राम को जब मिला वनवास…

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Faridabad/Alive News : एनएच-2 में जागृति रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित रामलीला में शनिवार रात के मंचन में राम के विवाह के बाद अध्योया लौटने के बाद राज्य अभिषेक की तैयाररियों के बीच मंथरा द्वारा रचे षड्यंत्र के तहत उनका वनवास गमन के प्रसंग का मंचन हुआ। श्रीराम के साथ माता सीता व भ्राता लक्ष्मण को जाते देखकर दर्शकों के नेत्र भर आए।

इससे पहले महाराज दशरथ का जनकपुरी से अपने चारों बेटों व बहुओं के साथ अयोध्या लौटने पर स्वागत किया गया। पूरे राज्य में खुशियां मनाई जा रही थीं। तीनों रानियां कौशल्या, सुमित्रा और कैकेई अपने बेटों और बहुओं को देख फुले नहीं सीमा रही थी। राजा दशरथ ने अब तय किया कि वे राजपाट से मुक्त होकर राजगद्दी पर परंपरा के अनुसार अपने बड़े बेटे राम को ही बैठाने का निश्चय लिया तो सभी ने इस पर सहमति जताई।

इधर, राजा की सबसे प्रिय रानी कैकेई की कुबड़ी दासी मंथरा के दिमाग में और ही कुछ चलता है। वह कैकेई को भडक़ाती है कि राम को राज्य मिल गया तो कौशल्या राजमाता कहलाएगी और तुम्हारा कोई महत्व ही नहीं रह जाएगा। राजा तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद करते हैं तो तुम अपने बेटे भरत के लिए राजगद्दी क्यों नहीं मांगती। कैकेई भी बहकावे में आ जाती हैं और कोपभवन में बैठ जाती है।

राजा दशरथ को जब इस बात का पता चलता है तो वे दौड़े-दौड़े जाते हैं। कैकेई से मुलाकात में, कैकेई पुराने वचनों की याद दिलाती है। कैकेई वचन मांगती हैं भरत को राजा बनाने का और राम को चौदह वर्ष का वनवास। राजा दशरथ के तो प्राण निकल जाते हैं। वे कैकेई को मनाते हैं, लेकिन वे मानती नहीं।

राजा दुखी मन से यह बात सबको बताते हैं तो पूरे अयोध्या में मातम छा जाता है। इधर राम मां की आज्ञा का पालन मानकर वनवास जाने को तैयार हो जाते हैं।

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