अभद्र भाषा से राजनीति?

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आखिर कब तक मुद्दों से किनारा कर राजनैतिक दल गाली-गलौच पर लड़ेंगे चुनाव?

किसी भी देश की संस्कृति, भाषा उसकी पहचान होती है उसका मान सम्मान होती है और यदि सिर का ताज भी कहां

राकेश शर्मा

जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा। लेकिन भारत के लोकसभा मे जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग सभी राजनितिक दल कर रहे है उससे देश शर्मसार हो रहा है ठेस पहुंच रही है हर भारतीय को जो अपने राजनेता बनाना चाहता है देश के लिया कुछ करना चाहता है। देश का सबसे बड़ा चुनावी लोकतंत्र का पर्व नेताओ की गाली गलौच, एक दूसरे को नीचा दिखा कर देश की सबसे बड़ी पंचयात मे पहुंचने का मकसद मात्र रह गया है।

जैसे जैसे चुनाव अपने अंतिम छोर पर है वैसे वैसे राजनितिक दलों के राजनेता अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे है देश का चुनावी रण जनता की समस्याओं से किनारा करके गाली गलौच और हिंसा पर उतारू हो गया है। लोकसभा के चुनाव मे सभी राजनितिक दल अपनी मर्यादा भूल गए है है जिसके परिणामसवरूप देश को भी कही ना कही शर्मसार होना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट 1996 के निर्णय को ध्यान मे रखे तो उसमे साफ साफ लिखा था कि राजनितिक दल के बड़े नेता की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है कि अपनी भाषा का उपयोग ऐसा करे जिससे उनसे नीचे वालो को प्ररेणा मिले।

लेकिन आज सभी दल एक दूसरे पर जिस भाषा का प्रयोग कर रहे है उससे कही ना कही देश की जनता के सामने नेताओ की छवि जरूर धूमिल हुई है। चुनावों के दौरान अपने अपने उमीदवार को जिताने की लालसा मे बड़ी बड़ी चुनावी रैलियो मे आरोप प्रत्यरोप का दौर शुरू हुआ है तो जनता की समस्याए, परेशानियां, उनके मुद्दे भी गुम होते चले गए।

क्या लोकतंत्र मे शब्दों की मर्यादा नहीं होनी चाहिए क्या गाली गलौच करके जनता की वोट को अपने पक्ष मे करने की होड़ अब सभी राजीनतिक दलों की प्राथमिकता बनती जा रही है। चुनावी रण मे देश की जनता टकटकी लगा कर अपने नेताओ का भाषण सुनने के लिए दूर दराज से इसलिए आती है की बात होगी स्वस्थ्य की, सड़को की, पानी, बिजली, रोजगार, किसान की, मजदूर की, महिलाओ की सुरक्षा की लेकिन नहीं अब तो चुनावी सभाओ मे एक दल दूसरे दल को नीचा दिखाने मे लगा हुआ है जिससे जनता का चुनावो के प्रति मोह भंग होता जा रहा है।

राजनेताओ की भाषा के कारण ही जंग संसद से निकल कर सड़को पर उतर गई है जिसका सहज की अनुमान लगाया जा सकता है कि राजनीतिक दलों के लिए कार्य करने वाले असंखय कार्यकर्ता जो अपने नेता को नायक मानते है जो उनके पीछे पीछे चलते है उनका राजनितिक प्रशिक्षण कैसा होगा?

चुनावी संग्राम में देश के प्रधान सेवक से लेकर छोटे छोटे दल के राजनेता तक अपनी भाषा पर काबू पाने मे नाकामयाब साबित हो रहे है। फलसरूप : मीडिया मे राजनेताओ की अभद्र भाषा को ही बड़ी खबर के रूप मे जनता तक परोसा जाता है जिससे जनता का राजनेताओ से विश्वास उठता जा रहा है आखिर कब तक चुनावी जंग जनता के मुद्दों से किनारा कर गाली-गलौच पर लड़ी जाएगी?

(लेखक कुरुक्षेत्र से पत्रकार हैं)

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