गंगापुत्र स्वामी सानंद का अनशन क्या रंग लायेगा?

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आज गंगापुत्र के नाम से प्रख्यात 86 वर्षीय स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद उर्फ गुरुदास अग्रवाल का जीवन संकट में है। कारण बीते माह की 22 तारीख से गंगा के अस्तित्व और गंगाजल के विशिष्ट गुण की रक्षा की खातिर हरिद्वार के जगजीतपुर स्थित मातृ सदन में शुरू किया गया उनका आमरण अनशन 10 जुलाई को उत्तराखण्ड सरकार द्वारा उन्हें जबरन उठाकर ले जाने, दून अस्पताल में भर्ती करन बाद में उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार के इस असंवैधानिक कदम की भत्र्सना करन उनको एम्स में उपचार हेतु भर्ती किये जाने के आदेश के बाद ऋषिकेश स्थित एम्स में रहने और बीती 23 जुलाई की रात सरकार द्वारा उन्हें पुन: हरिद्वार स्थित मातृ सदन पहुंचाये जाने के बाद भी स्वामी सानंद का 34वें दिन भी अनशन अनवरत जारी रहना यह जाहिर करता है कि वास्तव में सरकार की गंगा के प्रति कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है।
जबकि हमारे प्रधानमंत्री गंगा को अपनी मां और खुद को गंगा का बेटा कहते हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान अपने बनारस आगमन पर उन्होंने स्वयं इस बात को कहा था कि मां गंगा ने उन्हें बुलाया है। गंगा को निर्मल और अविरल बनाये रखने की उस समय उनकी घोषणा उनके गंगाप्रेम को ही दर्शाती है। यह भी सच है कि गंगा के उद्धार हेतु उन्होंने अपनी सरकार की सबसे अधिक प्राथमिकता और महत्वाकांक्षी योजना नमामि गंगे की चुनाव बाद शुरूआत भी की। उसके निमित्त 20 हजार करोड़ से अधिक का बजट भी जारी किया। विडम्बना देखिए कि 2014 के चार साल बाद गंगा की यथास्थिति की कौन कहे, गंगा उससे भी अधिक बदहाल है। जबकि केन्द्र सरकार के जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी यह दावा करते नहीं थकते कि गंगा साफ हो रही है और गंगा मार्च 2019 में 80 फीसदी तक साफ हो जायेगी।
अपने अनशन के 34वें दिन मातृ सदन में स्वामी सानंद का कहना है कि गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए एक्ट बनना बेहद जरूरी है। गंगा के नाम पर मोदी सरकार जनता को गुमराह कर रही है। दरअसल उनकी मांग है कि गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए गंगा के लिए प्रस्तावित अधिनियम र्डफ्ट 2012 को संसद में पास कराकर कानून बनाया जाये, और यदि ऐसा न हो सके तो राष्ट्र्पति द्वारा अध्यादेश जारी करवाकर तुरंत लागू करवाया जाये, अलकनंदा, धौलीगंगा, मंदाकिनी, नन्दाकिनी तथा पिंडेर पर निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं को तत्काल निरस्त किया जाये, प्रस्तावित अधिनियम की धारा 4 डी वन कटान तथा 4 एफ व 4 जी किसी भी प्रकार की गंगा में खनन प्रक्रिया पर विशेषत: कुंभ क्षेत्र में पूरी तरह रोक लगायी जाये, गंगाजी के जलग्रहण क्षेत्र में सतत समावेशी नीति बनायी जाये, जलग्रहण क्षेत्र के निवासियों को पूर्व की भांति उनके वनों पर अधिकार बहाल किये जायें और गंगा भक्त परिषद जिसमें गंगा भक्तों के साथ वैज्ञानिक भी शामिल हों, का प्रोविजनल अविलंब गठन किया जाये जो गंगा के हित में काम करने के लिए कृतसंकल्पित हो। इस परिषद के अधिकार क्षेत्र में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि किन क्रिया कलापों पर प्रतिबंध लगाया जाये, किन पर नियंत्रण व किन को प्रोत्साहित किया जाये।
