क्यों रहे आडवाणी राष्ट्रपति पद से महरूम?

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आधी सदी से अधिक का वक्त राजनीति में गुजारने वाले आडवाणी यह समझ नहीं पाए कि उनके साथ दिखने वाले और उनकी टीम के तौर पर पहचान बनाने वाले अरुण जेटली, वैंकैया नायडू, अनंत कुमार और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता उनके साथ हैं ही नहीं
बात लालकृष्ण आडवाणी के एक बयान से शुरू हुई और इतनी बढ़ी कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सफ़ाई देनी पड़ी थी. आडवाणी ने कहा था, “गुजरात तो पहले ही स्वस्थ था, उसको आपने (नरेंद्र मोदी ने) उत्कृष्ट बना दिया है. उसके लिए आपका अभिनंदन. लेकिन छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तो बीमारू प्रदेश थे, उनको स्वस्थ बनाना…ये उपलब्धि है.” ऐसे समय में जब भारतीय जनता पार्टी का एक हिस्सा नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहा था, आडवाणी के इस बयान को मोदी को डिसमिस करने के बराबर माना गया. अख़बारों में ख़बर छपी कि आडवाणी मोदी के बदले चौहान को बढ़ावा दे रहे हैं. कॉन्ग्रेस ने इसे बीपेजी का गृहयुद्ध कहते हुए चुटकी ली थी और इस पर उस समय पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सफ़ाई देनी पड़ी. उन्होंने कहा कि आडवाणी के बयान को ग़लत समझा गया है. राजनाथ ने भी कहा था, “इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समय देश के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी हैं.” उस दौरान आडवाणी के बयान पर शिवराज सिंह को भी खुद सफ़ाई देनी पड़ी थी. चौहान का कहना था कि आडवाणी जी ने किसी एक व्यक्ति की तारीफ़ नहीं की बल्कि भाजपा के सभी मुख्यमंत्रियों की तारीफ की है. शिवराज सिंह चौहान ने यह भी कहा था, कि “आडवाणी जी ने हमारी कार्यशैली की प्रशंसा की है. उन्होंने ये भी कहा कि हम सब जो काम कर रहे हैं उसके सहारे पार्टी की पूरी टीम देश को आगे ले जाएगी. मुझसे सीनियर तो मोदी जी भी हैं रमन सिंह जी भी हैं. मैं तो नंबर एक या दो तो छोडि़ए नंबर तीन में भी नहीं हूं.”
अगर बात यही खत्म होती तो कुछ और होता, लेकिन भाजपा के शीर्ष नेता आडवाणी जी ने अपनी आक्रमकता यही समाप्त नहीं की, बल्कि  9 जून 2013 को अपने ब्लॉग में लिखते हुए भगवान कृष्ण के विश्वरूप अवतार की सराहना की है। उन्होंने शरशैय्या पर लेटे पांडवों को समझाते हुए भीष्म पीतामह की भी चर्चा की है।जिस तरह की स्थिति में आडवाणी खुद को पा रहे हैं वैसे में इस तरह के रूपक स्वाभाविक ही हैं। उनके ब्लॉग में लिखे वाक्य को पार्टी के भीतर ही एक आक्रामक गुट ने मोदी के बारे में अपने बुजुर्ग नेता की चेतावनी को मानने से इनकार कर दिया है। उन्होंने अपने बयान में लिखा था कि आडवाणी कथित रूप से उदर संक्रमण के शिकार हो गए हैं। आडवाणी जी का 614  शब्दों का ब्लॉग था।
कभी आडवाणी जी पार्टी के सबसे बड़े नेता हुआ करते थे. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से भी बड़े और बता दे कि वाजपेयी को पार्टी का चेहरा आडवाणी ने ही बनाया था. आडवाणी जी उधर नरेंद्र मोदी को बहुत पसंद करते थे, ये 1998 के दौर की बात है जब अटल बिहारी वाजपेयी को आडवाणी जी ने देश का प्रधानमंत्री और नरेंद्र मोदी जी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनवाया था. 2002 के गुजरात दंगों के बाद यही वाजपेयी उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाना चाहते थे लेकिन आडवाणी चट्टान की तरह खड़े हो गए. इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी को अपना फैसला बदलना पड़ा था और मोदी बच गए. लाल कृष्ण आडवाणी को लगता था कि वाजपेयी के बाद उनका नंबर आएगा. उन्हें 2009 में भाजपा के अभियान की अगुवाई का मौका भी मिला, लेकिन वे पार्टी को जिता नहीं पाए.
