उसको तोहमतें ज़्यादा मिली,तारीफें बहुत कम
जो अच्छा तो बहुत हुआ पर खुद्दार न हुआ ।।

सारी ज़िन्दगी खोल के रख दी उसके सामने
वो ज़माने का ही हुआ,पर मेरा राज़दार न हुआ ।।

सबको भूख थी उस बच्ची के कच्चे जिस्म की
जब गुनाहों की जिरह हुई तो कोई दावेदार न हुआ ।।
माँ-बाप ने नींदें बेचकर बच्चों के ख्वाब पाल दिए
पर आदतन बच्चा उनके अहसानों के कर्ज़दार न हुआ ।

सलिल सरोज, सीनियर ऑडिटर, सी ए जी ऑफिस

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