देखा जाये तो हालात इसके जीते-जागते सबूत हैं और जैसाकि केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरीजी दावा कर रहे हैं उसके अनुसार मार्च 2019 तक तो गंगा साफ नहीं होने वाली। गंगा के मामले में सरकार के रवैये का पता इसी से चल जाता है कि अभी तो गंगा सफाई की परियोजनाओं की समीक्षा ही की जा रही है। ऐसे में गंगा कैसे साफ होगी। यह समझ नहीं आता। जबकि मौजूदा हालात गवाह हैं कि गंगा धीरे-धीरे मर रही है। उसके पानी पीने से लोग अनचाहे आंत्रशोध, पेट के कैंसर आदि जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार होकर मौत के मुंह में जा रहे हैं। गंगा में स्नान त्वचा जैसी भयंकर बीमारियों का सबब बन गया है।
उसका जल आचमन लायक भी नहीं रह गया है। साथ ही उत्तराखण्ड में जारी पनबिजली परियोजनाओं के चलते गंगाजल को सुरंगों में कैद करने के कारण उसका कभी न खराब होने वाला विशेष गुण भी खत्म होता जा रहा है। वैज्ञानिक परीक्षणों ने यह साबित कर दिया है। यह हालात की भयावहता का प्रतीक है। मोदीजी से देश की जनता को कुछ आस बंधी था, बीते चार साल में अब वह भी टूट चुकी है। ऐसे में गंगा बची रह पायेगी, इसमें संदेह है। इसी के चलते गंगा आज अपने ताडऩहार की बाट जोह रही है।
यहां अब विचारणीय यह है कि क्या स्वामी सानंद का अनशन सफल होगा। क्या सरकार उनकी मांगें मानेगी। बहरहाल केन्द्रीय जल संसाधन, गंगा संरक्षण व नौवहन मंत्री नितिन गडकरी ने बीते पखवाड़े स्वामी सानंद को लिखे पत्र में कहा था कि एक माह के भीतर उनकी मांगों पर विचार किया जायेगा।
उन्होंने आश्वासन दिया और कहा था कि वह अपना अनशन खत्म कर दें। बाइस दिन से अधिक समय बीत चुका ह,ै अबतक तो कुछ नहीं हुआ। लेकिन स्वामी सानंद गंगा विधेयक सहित अपनी मांगों के मांगे जाने तक अनशन खत्म न किये जाने पर दृढ़ हैं। मातृ सदन आने पर अब भी वहां वे केवल गंगाजल ही ग्रहण कर रहे हैं। उनका कहना है कि मेरी तपस्या जारी है। मोदी सरकार हठी और धर्म विरोधी है। देश में गंगा को लेकर सभी को जागरूक होना होगा। गंगा के लिए सरकार की मंशा को देखते हुए लगता है कि बड़ी कुर्बानियां देनी होंगी। गंगा के लिए यदि उनके प्राण भी चले जाये ंतो यह उनका सौभाग्य होगा।
वैसे उनके समर्थन में बीते दिनों नई दिल्ली में राजघाट पर देशभर से आये सैकड़ों गंगा भक्तों के साथ मैगसैसे पुरुस्कार से सम्मानित राजेन्द्र सिंह, प्रख्यात पत्रकार वेदप्रताप वैदिक, स्वामी अग्निवेश, उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष किशोर उपाध्याय, हरिद्वार से आये साधु समाज एवं संतों का नेतृत्व कर रहे स्वामी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी, महंत नारायण गिरी, करणी सेना के महासचिव एवं किसान नेता मेजर हिमांशु, महानदी बचाओ अभियान के प्रमुख सुदर्शन दास, जल-जन जोड़ो अभियान के संजय सिंह, पूर्व राज्य मंत्री उत्तराखण्ड धीरेन्द्र प्रताप, शिक्षाविद डा. जगदीश चौधरी, पर्यावरणविदों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक, जल-जंगल की रक्षा हेतु समर्पित कार्यकत्ताओं एवं वन अधिकार आंदोलन से जुड़े कार्यकत्र्ताओं, सामाजिक संगठनों ने गंगा की अस्मिता, अविरलता-निर्मलता और गंगाजल के विशिष्ठ गुणों की रक्षा की खातिर आयोजित प्रार्थना सभा में भाग लिया। असलियत में स्वामी सानंद के गिरते स्वास्थ्य के बावजूद देश और समाज में कोई बेचैनी नहीं है।
सरकार तो कतई चिंतित है ही नहीं। वह बात दीगर है कि स्वामी जी की जान बचाने की मुहिम देश भर में व्यक्गित स्तर पर तूल पकड़ रही है। धारवाड़, कर्नाटक में पर्यावरणविदों ने गंगा एवं देश की अन्य नदियों को बचाने के लिए भारत सरकार से अपील की है। इलाहाबाद और मुंबई में विश्वविद्यालय के छात्रों ने प्रर्दशन किया है। लोग अपने-अपने जिलों में जिलाधिकारियों को प्रधानमंत्री के नाम सम्बोधित ज्ञापन में स्वामीजी की जान बचाने की मांग कर रहे हैं। उड़ीसा और आंध्र में महानदी बचाओं आंदोलन के कार्यकर्ता भी इस मुहिम में जुड़ गए हैं।
