गों की आबादी बच्चों की आबादी से ज्यादा होने लगेगी। कोष की रिपोर्ट के अनुसार 2050 में देश में बुजुुर्गों की आबादी जो साठ साल की उम्र पार कर चुके होंगे, वह करीब 30 करोड़ हो जायेगी। यह कुल आबादी की 20 फीसदी होगी।

इतनी बड़ी तादाद के हितों को नजर अंदाज करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। सच है कि बुजुर्गों के लिए सरकारी प्रयासों से कुछ नहीं होने वाला। समाज और परिवार को भी अपनी जिम्मेवारी समझनी होंगी। क्योंकि बुजुर्गों को परिवार में संरक्षण देने वाला कानून बहुत खामियों वाला है जिसे समझते हुए उसमें सुधार करना होगा। तभी कुछ सार्थक परिणाम की आशा की जा सकती है।

इस बारे में एम्स के वृद्धावस्था चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर प्रसून चक्रवर्ती की मानें तो 2050 में भारत में बुजुर्गों की आबादी बच्चों की आबादी से ज्यादा होने जा रही है। इस मामले में भारत चीन के बाद ऐसा दूसरा बड़ा देश होगा। इसलिए हमें बुजुर्गों को संसाधन के रूप में प्रयोग करने के लिए अभी से रणनीति बनानी शुरू करनी होगी।

हमारे यहां कुछेक अपवादों को छोड़ दें, अक्सर मां-बाप अपने बेटे-बेटियों की शिकायत पुलिस में करने की मानसिकता कतई नहीं रखते और बेटों-बहुओं के अमानवीय बर्ताव सहते हुए बदहाली-तंगहाली में जीते हुए मर जाते हैं। कभी-कभी अदालत का दखल भी इसमें कुछ नहीं कर पाता। वृद्धावस्था जीवन का अंतिम पड़ाव है। इस दौर में व्यक्ति का जीवन सम्मान सहित कुशल पूर्वक कट जाए, यह बहुत बड़ी बात है। अक्सर देखने में आता है कि बहुतेरे बुजुर्गों को बुढ़ापे में दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। उन्हें न तो सर छिपाने के लिए छत, खाने को दो जून रोटी और तन ढकने के लिए कपड़ा भी मयस्सर नहीं होता।

बुढ़ापा आते ही कितना अकेला पड़ जाता है वह, जिसकी सुनने वाला कोई नहीं होता। यहां तक कि जिस बेटे की खातिर वह लाख मन्नतें-मनौतियां करता-मानता है, उसकी पैदाइश पर जश्न मनाता है, हजारों रुपये पानी की तरह एक खुशी की खातिर बहा देता है, लाख परेशानियां झेलकर उसे बड़ा करते हैं, उसके उज्जवल भविष्य की खातिर अपना सब कुछ लुटा देते हैं, वही बेटा उन्हें सिरदर्द समझता है, उनकी उपेक्षा करने लगता है। यह समस्या आज समूचे देश की है। गौरतलब है कि बाल्यावस्था में भगवान बुद्ध एक कृशकाय वृद्ध की दयनीय दशा को देखकर द्रवित हो उठे थे, उनका हृदय वितृष्णा से भर गया था।

इसीलिए कुछ लोग वृद्धावस्था को जीवन का अभिशाप मानते हैं। क्योंकि इस अवस्था तक आते-आते शरीर के सारे अंग शिथिल पड़ जाते हैं और इंसान की जिदंगी दूसरे की दया-कृपा पर निर्भर रहती है। परमुखापेक्षी बने उस इंसान को ऐसी दशा में जिंदा रहना भार लगता है और वह चाहता है कि उसे जिंदगी से निजात मिल जाए। इन हालात में व्यक्ति मानसिक तनावों से ग्रस्त रहता है। उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है या स्वभावत: क्रोधी हो जाता है और उसकी याद्दाश्त अक्सर कमजोर हो जाती है। कभी कभी तो उसे लगता है कि आखिर वह क्यों और किसके लिए जिंदा है।

