आज भी अनसुलझा है भाषा का सवाल : ज्ञानेन्द्र रावत

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हमारे देश में यह कहावत प्रचलित है कि ‘यहां कोस-कोस पर पानी बदले और तीन कोस पर वाणी‘। यह कहावत बिलकुल सही है। करण भाषा के बदलाव की यह प्रकृति स्वाभाविक है। इसके बावजूुद आजादी के आंदोलन के सबसे बड़े प्रणेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का यह कहना था कि हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बांधे रख सकती है। यही वह अहम कारण रहा जिसकी वजह से ही .हिन्दी को उन्होंने राष्ट्रभाषा बनाने की बात पर जोर दिया। उनका मानना था कि मैं हिन्दी इसलिए भी बोलता हूॅं कि क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि यही एक ऐसी भाषा है जो राष्ट्र की आत्मा को सहजता से व्यक्त कर सकती है।

वह गुजराती थे और खुद गुजराती भाषी थे। अफ्रीका से भारत आने के बाद जब उन्होंने अपनी भारत यात्रा की शुरूआत की तो वह सबसे पहले बिहार में चंपारण गए। यहां उनको सबसे ज्यादा समस्या भाषा को लेकर हुई। उसके बाद तो उन्होंने अपने कुछ स्थानीय साथियों की मदद से हिन्दी सीखने की शुरूआत की। देश के बंटबारे के बाद जब एक विदेशी संवाददाता ने उनसे दुनिया को संदेश देने का अनुरोध किया तो उनका यह स्पष्ट कहना था कि दुनिया को कह दो कि गंाधी को अंग्रेजी नहीं आती। यह उनके हिन्दी प्रेम का परिचायक था। यह भी कटु सत्य है कि वही एक ऐसे शख्श थे जिन्होंने पूरे राष्ट्रीय आंदोलन को हिन्दी से जोडऩे का गुरतर और महत्वपूर्ण कार्य किया जिसके चलते ही राष्ट्रीय आंदोलन के अन्य राज्यों के दूसरे भाषा-भाषी शीर्ष नेताओं को भी अन्तत: हिन्दी को स्वीकारना ही पड़ा। इसे समय की विवश्ता या गांधीजी का व्यकित्व कुछ भी कहें, उनको हिन्दी की अधीनता आखिरकार स्वीकारनी ही पड़ी।

हिन्दी के प्रख्यात लेखक, उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का कथन गौरतलब है कि उनका हिन्दी और ´राष्ट्रीय  आंदोलन से जुडऩा गांधीजी के कारण ही संभव हुआ। गांधीजी का मानना था कि हिन्दी को राष्ट्र व्यवहार में काम में लाना राष्ट्र की उन्नति के लिए परमावश्यक है। वह बात दीगर है कि गांधीजी बोलने और लिखने में जिस भाषा का इस्तेमाल करते थे, उसे वह हिन्दुस्तानी करार दिया करते थे। जबकि उनकी उस समय के दौर में संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का बोलवाला था, बोलनी-लिखने वाली भाषा सरल और सहज हिन्दी थी। उसे ही उन्होंने सम्पर्क भाषा के बतौर प्रयोग किया। आजादी बाद यदि हिन्दी को राष्ट्र्भाषा का सम्मान और गौरव प्राप्त हुआ तो इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं कि इसके पीछे गांधीजी का योगदान महत्वपूर्ण ही नहीं, अतुलनीय था।

कैसी विडम्बना है कि देश में हिन्दी को राष्ट्र भाषा का सम्मान तो हासिल हुआ लेकिन हमने शिक्षा के लिए हिन्दी नहीं बल्कि अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा को अहमियत दी। असलियत में इसी सोच ने हमारी शिक्षा-व्यवस्था को पूरी तरह खोखला करने का काम किया। इसका दुष्परिणाम असंतुलन, बिखराव, तनाव और बेगानेपन के रूप में हमारे सामने आया। इसमें दो राय नहीं कि इस असंतुलन, बिखराव, तनाव और बेगानेपन को दूर करने के आजादी के बाद के बीते इन 70 सालों में कोई सार्थक प्रयास हुए ही नहीं। सरकारी काम काज में अंग्रेजी की अनिवार्यता इसका जीता-जागता सबूत है। वह बात दीगर है कि सरकार इस बाबत दावे कुछ भी करे, असलियत यही है। इस बारे में हिन्दी भाषा के सरकारी कामकाज में प्रयोग के लिए बीते 25 सालों से संघर्षरत समाजसेवी और हिन्दी प्रेमी हरपाल राणा का कहना है कि सरकारी दावे झूठ के पुलिंदे के अलावा कुछ भी नहीं है।यह देश की जनता के साथ धोखा है। उसको भुलावे में रखने के अलावा कुछ नहीं।

