भ्रम फैलाकर राजनीति और जनता का भरोसा जीत पाने में नाकाम हुई विपक्ष पार्टी

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New Delhi/Alive News : अविश्वास प्रस्ताव को आसानी से स्वीकार करके सरकार ने विपक्ष से उस लड़ाई का मौका छीन लिया, जिस लड़ाई का इस्तेमाल करके विपक्ष लगातार कई सत्रों से देश को यह बताने की कोशिश कर रहा था कि हम सरकार के विरोध में लड़ रहे हैं। दरअसल, विपक्ष मोदी सरकार से बस इतना ही लड़ रहा है। भारतीय जनता पार्टी के बारे में लंबे समय तक यह बात कही जाती रही कि उसे सरकार चलाना नहीं आता और सरकार में रह कर भी वह विपक्षी पार्टी जैसा व्यवहार करती है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने सरकार चलाना ऐसा सीख लिया कि आलोचक कहने लगे हैं, कांग्रेस से भी ज्यादा सत्तासीन हो चले हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस को विपक्षी भूमिका निभाना अब तक नहीं आया है। विपक्ष की भूमिका ही होती है सरकार की गलतियों के खिलाफ देश में माहौल बनाए।

कांग्रेस का आंदोलन

लोकतंत्र में सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए विपक्ष गांव से दिल्ली तक धरना-प्रदर्शन करता है। गलतियां उभारकर जनता को सरकार के विरोध में तैयार करता है। अब जरा बताइए कि विपक्ष का कोई बड़ा प्रदर्शन आपको कब याद आ रहा है। मैं याद दिलाता हूं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले देवरिया से दिल्ली तक की खाट सभा की थी। किसानों की चिंता करने वाली खाट यात्रा। हालांकि उस यात्रा में भी लगातार एक गलत तथ्य स्थापित करने की कोशिश राहुल गांधी करते रहे कि उद्योगपतियों के लाखों करोड़ माफ कर दिए गए जबकि किसानों की कर्जमाफी नहीं की जा रही। उसके बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी। बीजेपी ने सरकार बनाने के बाद सबसे पहले किसानों की कर्जमाफी कर दी। इसके बाद चुनाव प्रचार अभियानों को छोड़ दें और 15 मिनट में भूकंप लाने वाले बयानों को छोड़ दें तो, कांग्रेस का कोई बड़ा आंदोलन याद नहीं आता है। कमाल की बात यह भी कि किसान, मजदूर, दलित, महिला मुद्दों पर कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष भाषण लगातार करता रहा है लेकिन कभी कोई बड़ा आंदोलन नहीं करता दिखा।

भ्रम फैलौने की राजनीति

विपक्ष एक काम बड़ी मजबूती से कर रहा है, देश में भ्रम का माहौल बनाने का। जैस-जैसे 2019 का चुनाव नजदीक आएगा, जाहिर है भ्रम और बढ़ेगा। कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष उन नीतियों/ फैसलों पर ही सबसे ज्यादा भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है जिसे कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए ने लागू करने की असफल या छिटपुट कोशिश की थी। इसमें डीबीटी, गरीबों को रसोई गैस, जीएसटी, आधार और सबका खाता खोलने जैसी योजना प्रमुख है। मोदी सरकार ने कई कदम आगे जाकर नोटबंदी जैसा फैसला ले लिया, जिससे विपक्ष अवाक रह गया और उसने इन सब पर बड़ा भ्रम फैलाने की कोशिश शुरू कर दी थी। लेकिन क्या भ्रम फैलाकर 2019 की लड़ाई विपक्ष जीत पाएगा। बिल्‍कुल जीत सकता है, अगर भ्रम पर जनता को भरोसा हो जाए। लेकिन मुश्किल यह है कि आधुनिक संचार तकनीक के युग में कोई भी भ्रम लंबे समय तक फैलाए रखना मुश्किल होता है।

आधार के दुरुपयोग

विपक्ष की सबसे बड़ी कोशिश यही है कि उस आधार पर भ्रम फैलाया जाए जिसे लागू करने का काम यूपीए की सरकार में ही शुरू हुआ था। अब इसे खारिज करने के लिए भ्रम ऐसा फैलाया जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुई और अब ट्राई चेयरमैन आरएस शर्मा को अपना आधार नंबर सार्वजनिक करके चुनौती देनी पड़ी कि खाते से रकम निकालकर दिखाओ। जाहिर है, भ्रम टूट गया, हैकर शर्माजी के खाते से कुछ निकाल न सके। हां, आधार से जुड़े बैंक खाते में एक रुपया डालकर अपनी बात साबित करने की कोशिश जरूर की। सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से बताया गया कि इसकी वजह से 2014 से अब तक 90,000 करोड़ रुपये बचाए गए हैं। आधार लगातार सुरक्षित करने के लिए यूआइडीएआइ काम कर रही है। साथ ही आधार के जरिये मिलने वाले फायदों की सूची लंबी होती जा रही है। पहचान का एक प्रमाण होने के साथ आधार डीबीटी, जनधन खाता, पासपोर्ट, डिजिटल लॉकर, मतदाता पहचान पत्र, पेंशन और दूसरी सुविधाओं में आसानी की वजह बन गया है। वहीं कई अन्य देशों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आधार की तारीफ ही गई है कि यह सरकार की पासा पलटने वाली योजना है।