वृद्धावस्था में संतान की स्थिति का जायजा लें तो पता चलता है कि माता-पिता के वृद्धावस्था तक पहुंचते-पहुंचते संतान अक्सर उनसे छुटकारा पाना चाहती है। वह उन्हें एक बोझ और अपने ऐशो-इशरत की जिदंगी में सबसे बड़ी बाधा समझते हैं। वह समझते हैं कि बूढ़े हो चुके माता-पिता उनके किस काम के हैं जबकि उन्हें यह कतई अहसास नहीं होता कि वह उन्हीं की बदौलत इस ऐशो-आराम की जिंदगी गुजार रहा है, जिन्होंने उसके एक सुख की खातिर अपने सारे अरमान परवान चढ़ा दिये। उनके सिवाय आखिर उनका और कौन है। वही उनके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा हैं। जब अपने ही उनकी देखभाल नहीं करेंगे, उनका सहारा नहीं बनेंगे, तो दूसरा उन्हें कौन और क्यों सहारा देगा? यह स्थिति आज अधिकतर नौजवानों की है। इसमें इजाफा तो उसकी शादी के बाद और हो जाता है। कुछ वधुएं अपने बुजुर्गों का अपमान करने में नहीं हिचकतीं। घर में उनकी उपेक्षा और तिरस्कार, दैनिक दिनचर्या बन जाती है। यही वजह है कि उनकी शांतिपूर्ण जिंदगी में भूचाल आ जाता है। कभी-कभी जीवन में मेहनत-मशक्कत या फिर किसी और तरीके से अर्जित किये गये अपार धन-सम्पत्ति के बंटवारे में बड़े-बूढ़ों की काफी छीछालेदार होती है। इसमें आपसी मन-मुटाव और कलह इस सीमा तक बढ़ जाती है कि बेटे-बहुओं के साथ उनका रहना भी दुश्वार हो जाता है। बुजुर्गों और बहू-बेटों में तारतम्य न बैठ पाने मे एक बड़ी वजह पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता प्रभाव भी है। पश्चिम का अंधानुकरण बड़े-बूढ़ों को रास नहीं आता और बहू-बेटों को बुजुर्गों की यह बात नहीं सुहाती। कभी-कभी बड़े-बूढ़ों को उनके आदेश का अनुपालन न होना, उन्हें संतान द्वारा अपना अपमान किया जाना प्रतीत होता है। अक्सर होता यह है कि सेवा से अवकाश लेने के बाद व्यक्ति का दैनिक क्रम अव्यवस्थित हो जाता है और वह अपने को निठल्ला, बेकार महसूस करता है। ऐसे में उसको अपने को ज्यादा से ज्यादा समय व्यस्त रखने का प्रयास करना चाहिए। कहीं-कहीं उसके बेकार रहने के कारण परिवारों में अशांति रहती है।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह कि वृद्धावस्था हमारे जीवन का आखिरी चरण है। इस स्थिति में सभी को पहुंचना है, इस बात का एहसास सभी को करना चाहिए। वृद्धों के पास अनुभवों, स्मरणों, स्मृतियों के विशाल भंडार हैं जिनसे हम अपनी जीवन रूपी नैय्या को पार लगाने में कामयाब हो सकते हैं। उनके अनुभव हमारे लिए अमूल्य धरोहर हैं जिन्हें संजोकर रखना हमारा कर्तव्य है। जहां तक वृद्धावस्था पेंशन का सवाल है, सरकारें देतीं जरूर हैं, लेकिन वह कितनी है और क्या उससे उनका भरण-पोषण हो पाता है, वह कितनों को मिलती है और क्या वह जरूरतमंदों को मिल पाती है। यह विचार का विषय है। सरकार का यह परम कर्तव्य है कि वह वृद्धाश्रम बनाये, वृद्धों को समुचित मात्रा में वृद्धावस्था पेंशन देने की व्यवस्था करे ताकि वह किसी के सहारे न रहकर आसानी से अपना भरण पोषण कर सकें, उनके पुनर्वास की योजनाएं बनाये और उनका सम्मान करे। समाज के महत्वपूर्ण अंग येे ‘‘वृद्ध’’ अपने को असहाय उपेक्षित महसूस न करें, यह हमारा, समाज व सरकार का प्रयास होना चाहिए।

                                                                       ( लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् हैं)

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