Part-2 : कोविड-19 और इंडिया-मार्च 2020

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लेखक-जे.बी. शर्मा

हम अपने पाठकों को बता दें कि इस लेख के पहले भाग में हमनें यह बताने की कोशिश की थी कि  क कोविड 19 एक ऐसा वॉयरस साबित हुआ है जो आज दुनिया के लगभग 190 देशों में अपने पैर पसार चुका है । हमारे  देश के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती स्वास्थ संबंधी आधारभूत ढांचे के साथ-साथ अनुभवी डॉक्टरस् – नर्सों के अलावा पैरा मेडिकल स्टॉफ आदी की है। बीबीसी-सीएनएन 18 के एक महीने-डेढ़ पहले के एक बुलिटेन में दिखाई गई रिपोर्ट के आधार पर माना जा सकता है कि भारत के केरल प्रांत में रहने वाली एक मलियालमी स्टुडेन्ट जो कि चीन की वुहान यूनिवर्सटी में अपनी पढ़ाई पूरी कर रही थी और वह जब चीन से वापिस केरल लौटी तो उसे मेडिकल टेस्ट के बाद कोरोना पॉजिटिव पाया गया। ऐसे में इतना तय हो जाता है कि भारत में भी कोरोना ने महीने-डेढ़ महीने पहले ही दस्तक दे दी थी।

कहना उचित होगा कि भारत में यह लगभग वही समय था जब एक तरफ सरकार अमरिका के प्रेजिडेन्ट डोनालड ट्रम्प के आगमन के लिए स्वागत की तैयारियों में जुटी थी और वहीं दूसरी ओर उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में संप्रदायिक दंगे चल रहे थे। और उससे पहले जेएनयू में विद्यार्थी फीस वृद्धि को लेकर विरोध कर रहे थे वहीं  जामिया मिलिया इस्लामिया और शाहिन बाग के अलावा अन्य जगाहों पर लोग सीएए व एनआरसी के विरोध में सडक़ों पर उतर आये थे। कहने का तात्पर्य यह  है कि भारत सरकार के पास भी स्थिति को काबू करने का पर्याप्त समय था। परन्तु उसका सदुपयोग क्यों नहीं हुआ? यह तो सरकार जाने। ताज़ा जानकारी के अनुसार बिहार में कोरोनावॉयरस के अलाव अब सवाईन फ्लू और बर्ड फ् लू के फैलने की भी $खबरे आ रही हैं।

 बीबीसी द्वारा दी गई ताज़ा जानकारी के अनुसार अमरीका में कोरोनावॉयरस से संक्रमित लोगों की संख्या अब छयासी हज़ार से अधिक हो चुकी है। और अमरीका को कोरोनावॉयरस का ऐपिसेन्टर माना जा रहा है। कुल दुनिया में कोरोनावॉयरस से संक्रमित लोगों की संख्या साढ़े पांच लाख से अधिक पहुंच चुकी है। जबकि चौबिस हज़ार से अधिक लोगेां की मौत हो चुकी है वहीं एक लाख सत्ताईस हज़ार से ज्य़ादा ठीक भी हुए है। जबकि इटली में संक्रमित लोगों की संख्या अस्सी हजार के आसपास है। इन हालात में सबसे बड़ा सवाल यह है कि कोरोनावॉयरस को दुनिया में व्याप्त होने या कहें कि फैलने कितना समय लगा? मात्र तीन महीने! ऐसे में सोचें तो क्या इस नामुराद वॉयरस को रोकने का कोई उपाय नहीं इस घोर वैज्ञानिक युग में? ऐसे बहुत से सवालों पर हम और आप आने वाले समय में टेली विजन पर बहस होते देखें-सुनेंगे। ऐसे सवालों में एक बड़ा सवाल बाजारवाद यानी कन्जुयमरइजम से भी जुड़ेगा।

ऐसे में प्रसिद्ध पत्रकार किशन पटनायक के एक लेख की याद आ रही है। उनका यह लेख विनाश को निमंत्रण नामक पुस्तक में छपा था और लेख का शीर्षक था आत्महत्या के विरूद्ध। उक्त लेख का कुछ अंश इस प्रकार से उल्लेखित है:
आने वाले 40-50 साल में जनसंख्या में कितनी वृद्धि होगी,प्राकृतिक संसाधनों का परिणाम क्या होगा और आधुनिक विकास को शानदार ढंग से बनाए रखने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का प्रतिव्यक्ति उपयोग कितना होना चाहिए-इस तरह की कुछ बातों को इकट्ठा कर उसका एक गणित बताया जा सकता है और उस गणित से कुछ सामाजिक-आर्थिक निष्कर्ष भी निकल सकते हैं। एक निष्कर्ष तो यह निकलता है कि जब प्रतिव्यक्ति प्राकृतिक संसाधनों के अनुपात में घोर कमी आ जायेगी तो विकास और जीवन में बढ़ोतरी की दर बनाए रखने के लिए करोड़ों-करोड़ लोगों का  बलिदान करना होगा।

बहुत सारी स्थानीय आबादियों का सफया करना पड़ सकता है, जिस तरह उत्तरी अमरिका में एक बार हुआ था (उससे छोटे पैमाने पर सोवियत रूस में भी एक बार हुआ था, जर्मनी में भी एक बार ऐसा हुआ था यानि यूरोपीय लोग इस तरह की कारवाईयों से अपरिचित नहीं है।) महाहत्यों और नरसंहार यानि जेनोसाइड के बजाय आर्थिक योजनाएं ही ऐसी बनाई जाएंगी कि सफया अपने-आप होने लगे गा। लगातार भुखमरी,महामारी या प्यास से कल्याणकारी प्रतिकारों के अभाव में झुंंड के झुंड लोग तड़प कर स्पष्ट, लेकिन धीमी गति या मात्रा में मरने लगे गें तब इक्कीसवीं सदी में इसे दैवी विनाश या विकास की कीमत कह कर चर्चा से ओछल कर दिया जायेगा।

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक हैं)

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