भुवनेश्वर में छात्र व गंगा सेवा अभियान के कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को भेजे ज्ञापन में गंगा कानून बनाने की स्वामी जी की मांग माने जाने का अनुरोध किया है। सहारनपुर में भी स्थानीय लोगों ने राज्य माध्यमिक शिक्षक संघ के नेता रजनीश चौहान के नेतृत्व में प्रधानमंत्री से स्थानीय सांसद को दिये ज्ञापन में स्वामीजी की मांगे मानने का अनुरोध किया है। बागपत में स्वामीजी के समर्थकों ने कृष्णपाल सिंह के नेतृत्व में प्रधानमंत्री के नाम जिलाधिकारी को दिये ज्ञापन में गंगा विषयक स्वामीजी की न्यायोचित मांगे मानने का अनुरोध किया है। लोग हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।
नदी बचाओं अभियान के संयोजक सुरेश भाई एवं तालाब बचाओ अभियान के संयोजक शोध छात्र रामबाबू तिवारी उत्तरकाशी से जनजागृति अभियान चला रहे हैं। श्रीनगर, गढ़वाल से गंगा बचाओ अभियान के भोपाल सिंह सहित सैकड़ों कार्यकर्ता जनजागृति यात्रा कर रहे हैं। बल्लभगढ़, हरियाणा निवासीं वल्र्ड वॉटर कौंसिल के सदस्य जगदीश चौधरी, पत्रकार संजीव चतुर्वेदी, तिलकराज शर्मा, दीपक शर्मा, हिसार से सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार सांगवान, मेवात के इब्राहीम खान, उत्तर प्रदेश में मेजर हिमांशु अरविन्द सिंह, डी. के. राजपूत, प्रदीप रघुनंदन और मध्य प्रदेश में अरुण त्यागी स्वामी सानंद के आमरण अनशन के समर्थन में अपने-अपने राज्य में जनजागरण कर रहे हैं। राज्य सभा में भी आप नेता संजय सिंह स्वामीजी की मांगे माने जाने का सरकार से पुरजोर तरीके से अनुरोध कर चुके हैं। जबकि देश के एकमात्र राष्ट्र्वादी दल होने का दंभ भरने वाली सत्तारूढ़ भाजपा जो गर्व से कहती है कि वह भारतीय संस्कृति की अकेली संवाहक और ध्वजवाहक है, के साथ-साथ देश के सभी राजनीतिक दल इस विषय पर मौन हैं।
लेकिन दुख इस बात का है कि जहां इस मामले में सरकार की चुप्पी समझ से परे है, वहीं स्वामी सानंद के समर्थन में सत्याग्रह परवान नहीं चढ़ पा रहा। सत्याग्रह के समर्थन में की जाने वाली गंगाभक्तों की यात्रायें स्थगित की जा रही हैं। इससे उनमें रोष व्याप्त है। गंगा सत्याग्रह पर कांग्रेस द्वारा प्रायोजित होने का आरोप लगाया जा रहा है। सांसद-विधायकों की चुप्पी समझ से परे है। यहां तक कि गंगा के बहाव क्षेत्र से निर्वाचित सांसद भी दलों के अनुशासन की कैद में हैं। रालोद को छोड़ बाकी दल इस मुद्दे पर सामने नहीं आ रहे। स्वामीजी के अनशन का समर्थन करने वाली कांग्रेस भी चुप है।
लगता है भाजपा सरकार इस मुद्दे को लटकाये रखना चाहती है। जबकि उसे स्वामीजी की गंगा विषयक मांगें मानकर 2019 के चुनाव में लाभ मिल सकता है। इन हालात में स्वामी सानंद का जीवन संकट में है। उनका दिनों दिन बजन घट रहा है। ऋषिकेश स्थित एम्स का दावा है कि स्वामीजी कोई भी जीवनरक्षक दवाईयां नहीं ले रहे हैं। वह केवल गंगाजल पर हैं। एम्स की रिपोर्ट इसका जीता-जागता सबूत हैं।
ऐसा न हो कि स्वामी सानंद की परिणति भी स्वामी निगमानंद के रूप में हो। राज्य सरकार का रवैया और केन्द्र सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति तो यही संकेत दे रही है। गंगाभक्तों की आशंका भी यही है। यदि ऐसा हुआ और सरकार ने त्वरित कदम नहीं उठाये और स्वामीजी की मांगें नहीं मानी तो इसमें दो राय नहीं कि देश एक विद्वान गंगाभक्त वैज्ञानिक गंगा के प्रख्यात एकमात्र चिकित्सक को सदा-सदा के लिए खो देगा। लगता है गंगा के लिए आंदोलन करने वालों की यही नियति है।
                                                                  (ज्ञानेन्द्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्)

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