ईवीएम हैक होने पर बहस

अभी विपक्ष ईवीएम पर चल रही पुरानी बहस को नए तेवर में लेकर आया है। कांग्रेस की अगुवाई में 17 राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग से फिर से मतपत्रों के जरिये चुनाव कराने की मांग की है। कमाल की बात यह है कि चुनाव आयोग के ईवीएम में गड़बड़ी साबित करने के मौके पर कोई राजनीतिक दल उसे स्वीकार करने नहीं गया। अब विपक्ष यह भ्रम फैलाने की कोशिश में लगा हुआ है कि भारतीय जनता पार्टी सारे चुनाव ईवीएम हैक करके जीत लेती है। उत्तर प्रदेश चुनाव में लगभग साफ हो जाने के बाद मायावती ने यह राग जोर से अलापा था। उसके बाद हर चुनाव में विपक्ष इसी राग को अलापने लगा। यहां तक कि कर्नाटक में सरकार बन जाने और एक दर्जन उपचुनावों में भाजपा की हार के बाद भी।

जनता का भरोसा जीतपाने में नाकाम विपक्ष

महागठबंधन और दूसरी सारी कवायदों के बाद भी जनता का भरोसा जीतने का भरोसा विपक्ष को नहीं हो पा रहा है, इसलिए अब विपक्ष चुनाव नतीजे पर ही भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है। ईवीएम से ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने अखिलेश यादव और 70 में 67 सीटें जीतकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कुतर्क पर कुतर्क देकर मतपत्र से चुनाव की मांग कर रहे हैं। कुल मिलाकर 2019 नजदीक आते- आते विपक्ष को जनता में भरोसा हासिल करने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा है तो वह जनता में भ्रम फैलाकर 2019 की लड़ाई लड़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन आधुनिक संचार के युग में ऐसे भ्रम जनता को नरेंद्र मोदी सरकार के विरोध में खड़ा कर पाएंगे, ऐसा मुश्किल दिखता है। नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल करने के लिए विपक्ष को जनता के बीच असली मुद्दे लेकर जाना होगा जिसके लिए विपक्ष तैयार नहीं दिखता है। इससे उल्टे विपक्षी की छवि ही प्रभावित हो रही है जिसमें उसे पिछड़ी सोच वाला बताया जा रहा है।

नोटबंदी पर रार

जनधन खाते पर विपक्ष एक सुर में यही आलोचना करता है कि देश के गरीबों के पास खाने के लिए पैसे ही नहीं हैं तो बैंक खाते में कहां से डालेंगे। इसीलिए खाते खुलने के बाद भी खाली पड़े हुए हैं। लेकिन आंकड़े विपक्ष की भावनात्मक बातों को पूरी तरह से खारिज करते हैं। जनधन योजना के तहत बिना किसी रकम के आसानी से खाता खोला जा सका और इसका फायदा साफ नजर आता है। प्रधानमंत्री जनधन योजना की वेबसाइट बता रही है कि 32 करोड़ 17 लाख से ज्यादा खाते खोले गए हैं। इन खातों में 80,093.77 करोड़ रुपये जमा हैं। 1 लाख 26 हजार बैंक मित्रों की तैनाती की गई है, जो उन इलाकों में लोगों तक बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं, जहां बैंक शाखाएं नहीं हैं। एक दशक बाद जब इस देश के सबसे बड़े आर्थिक सुधारों की बात होगी तो नोटबंदी की चर्चा सबसे पहले होगी। हालांकि अभी विपक्ष और कई जाने माने अर्थशास्त्री आम जनता की तरह यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब पूरी रकम बैंकों के पास वापस आ गई तो फिर काला धन कहां गया। ऐसे ढेर सारे आंकड़े हैं जो साफ करते हैं कि नोटबंदी पूरी तरह से सफल रही है।

नोटबंदी की सफलता

ढाई लाख से ज्यादा फर्जी कंपनियों की बंदी नोटबंदी की वजह से ही हो सकी। ऐसा सारा काला धन जो भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनता था, आज उसकी हर जानकारी बैंकों और वित्त मंत्रलय के पास है। नोटबंदी के दौरान ऐसे सभी खातों की पहचान हुई, जिसमें अनाप-शनाप रकम डाली गई। ज्यादातर ने चुपचाप उस पर कर भी चुका दिया। विपक्ष भले ही नोटबंदी को जनता को परेशान करने वाला और काले धन के खिलाफ काम न करने वाला बताकर आलोचना करे लेकिन आंकड़े नोटबंदी के अच्छे परिणामों को साबित करते हैं। एक रोचक आंकड़ा यह भी है कि उस दौरान ट्रेनों में एसी प्रथम श्रेणी में लोगों ने जमकर यात्रा की क्योंकि नकदी निकालने का कोई जरिया उन्हें नहीं मिल रहा था। 9 नवंबर 2016 को 27,237 लोगों ने एसी फर्स्‍ट और 69,950 लोगों ने एसी सेकेंड क्लास में टिकट बुक कराया जबकि, उसके सिर्फ चार दिन बाद यानी 13 नवंबर को एसी फर्स्‍ट में 1,209 और सेकेंड में 16,999 लोगों ने ही बुकिंग कराई। नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के बाद से टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। इस साल 26 जुलाई तक तीन करोड़ लोगों ने टैक्स रिटर्न भरा है। पिछले साल एक करोड़ चालीस लाख लोगों ने रिटर्न भरा था।

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