Part-3 : कोविड-19 और इंडिया-मार्च 2020

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जे.बी शर्मा

भारत में पाँव पसारती महामारी
कोविड 19 और भारत-मार्च 2020 की तीसरी किश्त में हम देश की स्वास्थ्य योजानाओं के इतिहास को संक्षिप्त रूप से खंगालने का प्रयास करेंगे। जबकि इस बात का उल्लेख हम पहले भी कर चुके हैं कि भारत में मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर, डॉक्टरस् , नर्सिंग स्टाफ और पैरा मेडिकल स्टाफ सहित टेस्टिंग लैब आदी की आबादी के हिसाब से बड़ी कमी है। ऐसे में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के इतिहास पर नज़र दौड़ाना कुछ स्वभाविक हो जाता है। हम भारत के इतिहास को स्वतंत्रता से पहले यानि ब्रिटिश हुकूमत के दौर से समझने की कोशिश करेंगेे। ऐसे में हम जयपुर के सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज के सोशल एवं प्रिवेन्टिव विभाग के अध्यक्ष और एम.बी.बी.एस के विद्यार्थियों के अध्यापन क्षेत्र में कार्यरत रह चुके डॉ सत्यदेव आर्य द्वारा लिखित पुस्तक, स्वास्थ्य विज्ञान , के अध्यन के आधार पर कुछ तथ्य अपने पाठकों के समक्ष लाना चाहेंगे।

डॉ सत्यदेव आर्य के अनुसार ब्रिटिश शासन-काल में एक हेल्थ सर्वे एण्ड डेवलपमेंट कमेटी की स्थापना की गई थी। हालांकि ऐसी बहुत सी क मेेटियां स्वतंत्र भारत में भी गठित की गई थी जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे। अब जहां तक सन् 1945 में बनी हेल्थ सर्वे एण्ड डेवलमेंट कमेटी की बात है तो उसके अध्यक्ष पद पर सर जोसेफ भोर को नियुक्त किया गया था। इस कमेटी के माध्यम से भोर ने उस समय इस देश में स्वास्थय संबंधी जो विस्तृत योजानाएं बनाई थी उसकी सिफारिशों में जिन बातों का उल्लेख किया गया उनमें से कुछ महत्वपूर्ण बातों का हम यहां खुलासा करना चाहेंगे। सर जोसेफ भोर ने सन् 1945 में अर्थात द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के आस-पास ऊपर लिखित कमेटी की सिफारिशों में उस दौर में स्वास्थ संबंधी अल्पकालिक योजनाओं के अन्र्तगत इस बात का उल्लेख किया गया था कि प्रत्येक 6 लाख की आबादी वाले द्वितीयक क्षेत्र अर्थात जहां वस्तुओं की मन्युफैक्चरिंग की जाती है या कहें कि उत्पादकों का उत्पादन किया जाता हो उस क्षेत्र में एक 200 से 500 बिस्तरों वाला अस्पताल होना ज़रूरी होगा।

वहीं जि़लास्तर पर रोगियों के इलाज के लिए ढाई हजार बिस्तर वाले अस्पताल का होना जरूरी होगा। भोर-कमेटी के इसी कथन को आधार मान कर हम अगर प्रदेश सरकार या जि़ला प्रशासन से पूछें कि 20 लाख से अधिक आबादी वाले जि़ले फरीदाबाद में कितने बिस्तरों वाला जि़ला अस्पताल होना चाहिए? तो इस सवाल का जवाब तो सरकार या प्रशासन के पास ही होगा। हमने हवाला दिया है सन् 1945 का। जिसे $गुजरे आज 75 वर्ष हो चुके हैं। बडी़ बात यह है उस वक़्त महायुद्ध खत्म हुआ था और आज देश को कोरोनावॉयरस जैसी महामारी से लडऩा पड़ रहा है। यहां हम आप को बता दें कि आर्थिक क्रियाओं का वर्गीकरण तीन क्षेत्रों में किया गया है। पहला-प्राथमिक क्षेत्रक जिसमें कृषि, वानिकी, पशुपालन,मत्स्यपालन, और खन्न एवं उत्खन्न शामिल हैं। द्वितीयक क्षेत्रक में विनिर्माण यानि मन्युफैक्चरिंग शामिल है। जबकि तृतीयक क्षेत्रक में व्यापार,परिवहन, संचार, बैकिंग, क्षिक्षा, स्वास्थ, बीमा, आदि सेवाएं शामिल होती हैं।

