जानें क्यों किया जाता है शिवरात्रि पर महादेव का जलाभिषेक

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Faridabad/Alive News: पृथ्वी का एक वर्ष स्वर्गलोक का एक दिन होता है । पृथ्वी स्थूल है । स्थूल की गति कम होती है अर्थात स्थूल को ब्रह्मांड में यात्रा करनेके लिए अधिक समय लगता है । देवता सूक्ष्म होते हैं एवं उनकी गति भी अधिक होती है । इसलिए उन्हें ब्रह्मांड में यात्रा करनेके लिए कम समय लगता है । यही कारण है कि, पृथ्वी एवं देवता इनके काल गणना में एक वर्षका अंतर होता है । शिवरात्रि एक प्रहर विश्राम करते हैं । उनके इस विश्रामके कालको ‘महाशिवरात्रि’ कहते हैं । महाशिवरात्रि दक्षिण भारत एवं महाराष्ट्र में शक संवत् कालगणनानुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी तथा उत्तर भारतमें विक्रम संवत् कालगणनानुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को आती है ।

शिवजी का अभिषेक करने का महत्त्व
महाशिवरात्रि पर कार्यरत शिवतत्त्व का अधिकाधिक लाभ लेने हेतु शिवभक्त शिवपिंडी पर अभिषेक भी करते हैं । इसके रुद्राभिषेक, लघुरुद्र, महारुद्र, अतिरुद्र ऐसे प्रकार होते हैं । रुद्राभिषेक अर्थात रुद्र का एक आवर्तन, लघुरुद्र अर्थात रुद्रके 121 आवर्तन, महारुद्र अर्थात 11 लघुरुद्र एवं अतिरुद्र अर्थात 11 महारुद्र होते है ।

शिव-पार्वती को जगत के माता-पिता मानते हैं । अभिषेक पात्र से गिरनेवाली संततधार के कारण पिंडी एवं अरघा नम रहते हैं । अरघा योनि का प्रतीक है । जगन्माता की योनि निरंतर नम रहना अर्थात गीली रहना शक्ति के निरंतर कार्यरत होने का प्रतीक है । शक्ति शिव को कार्यान्वित करने का कार्य करती है । शिव तत्त्व कार्यान्वित होना अर्थात शिव का निर्गुण तत्त्व सगुण में प्रकट होना । अभिषेक करने से पूजा करने वाले को शिव की सगुण तरंगों का लाभ मिलता है ।

पिंडी में शिव-शक्ति एकत्रित होनेके कारण अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा निर्मित होती है । सामान्य दर्शनार्थियों में यह ऊर्जा सहने की क्षमता न होने के कारण उन्हें इस उर्जा से कष्ट हो सकता है । इसलिए पिंडी पर निरंतर पानी की धारा प्रवाहित की जाती है । इससे दर्शनार्थियों के लिए वहां की शक्ति सहने तथा ग्रहण करने योग्य बनती है ।

शिवरात्रि का 127 सालों बाद बन शुभ रहा संयोग
मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन शिव और पार्वती का मिलन हुआ था इसलिए महाशिवरात्रि के दिन प्रत्येक वर्ष सभी मंदिरों में शिव और पार्वती का विवाह पूर्ण विधि-विधान से होता है । 12 मासों में आने वाले शिवरात्रि से किस प्रकार भिन्न है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की शिवरात्रि की बहुत मान्यता होती है शिवरात्रि के दिन शिव और शक्ति का मिलन हुआ था शिवरात्रि के दिन शिव और पार्वती का विवाह कराया जाता है। इसीलिए यह शिवरात्रि का पर्व 12 मासों में आने वाले शिवरात्रि से भिन्न है।

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