शौक से कहिए…हम थुलथुल हैं !

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एक तो कर्नल और ऊपर से अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी. ओलंपिक मेडलिस्ट. फिटनेस को लेकर राठौड़ साहब के जुनून की पृष्ठभूमि समझी जा सकती है. फिटनेस के मोर्चे पर कर दिया एक साथ तीन-तीन को चैलेंज. विराट कोहली को, साइना नेहवाल को और रितिक रोशन को भी. कर्नल साहब ने ऐलान कर दिया- ‘हम फिट तो इंडिया फिट’. इरादा नेक है. मुहिम भी अच्छी है. लेकिन वो कहते हैं न कि कुछ धोखे हैं इस राह में. हम उन संभावित धोखों को लेकर आपको और मंत्री महोदय को सतर्क कर देना चाहते हैं. बस.

राठौड़ साहब ने दफ्तर में कसरत करते हुए अपना एक वीडियो पोस्ट किया है. खुद को मोदी जी की ऊर्जा का कायल बताते हुए राठौड़ कहते हैं कि काम में व्यायाम को भी शामिल करें. सलाह बड़ी अच्छी है. लेकिन इसके साथ एक डिस्क्लेमर लगाना चाहिए था. जिसमें लिखा जा सकता था कि- ‘दफ्तर में कसरत ऑफिस से जुड़े जोखिमों के अधीन है. ऐसा करने से पहले इससे जुड़े दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ लें. ऐसा करते हुए आपको बॉस की फटकार लग सकती है. इन्क्रीमेंट रुक सकता है. प्रमोशन पर असर पड़ सकता है और नौकरी तक जा सकती है.’

वैसे ये सारे जोखिम प्राइवेट दफ्तरों तक ही सीमित हैं. सरकारी दफ्तरों में अगर बाबू लोग कसरत करते नजर आएंगे, तो वहां आने वालों को अच्छा ही लगेगा. अब तक ये बाबू हर काम के लिए हमारी कसरत कराते रहे हैं. अब खुद भी करते नजर आएंगे, तो सरकारी दफ्तरों में समानता का भाव पैदा होगा. उन्हें भी कसरत के कष्टों का अहसास होगा.

एक और बात. सारा खेल दिखने और दिखकर बिकने का है. राठौड़ साहब मंत्री होने के साथ-साथ कहीं-न-कहीं सेलिब्रिटी की हैसियत भी रखते हैं. राजनेता होते हुए भी अप्रत्याशित रूप से फिट हैं. उनके पुश अप्स लोग देखेंगे भी. लाइक भी करेंगे. शेयर भी करेंगे. कोहली के साथ भी ये सुविधा है. साइना और रितिक के साथ भी. लेकिन जरा सोचिए. राठौड़ साहब के आह्वान पर अगर सोशल मीडिया पर देश भर में फैले थुलथुलों के पुश अप्स और अजब-गजब स्टेप्स की बाढ़ आ गई, तो ये महामारी देश की दिमागी सेहत पर क्या असर छोड़ेगी? लिहाजा कर्नल साहब को एक डिस्क्सेमर ये भी लगाना चाहिए था कि- वीडियो डालते हुए इस बात का ख्याल रखें कि वो लोगों को विचलित करने वाला न हो.

जोखिम और भी हैं. फिगर पर टीका-टिप्पणी करना कोई अच्छी बात नहीं मानी जाती. शरद यादव फंस चुके हैं एक बार. याद है न? संसद में बाकायदा हाथों के इशारों से फिगर का सचित्र वर्णन किया था. कल को अजब-गजब वीडियो पर अगर अनाप-शनाप टीका-टिप्पणी और उनका वर्णन शुरू हो जाए, तो सोचिए क्या स्थिति होगी?

बहरहाल, राज्यवर्धन राठौड़ की सलाह कितनी भी खूबसूरत हो, उन्हें अपनी ही बिरादरी की नाराजगी भी झेलनी पड़ सकती है. झक सफेद कुर्तों के पीछे छिपे होने के बावजूद 12-18 इंच आगे लहराती तोंद ही तो नेताजी की पहचान के साथ-साथ आन, बान और शान है. राठौड़ की सलाह अगर नेताओं के लिए भी है, तो यहां उनकी यूएसपी छीनने की कोशिश का मामला भी बन सकता है.

नेताजी के अनफिटपने से याद आया कि अनफिट होने का सबसे बड़ा इंडिकेटर मोटापा होता है (मोटे लोगों से माफी). और मोटापे का सीधा रिश्ता डिपॉजिट होने से है. फैट डिपॉजिट से. लेकिन ज्यादा डिपॉजिट हमेशा नुकसानदेह ही हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है. अब देखिए न. राजनीतिक दलों के खाते में हर साल सैकड़ों करोड़ डिपॉजिट हो रहे हैं. इससे उनकी पार्टियों की सेहत बिगड़ी क्या? उल्टे सेहतमंद होते चले गए सब-के-सब.

वैसे राज्यवर्धन साहब की सलाह पर अमल करने में एक राष्ट्रीय हित भी है. लोग शिकायत कर रहे हैं कि नौकरियां नहीं हैं. नौकरियां नहीं हैं, जो जेब में पैसे नहीं हैं. पैसे नहीं हैं, तो दो वक्त की रोटी जुटाने में मुश्किल है. तो गाढ़े वक्त में अपनी इस स्थिति का इस्तेमाल क्यों न जीरो फिगर बनाने में ही कर लिया जाए? ऐसा मौका फिर कभी ना मिलेगा.

आखिर में एक अहम सवाल. लोग मोटे क्यों होते हैं? आपके अलग-अलग जवाब हो सकते हैं. कोई कह सकता है कि कसरत न करने से. कोई कह सकता है कि अपना रूटीन खराब रखने से. तो कोई कह सकता है कि जंक फूड खाने से. लेकिन मुझे अचानक एक और वजह का आत्मज्ञान हुआ है. डाटा खाने से. जी हां, मैं मोबाइल डाटा खाने की ही बात कर रहा हूं. सोफे या बेड के किसी कोने में लुढ़ककर डाटा खाते बच्चे-जवान आपको हर घर में मिल जाएंगे. जितने ज्यादा घंटों की लुढ़कन, उतना ज्यादा मोटापा. उतना ज्यादा अनफिट. है न सीधा संबंध? सस्ते से सस्ता डाटा बेचकर डाटा खाने की लत लगाने वाली कंपनियों की जय हो.

तो गर्व से कहो कि हम मोटे हैं. थुलथुल होना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है. हम जो जी चाहे खाएंगे. हम अपना खाते हैं. अपने लिए खाते हैं. हम शुक्रगुजार हैं वैश्वीकरण से उपजे उन उत्पादों के, जो इसमें हमारी सबसे ज्यादा मदद करते हैं. जरा सोचिए. कितना सुखद असहास होता है- वो जंक फूड खाकर धीरे-से लुढ़क जाना…आहिस्ता-आहिस्ता डाटा का रसास्वादन करना…और बजते जा रहे टीवी पर भी बीच-बीच में नजरें इनायत कर लेना. पिज्जा, बर्गर और डिजिटल इंडिया की जय हो.

सबसे जरूरी डिस्क्लेमर : ऊपर गिनाए गए सारे खतरे लेखक की बे-सिर पैर की कपोल कल्पना मात्र हैं. मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ ने फिटनेस का जो मंत्र और चैलेंज दिया है, उसे हम सबको कबूल करना चाहिए.

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