दर- दर भटकता मजदूर, जिम्मेदार कौन?

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तिलक राज शर्मा

अपनी आँखों में अपने परिवार की सुख- सुविधाओं की ख्वाहिश लिए कुछ अपने परिवार के साथ और कुछ परिवार से अलग दूर दूसरे शहर में अपने रोजी- रोटी के लिए जी रहे थे। अचानक से बिन बुलाए मेहमान की तरह कोरोना देश में आया और जम गया और 13 करोड़ मजदूरों की ज़िन्दगी को प्रभावित कर दिया। हालात ये हुए कि दूसरे के लिए अपना खून- पसीना बहाकर मकान बनाने वाले मजदूर आज अपने लिए दो वक्त की रोटी और छत के लिए तरस गए। लॉकडाउन में मजदूर दर- बदर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो गए। नंगे पैर, भूखे- प्यासे अपने परिवार और छोटे- छोटे बच्चों के साथ इस आस में अपने घर के लिए निकल पड़े कि वहां जाकर अपना गुजर- बसर कर सकेंगे।

चिलचिलाती गर्मी में रोते बिलखते बच्चों के साथ, रास्ते में पुलिस वालों द्वारा खदेड़े जाने के बाद भी इनका हौसला नहीं टूटा और एक उम्मीद का सहारा लिए फिर अपने गंतव्य को चलते रहे। परन्तु शायद विधाता ने संघर्ष सिर्फ मजदूरों के हिस्से लिखा है। लॉकडाउन के तीसरे चरण में मजदूरों के साथ घटना होनी की खबरें देश भर से आने लगी, जिसमे औरंगाबाद रेलवे लाइन पर मालगाड़ी से 16 मजदूरों की मौत, गुड़गांव के पास एक कंटेनर की चपेट में आने से 5 मजदूरों की मौत, मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में ट्रक के अचानक पलटने से पांच मजदूरों की मौत, बस के द्वारा पैदल बिहार जा रहे 6 मजदूरों को कुचला जाना, एक बस और ट्रक में भिड़ंत से आठ मजूदरों की मौत, मुज़फ्फ़रनगर में पैदल जा रहे 6 प्रवासी मजदूरों का बस से कुचला जाना शामिल है। और भी ना जाने कितने हृदय विदारक घटनाएं सामने आई। इस सब घटनाओं से एक बात साफ हो गई कि मजदूरों की जान की परवाह ना तो हुक्मरानों को ना ही राज्य सरकारों को। मजदूर और श्रमिक का इतिहास गवाह रहा है कि मजदूर ने अपने खून- पसीने से सींचकर न जाने कितने महल तैयार किए है।

इन महलों में चाहे लोकसभा भवन हो या राज्यसभा भवन। इन मजदूरों के पसीने को शायद वहां की दीवारें चीख- चीख कर इन हुक्मरानों को कह रही हो कि तुम्हे याद नहीं है मजदूरों का वो पसीना मगर इतिहास हमेशा इसका गवाह रहेगा कि मजदूरों का पसीना यहां दफ़न हो रहा है। श्रमिकों ने इस देश को सपेरों के देश से उभारकर आज वर्ल्ड के मानचित्र पर एक बड़ी शक्ति के रूप में चिन्हित कर दिया है, जिससे देश का हर उद्योगपति उनके पसीने को बहाकर 100 करोड़ से हजारों करोड़ के मालिक बन बैठे है।

आज उन मजदूर और श्रमिकों के बच्चों को सड़कों पर ,करते हुए देखकर उनके अंदर कोई दया के भाव दिखाई दे रहे और ना ही उनके हाथ अभी तक खुलकर सामने आए कि सड़कों पर तड़पते मजदूरों और श्रमिकों को गले लगा ले। देश में विंडबना यह भी है कि सत्ता के नशे में चूर राजनेताओं तक ने उनकी सुध नहीं ली और कुछ फोटो खींचाने के लिए बड़े- बड़े चेक टिकट पक्की करने के लिए सरकारों के मुखियाओं को सौंप दिए। अब इस देश के मजदूरों और श्रमिकों को समझ लेना चाहिए कि ऐसी आपदा में ही उनके लिए वो काम ना आए जिन्हे उन्होंने सोशल मीडिया पर देखकर ही अपना मसीहा मान लिया था, वो गलती दोबारा नहीं दोहराएंगे और इन जुमलेबाजों, सोशल मीडिया और मीडिया के बनाए हुए नेताओं को उनके साथ किए हुए उपकार का कर्ज वक्त आने पर ही चुकाना होगा।

जब कर्ज देने की बात आई तो घर पहुंचाने के लिए ट्रेन चला दी लेकिन राहत पैकेज किन के लिए है ये मजदूर और श्रमिकों को अभी तक समझ नहीं आया है। इन्हे तो था सिर्फ 20 लाख करोड़ का पैकेज उन्हें दे या ना दे उन्हें बस सुरक्षित घर पहुंचा दे।

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं अलाइव न्यूज़ के संपादक है)

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