अटल और राजकुमारी कौल की प्रेम कहानी जिसे सभी ने…

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New Delhi/Alive News : अमर लेखिका अमृता प्रीतम ने एक बार कहा था कि कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो हर हाल में रहते हैं स्वीकृति से जन्मते और कायम रहते तो ठीक था लेकिन यह कई बार अस्वीकृति में से भी जन्म ले लेते हैं और सिर्फ जन्म ही नहीं लेते बल्कि इन्सान के साथ भी जीते हैं और मरने के बाद भी। एक ऐसा ही अटूट रिश्ता अटल जी और श्रीमती कौल के बीच था जिसे भारतीय राजनीति से लेकर सदन तक ने हमेशा सम्मान दिया।

दरअसल साल था 2014 और महीना था मई का देश में चुनावी शोर मचा था। राजनीतिक रैलियों के मंचों से नेता दहाड़ रहे थे एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से भी पीछे नहीं हट रहे थे। लेकिन इस शोर के बीच 2 मई को मंचो के पीछे एक मौन संवेदना का दिन भी था। उस दिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी के घर पर एक मौत हुई थी उन महान देवी को श्रीमती राजकुमारी कौल के नाम से लोग जानते थे। कई वर्षों से वाजपेयी की लगातार साथी रही और उनकी दत्तक बेटी नमिता भट्टाचार्य की मां। 86 वर्षीय श्रीमती कौल एम्स में हृदय की बीमारी के बाद मृत्यु को प्राप्त हो गईं थी।

अखबारों में पहली बार उनके बारे में खबरें छपी थी इंडियन एक्सप्रेस ने विस्तार से इस खबर को पहले पेज पर छापा था। जिसे पढ़कर अधिकांश लोगों ने जाना कि यही वह अटल जी की जीवन की वह डोर थीं जो आज उनसे टूट गयी। उनके घर की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य और उनकी सबसे घनिष्ठ मित्र भी।

किन्तु इस मौत से ना केवल अटल जी दुखी थे बल्कि चुनाव अभियान को बीच में छोड़कर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने सुबह-सुबह अटल बिहारी वाजपेयी जी के निवास पर एक शांती यात्रा की थी। सोनिया गाँधी संवेदना प्रकट करने गयी थी. उस समय भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के पास समय का बेहद आभाव था लेकिन इस रिश्ते की पवित्रता या गहराई को लालकृष्ण आडवाणी बखूबी समझते थे. आडवाणी जी के साथ-साथ राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद समेत अन्य शीर्ष नेता श्रीमति कौल के पार्थिव शरीर के पास शोक मुद्रा में उपस्थित थे। वाजपेयी जी की हालत नाज़ुक थी, शरीर में इतना बल नहीं बचा था कि उठकर अंतिम विदाई दे सके। आँखें नम थी और बिस्तर पर बैठे थे अत: अंतिम संस्कार में भाग नहीं ले सके थे।

अंतिम संस्कार में भाजपा के ही नहीं बल्कि तत्कालीन केंद्रीय मंत्री काँग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उपस्थित थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने भी फोन पर अटल जी की दत्तक पुत्री और श्रीमती कौल की बेटी नमिता को अपनी संवेदनाओं से परिचित कराया था। यही नहीं इस रिश्ते को अंतिम विदाई देने इस अंतिम संस्कार में आरएसएस के कार्यवाहक सुरेश सोनी और आरएसएस प्रचारक और भाजपा के महासचिव (संगठन) रामलाल भी उपस्थित थे यह भारतीय राजनीति के इतिहास की शुचिता और नैतिकता का एक ऐसा सम्माननीय उदहारण है जिसकी जगह कोई दूसरा अन्य उदहारण नहीं ले सकता। तमाम राजनितिक तू-तू, मैं- मैं के बीच ये एक ऐसे रिश्ते को सम्मान दिया जा रहा था जिस रिश्ते का कोई नाम नहीं था।

बताया जाता है कि अटल और राजकुमारी कौल की कहानी की शुरुआत 40 के दशक में हुई थी जब अटल ग्वालियर के एक कॉलेज में पढ़ रहे थे। वह भी उनके साथ पढ़ रही थीं। दौर ऐसा था कि बातें केवल आंखों ही आंखों में होती थी और आँखें एक दूसरे की मन की गहराई तक पहुंच चुकी थी। ज़्यादा बात करने के अवसर नहीं थे, आखिरकार अटल ने इस राह पर कदम बढ़ाने की हिम्मत की। उन्होंने एक प्रेम पत्र लिखा, जिसका जवाब ही नहीं आया। वह बहुत निराश हुए, उन्हें क्या मालूम था कि ये प्रेम करीब एक-डेढ़ दशक बाद उनकी जिंदगी में हमेशा के लिए बदलने वाला है। अटल ने अपना जीवन एक महिला मित्र को समर्पित कर दिया था। बहुत सभ्य, सलीके और इज्ज़त के साथ रिश्ता निभाया।

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर के अनुसार ये खूबसूरत प्रेम कहानी थी। अटल बिहारी वाजपेयी और राजकुमारी कौल के बीच चला वो रिश्ता खूबसूरत रिश्ते में बुनता चला गया। राजकुमारी कौल को दिल्ली के राजनीतिक हलकों में लोग मिसेज कौल के नाम से जानते थे। हर किसी को मालूम था कि वो अटल जी के लिए सबसे प्रिय है।

वाजपेई ने कॉलेज के दिनों की अपनी दोस्त राजकुमारी कौल के साथ रिश्तों को लेकर कभी कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया, लेकिन उनकी शादी के बाद पति बीएन कौल के घर में वे काफी समय तक रहे थे। एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में राजकुमारी कौल ने कहा था, मैंने और अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी इस बात की ज़रूरत नहीं महसूस की कि इस रिश्ते के बारे में कोई सफाई दी जाए।

शायद यही वह रिश्ते होते होंगे जिनका अमृता प्रीतम ज़िक्र किया करती थी। ये रिस्ते दर्द से बने होते हैं बस इनमें दर्द, त्याग और बलिदान होता है। शायद यही वह प्रेम होता होगा जिन्हें लोग कथा कहानियों पढ़ते हैं। अटल जी बेशक अच्छे महान कवि थे एक दमदार प्रधानमंत्री भी रहे किन्तु उन्हें एक सच्चा महान प्रेमी मानने से कैसे इंकार किया जा सकता है जिन्होंने अपनी मुहब्बत के लिये किसी भी सामाजिक रीति की परवाह नहीं की।

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