दी इण्डियन एक्सप्रेस की 21 फरवरी की एक रिपोर्ट में साऊथ कोरिया में कोरोनावॉयरस से हुई पहली मौत के बारे छप चुका था। यानि यह नामुराद महामारी चीन के साथ जनवरी माह के आसपास दुनिया में अपना कहर ढाना आरंभ कर चुकी थी। आज हम यह नहीं कहना चाहते कि भारत सरकार को कोरोनावॉयरस की गंभीरता मालूम नहीं था। अगर, इस महामारी की गंभीरता का सरकार को मालूम न होता तो 23 फरवरी 2020 के इण्डियन एक्सप्रेस में यह रिपोर्ट न छपती जिसमें यह लिखा था कि: India says Beijing is ‘ deliberately delaying’ nod for IAF flight, China denies. लेकिन कहना होगा तब तक काफी देर हो चुकी थी। क्योंकि बीबीसी और सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कोरोना का पहला केस जनवरी के अंत में आ चुका था। जिसका जि़क्र हमने पहले कर दिया है। लेकिन कोरोनावॉयरस के बढ़ते प्रकोप और उसके परिणामों का आंकलन भारत सरकार द्वारा 19 मार्च से तीव्रता से आरंभ हुआ। अब जैसा कि हमने कहा कि सर जोसफ भोर कमेटी का गठन 1945 में हुआ था और उन्होंने अल्पकालिक योजना के तहत इस बात की उम्मीद जताई थी कि जिला स्तर पर रोगियों की देख-भाल और उनके इलाज के लिए 2500 बिस्तर वाला अस्पताल होना चाहिए। चलिए अब हम जानते है कि भोर कमेटी के बाद किन-किन कमेटियों का गठन हुआ।

सन् 1959 में एक और कमेटी बनी जोकि डॉ. लक्ष्मणास्वामी मुडालियार की अध्यक्षता में बनी यह वह समय था कि जब हमारा प्यारा देश स्वतंत्र हो चुका था। इस कमेटी को भोर कमेटी द्वारा दी गई सिफारिशों का मूल्यांकन करना था और व्यावहारिक कठिनाईयों को दूर करने सहित आगे के सुझाव देने थे। यह कार्य डॉ. लक्ष्मणास्वामी कमेटी ने 1962 में किया। हम समझ सकते हैं कि उस वक्त चीन से जंग हारने के बाद भारत किस परिस्थिति से गुजरा होगा! इसके बाद हेल्थ के क्षेत्र में विकास करने को लेकर जिन समितियों का गठन हुआ उनका विवरण इस प्रकार है 1963 में मुखर्जी कमेटी, 1965 में जंगलवाला कमेटी, 1967 में करतार सिंह कमेटी, फिर 1975 में श्रीवास्तव कमेटी का गठन किया जाता रहा। जिनकी सिफारिशों के आधार पर समय-समय पर यथेष्ट योजनाएं और स्वास्थ संबंधी कार्यक्रम तैयार किए जाते रहे। इनके बाद सन् 1981 में केन्द्रीय सचिव स्वास्थ्य मंत्रालय की अध्यक्षता में एक कार्यकारिणी समिति यानि वर्किंग ग्रुप का गठन किया गया। यहां तक 2000 में, हेल्थ फॉर ऑल, योजना के अन्तर्गत प्रस्तावित लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में कई कदम उठाए गए। ऐसे में सवाल यह उठता है कि, इन सब प्रयासो और योजनाओं के बाद देश के सामने आज सबसे बड़ी दिक्कत मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर और डॉक्टरस के अलावा नर्सों एंव पैरामेडिकल स्टाफ की क्यों पेश आ रही है? यह एक बड़ा सवाल है। सरकारें एक दूसरे को दोष देकर अपने दायित्व की इतश्री कर लेती है।

हमने फरीदाबाद जि़ले जिसकी आबादी सन् 2011 की जनगणना के बाद आज संभवत: 20-22 लाख होगी। तो ऐसे में जब हम अपने जिले की स्वास्थ सेवा से जुड़ी सुविधाओं का आंकलन विशेषकर उन हालात में करते हैं जब कोरोनावॉयरस की व्याप्त देशव्यापी ही नहीं बल्कि विश्व व्यापी हो चुकी है तो : बी.के अस्पताल जोकि जिले का सबसे बड़ा अस्पताल माना जाता है। उसके उप सिविल सर्जन व जिला नोडल अधिकारी डॉ. रामभगत द्वारा दी गई जानकारी अनुसार पता चलाता है कि किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए सरकारी व निजी अस्पतालों में 34 आइसोलेशन वार्डस् बनाए गए हैं। इनके अलावा इनमें 1040 बिस्तरों की क्षमता है। ऐेसे में बड़़ा सवाल यह है कि कहां तो सर जोसफ भोर 1945 में अल्पकालिक स्वास्थ्य योजनाओं के अन्र्तगत किसी जिले में कम से कम 2500 बिस्तर वाले सरकारी अस्पताल की उम्मीद जताते हैं और कहां 75 साल बाद भी दीर्घकालिक या अल्पकालिक योजनाओं को समय-समय पर क्रियान्वित के बावजूद भी भारत आज मेडिकल सेवाओं से जुड़े आधारभूत ढांचे और अन्य सुविधाओं के अभाव में जूझ रहा है!                                                                                                                     जारी…

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक हैं)

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