सरकार की इसी उदासीनता पूर्ण नीति का परिणाम हमारी देशज भाषाओं की दुर्गति के रूप में सामने आया। इसके चलते ही हमारी देशज भाषाओं के पारंपरिक ज्ञान की अवहेलना हुई, मौलिक ज्ञान के सृजन में विफलता का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही यह स्थिति पैदा हुई जिसने यह स्पष्ट किया कि हमारी मातृ भाषाओं में देश के नौजवान को न तो रोजगार ही मिल पाना संभव है और न ही सम्मान हासिल हो सकता है। अगर यह सब मिल सकता है तो विदेश्ीी भाषा जिसे हम अंग्रेजी कहते हैं और जिसे सरकारी कामकाज की भाषा में आज भी वरीयता दी जा रही है या यूं कहें कि उसे प्रमुखता हासिल है तो कुछ गलत नहीं होगा। यही वह अहम् कारण है कि आजादी के 70 साल बाद भी देश में अंग्रेजी का वर्चस्व कायम है और सच यह भी है कि आज अंग्रेजींदा लोगों को ही समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यह हमारे दिवालियेपन का जीता-जागता सबूत है।

इसमें दो राय नहीं कि हमारे देश में भाषा अति संवेदनशील मुद्दा है। भाषा के नाम पर आंदोलन होते रहे हैं। भाषा के नाम पर राज्यों के गठन की मांग ही नहीं हुई, उनका गठन भी हुआ है। तमिलनाडु, आंध्र, महाराष्टआदि इसके ज्वलंत प्रमाण है। तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन के पीछे एक कारण राज्य में हिन्दी को लागू करने का प्रयास भी रहा। 1952 में श्रीमुलु ने आंध्र प्रदेश को भाषा के आधार पर तमिलनाडु से अलग करने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया जिसकी अंतत: परिििण्त अलग आंध्र के रूप में हुई। बॉम्बे प्रेसीडेंसी का बंटवारा भी गुजराती और मराठी भाषा के आधार पर किया गया। अगर वर्तमान पर नजर डालें तो स्थिति यह है कि देश में 1635 भाषाएं बोली जाती हैं। 234 मातृभाषाओं की पहचान सरकारी स्तर पर की गई है। 31 अन्य भाषाओं को विभिन्न सरकारों द्वारा मान्यता मिली है। 100 भाषाएं देशभर में अलग-अलग जगहों पर एक लाख से ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती हैं। और 22 भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूची में रखा गया है। यही नहीं देश में अगले पांच दशकों में कुलमिलाकर लगभग 400 भाषाओं के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है।  दुख की बात यह है कि इन सवालों पर सरकार की चुप्पी समझ से परे है। या यूं कहें कि इन सवालों पर ध्यान देने का सरकार के पास वक्त ही नहीं है।

गौरतलब है कि संस्कृत से उपजी भारतीय आर्यभाषाओं के अपभ्रंश से 1050 से 1150 के बीच जन्मी हिन्दी को विस्तार दिलाने, उसकी जड़े दक्षिण में जमाने, सरल भाषा में जन-जन तक पहुंचाने और भाषा के सेतु से उत्तर को दक्षिण को जोडऩे व हीन्दी पत्रकारिता में नए-नए शब्द गढऩे में
महात्मा गांधी के अलावा तमिलभाषी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, मराठी भाषी गुणाकर मुले, तेलुगूभाषी बालशौरि रेड्डी और हिन्दी पत्रकारिता के भीष्मपितामह पंडित बाबूराव विष्णु पराडकर के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि आज अन्य भाषाओं के साथ देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी का अस्तित्व खतरे में हैं। आज हम दुनिया में अंग्रेजी के मुकाबले दूसरे दर्जे के नागरिक समझे जाते हैं। यदि हम अपनी मातृ भाषाओं के महत्व, उनकी गरिमा को प्रतिष्ठित कर पाने में नाकाम रहे तो यह निश्चित है कि हम अपनी मात्भाषाओं के स्मृति कोष में अंकित -संचित ज्ञान-कोष, विज्ञान, कला, कौशल, अनुभव, संवेदन, शिल्प कला और साहित्य व संगीत सभी कुछ हमेशा-हमेशा के लिए खो देंगे और इनका नाम केवल इतिहास रह जायेगा। इसलिए इन्हें यथासमय संरक्षित और सभी क्षेत्रों में महत्ता दिये जाने की आवश्यकता है। इसके सिवाय कोई चारा नहीं है।

 ज्ञानेन्द्र रावत (वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं पर्यावरणविद्)

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