Part- 5: COVID -19 और इंडिया-मार्च 2020

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जे.बी शर्मा

हम इससे पहले भाग में संक्रमण क्या होता है? उसे परिभाषित करने का प्रयास कर चुके है। यह बात अलग है कि आज जो कोविड 19 की घोर-घातक महामारी जैसी समस्या जो न सिर्फ अपने देश में बल्कि पूरे विश्व में अपने पांव पसार चुकी है, के और भी गंभीर परिणामों का सामना करने के लिए इस धरती पर बसने वाली मनुष्य जाति को तैयार रहने पड़ेगा। जिसका सामना इस मनुष्यजाति को आने वाले निकट भविष्य में आर्थिक संकट के रूप करना होगा।

हम बता चुके हैं कि संक्रमण जिसका अर्थ है रोग-जनक सूक्ष्म जीवों का मानव या पशु शरीर में प्रवेश कर जाना। ऐसे में इन सूक्ष्म जीवों का विकास,समुचित संख्या में वृद्धि और कुप्रभाव की उत्पत्ति। कुप्रभाव वास्तव में रोगोत्पत्ति के रूप में ही होते हैं। अर्थात ऐसे सभी रोग जो संक्रमण के वजह से पैदा होते हैंं, उन्हें संक्रामक रोग अर्थात (Infectious diseases) के नाम से जाना जाता है।

जो महामारी किसी विस्तृत क्षेत्र में एक साथ अनेकानेक लोगों में फैलती है उसे हम एपैडेमिक या जानपदिक के नाम से जानते हैं। जैसे शीतला, इन्फ्ल्युएन्जा, खसरा, हैजा,आदि ये एपैडेमिक की श्रेणी में आते हैं। उक्त के विपरीत यदि किसी सीमित क्षेत्र में, संक्रमण कहीं बाहर से आयातित नहीं होता तो और यह बारह महीने या इसे से कुछ या अधिक समय तक बना रहता है तो इसे हम स्थानीय अर्थात (Enademic) कहते हैं। जैसे टाइफाइड, एमीबोसिस, हुकवर्म या फाइलेरिया आदि। वहीं जब संक्रमण जब इक्का-दुक्का लोगो को समय-समय पर होता है तो उसे विकीर्ण या सैप्रोडिक कहते हैं। इन सबसे हट के जब महामारी एक नहीं अनेक देशों में फैलने लगती है तो उसे विश्व महामारी यानि पैनाडेमिक कहते हैं। जिस दौर आज हम गुजर रहे हैं उसे हम पैनाडेमिक कहते हैं।

विश्व भर में 1 अप्रैल 2020 तक कोरोना वायरस की गिरफ्त में आने वाले लोगों की कुल संख्या 8,74,615 हो चुकी है और इनमें से 43,430 की मौत हो चुकी है और 1,84,952 लोगों को उपचार के बाद स्वस्थ कर दिया गया है। वहीं भारत के स्वास्थ मंत्रालय के अनुसार में अब तक 47,951 लोगों का टेस्ट 1 अप्रैल 2020 तक हो चुका है। कोविड 19 के कुल पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 1,637 हो चुकी है। जबकि दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के अनुसार निज़ामुद्दीन तबलीगी मरकज़ के मामले में उन्होंने प्रेस-मीडिया को बताया कि 766 लोगों अस्पताल में भर्ती कराया गया था जिनमें 112 को पॉजि़टिव पाया गया और बाकी अभी तक संक्रमित साबित नहीं हुए लेकिन टेस्ट किया जा रहा है।

ऐसे में जब हम संक्रामक रोगों के इतिहास पर नजर दौड़ाते है तो हमें एक फिर डॉ. सत्यदेव आर्य की याद आ जाती है। जिन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है सन् 1930 तक शीतला यानि स्माल पौक्स जोकि विश्वभर में स्थानिक रूप से संचारी बीमारी के रूप में व्याप्क रही। यह सही है कि यह समय-समय पर महामारी का रूप भी धारण करती है। लेकिन बीते 30-35 में सालों में योजनाबद्ध वैक्सीनेशन अभियान से इस बीमारी का अपने यहां से उन्मूलन कर दिया है। 1967 तक इस बीमारी का स्थानीय प्रकोप केवल 30 प्रतिशत विकासील देशों में ही रहा। उसके बाद 1973 तक जिन 4 देशों में शीतला का स्थानीय प्रकोप रहा उनमें भारत, पाकिस्तान, बंगला देश, और ईथियोपिया था। विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार भारत ने शीतला के प्रकोस से 24 मई, 1975 को निजात पाली थी। क्योंकि इस दिन भारत में शीतला से पीडि़त आखिरी रोगी पाया गया था।

हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही समूचा विश्व इस भयंकर आपदा से निजात पा लेगा। हम अपने देश के लिए भी ऐसी कामना करते हैं कि इस नामुरादा बीमारी जल्द से जल्द छुटकारा पाये। वहीं हम देश वासियों से इस बात की भी उम्मीद करते है सांप्रदायिकता और नफरत के वायरस से भी दूर रहें, क्योंकि यह नफरत का वायरस और भी ज्यादा घातक साबित होगा।

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक हैं)

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