इस कृत्य से खराब हुई राहुल गांधी सहित पूरी पार्टी की छवि

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Alive News : लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष पहुंचकर उन्हें कुर्सी से उठाने की कोशिश के साथ गले पड़कर प्रायोजित प्रहसन को अंजाम दिया उससे न सिर्फ संसदीय गरिमा का क्षरण हुआ है, बल्कि राहुल गांधी की राजनीतिक सूझबूझ पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। हद तो तब हो गई जब उन्होंने प्रधानमंत्री के गले पड़ने के बाद आंख मारते हुए कुटिल मुस्कान बिखेरी। एक स्वस्थ संसदीय विमर्श के दौरान इस तरह के आचरण की इजाजत नहीं दी जा सकती। कांग्रेस पार्टी चाहे जितनी भी सफाई दे, लेकिन इस कृत्य से राहुल गांधी की छवि खराब हुई है।

राजनीति में प्रतीकों, संकेतों और आचरण-व्यवहार का अपना महत्व होता है। उसके ढेर सारे मायने होते हैं। संसद सदस्यों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने आचरण-व्यवहार से देश को सकारात्मक संदेश दें, लेकिन राहुल गांधी ने इस कसौटी का मजाक उड़ाया है। बहरहाल कांग्रेस पार्टी अपने अध्यक्ष राहुल गांधी के हैरान कर देने वाले आचरण को भले ही उनकी सदाशयता से जोड़कर देखे, लेकिन असल सच तो यह है कि गली-चौराहों से लेकर सोशल मीडिया पर राहुल गांधी का जमकर मजाक उड़ रहा है।

दो राय नहीं कि अविश्वास प्रस्ताव का मौका कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए एक बेहतरीन अवसर था कि वह गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर तथ्यों के साथ अपनी राय बेबाकी से रखते हुए मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकते थे। लेकिन देखा गया कि उन्होंने गंभीर विमर्श के बजाय राफेल विमान डील जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाकर सरकार को भ्रष्टाचारी साबित करने की कोशिश की। लेकिन लगे हाथ ही उनका आरोप निराधार हो गया। 1संसद में राहुल गांधी के बयान के महज दो घंटे के भीतर ही फ्रांस सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि राफेल विमान डील में गोपनीयता का प्रावधान मौजूद है। देश हतप्रभ है कि राहुल गांधी देश को गुमराह क्यों कर रहे हैं।

आश्चर्य तो यह लगा कि नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद जिसका अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ा है, और आज की तारीख में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है, उसे भी राहुल गांधी सरकार की नाकामी के तौर पर गिनाते दिखे। जबकि वे अच्छी तरह अवगत हैं कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर है। अब इस मुद्दे के भरोसे राजनीतिक फायदा और नुकसान कमाना-गंवाना संभव नहीं है।

 

बावजूद इसके राहुल गांधी को लग रहा है कि वे इसे राजनीतिक औजार बनाकर सत्ता का संधान कर सकते हैं तो इसका सीधा मतलब यह हुआ कि उनके पास मोदी सरकार के खिलाफ कहने को कुछ नहीं है। कांग्रेस को उम्मीद थी कि अविश्वास प्रस्ताव के जरिये वह मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने में सफल रहेगी। लेकिन इसमें भी वह सफल होती नजर नहीं आ रही है।

दरअसल इस स्थिति के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी की ओछी राजनीति जिम्मेदार है। कांग्रेस समझने को तैयार ही नहीं है कि देश बदल रहा है और बदलाव के संवाहक प्रधानमंत्री मोदी हैं। इसी नासमझी का परिणाम है कि उसका जनाधार तेजी से खिसक रहा है और राजनीतिक समझ और अंतर्दृष्टि रखने वाले शीर्ष नेता कांग्रेस को अलविदा कह रहे हैं। नि:संदेह कांग्रेस को अधिकार है कि वह सरकार की जनविरोधी नीतियों की आलोचना करे। लेकिन देखा जा रहा है कि वह सरकार की वाजिब आलोचना के बजाय सरकार के लोकहितकारी कार्यो की अनावश्यक आलोचना कर खुद की किरकिरी कर रही है। उचित होगा कि कांग्रेस और राहुल गांधी दोनों आत्मचिंतन करें कि आखिर उनसे कहां चूक हो रही है।

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