मेरा चाँद निकल आया

0
14

मेरा चाँद निकल आया है,ज़मीं पे रोशनी हो गई
उस आसमाँ के चाँद की जरूरत नहीं,इक्तिला करो

गर फिर भी है कुछ खुशफहमी उस चाँद को तो
मेरे चाँद के पाकीज़ा तबस्सुम से मुकाबला करो

हम दिखाएँगे तुम्हें इन सितारों की सब बदमाशियाँ
शाम ढ़लते ही पुरानी गली में हम से मिला करो

ख़त लिखने का चलन नहीं तो क्या हुआ
अपनी बोलती आँखों से ही इश्क़ का सिलसिला करो

मैं ठण्डी हवा की दुशाला ओढ़े तकता रहूँ तुम्हें
तुम किसी बाग में मोगरे की तरह हिला करो

आया हूँ दिसम्बर में तुम्हारे शहर दिल्ली में
घड़ी दो घड़ी धूप बन कर मुझ पर खिला करो

बस ख़त्म करें ये दूरियाँ कुछ इस कदर कि
तुम खुद को चाँदनी चौक ,मुझे लाल किला करो

मैं बन जाऊँ व्याकुल सी भागती हुई कोई मेट्रो
तुम बस भीड़ में मुझ तक आने का हौसला करो

मैं बल्लीमारान की गलियों की ज़हमतें उठा लूँ
तुम जो ग़ालिब का शेर बनकर मुझ पर छलका करो

मैं तुझ में बिड़ला मंदिर की घंटियों सा गूँजा करूँ
तुम मुझ में जामा मस्जिद की अजान सा ढ़लका करो

 

 

 

सलिल सरोज (सीनियर ऑडिटर, सी ए जी ऑफिस)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here