इसके बाद जब कांग्रेस की अगुवाई वाली मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ तो 2014 के अभियान की कमान पार्टी ने उनके हाथों से लेकर नरेंद्र मोदी को दे दी. उसी वक्त यह तय हो गया कि प्रधानमंत्री बनने का आडवाणी का सपना अब शायद ही पूरा हो पाए. रही-सही कसर 2014 के चुनावों में भाजपा को मिले स्पष्ट बहुमत ने पूरी कर दी.
उसके बाद से लगातार यह लग रहा था कि लाल कृष्ण आडवाणी को नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति बना सकते हैं. पार्टी के प्रमुख नेताओं में शुमार किए जाने वाले नितिन गडकरी ने एक-दो मौकों पर ऐसी बातें कही भी थीं. लेकिन जानकार बताते हैं कि जिन नरेंद्र मोदी को बचाने के लिए आडवाणी वाजपेयी और उनके बीच चट्टान की तरह खड़े हो गए थे, वही नरेंद्र मोदी अब आडवाणी और राष्ट्रपति के पद के बीच आकर खड़े हो गए. उन्होंने राष्ट्रपति बनने की आडवाणी की इच्छा के बावजूद पार्टी के एक ऐसे नेता को राष्ट्रपति बनाने का निर्णय लिया जो पार्टी में वरिष्ठता और प्रभाव के मामले में आडवाणी के मुकाबले कभी कहीं नहीं रहा. भाजपा की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद 1991 में भाजपा में आए. तब तक आडवाणी राम मंदिर आंदोलन के नायक बन चुके थे.
भाजपा और अटल-आडवाणी समेत पार्टी के कई प्रमुख नेताओं को करीब से देखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘लाल कृष्ण आडवाणी के साथ जो हो रहा है, उसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं. पार्टी में उन्होंने सही लोगों को न तो बढ़ाया और न ही उनका बचाव किया, जबकि राजनीतिक अवसरवादिता वाले नेताओं को हमेशा वे आगे बढ़ाते रहे.’
वे एक उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘जो आडवाणी नरेंद्र मोदी के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के सामने 2002 में अड़ गए, वही आडवाणी अपनी ही टीम के सबसे अहम और मजबूत नेता के.एन गोविंदाचार्य के लिए वाजपेयी के सामने नहीं अड़े. मुखौटा विवाद के बाद जब गोविंदाचार्य को वाजपेयी हर हाल में सजा देना चाहते थे तो आडवाणी ने उनसे एक बार भी बात करने की जरूरत नहीं समझी.’ वे आगे कहते हैं, ‘दरअसल, आडवाणी के कमजोर होने की शुरुआत उसी दिन से हो गई थी जब वाजपेयी ने गोविंदाचार्य को पार्टी से अलग होने के लिए बाध्य कर दिया था. आडवाणी के आसपास जो उस समय के हिसाब से युवा नेता थे, उन्हें लग गया कि जब आडवाणी गोविंदाचार्य जैसे नेता के लिए वाजपेयी के सामने स्टैंड नहीं ले सके तो उनके लिए तो कभी कुछ नहीं करेंगे. मोदी के मसले पर अडकऱ आडवाणी ने इस असर को कम करने की कोशिश की थी.’
नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को जानने वाले लोग कहते हैं कि वे न तो कभी किसी को माफ करते हैं और न ही कभी भूलते हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव अभियान में जब आडवाणी नेतृत्व कर रहे थे तब मोदी ने उनका पूरा साथ दिया था. लेकिन 2012 के गुजरात विधानसभा में जीत के बाद मोदी ने जब दिल्ली की ओर रुख करने की योजना पर तेजी से काम करना शुरू कर दिया तो यही आडवाणी उन्हें रोकने की कोशिश करने लगे. आडवाणी खुला विरोध करने के स्तर पर चले गए. जिस कार्यकारिणी में मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाने की घोषणा की उसमें आडवाणी गए ही नहीं. इसके अलावा भी कई मौके ऐसे आए जब मोदी और आडवाणी में स्पष्ट दूरी दिखी. कहा जाता है कि आडवाणी ने एक और गलती यह की कि न तो उन्होंने मोदी का खुलकर विरोध किया और न ही पूरी तरह से भक्ति की. वे बीच का रास्ता पकड़े रहे. मोदी की कार्यशैली को जानने वाले लोग मानते हैं कि मोदी के साथ ऐसी शैली नहीं चल सकती.
कुछ राजनीतिक जानकार यह भी कह रहे हैं कि आधी सदी से अधिक का वक्त राजनीति में गुजारने वाले आडवाणी यह समझ नहीं पाए कि उनके साथ दिखने वाले और उनकी टीम के तौर पर पहचान बनाने वाले अरुण जेटली, वैंकैया नायडू, अनंत कुमार और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता उनके साथ हैं ही नहीं. जैसे ही राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में मोदी का चेहरा आगे करने की कोशिश हुई, ये सभी नेता मोदी खेमे में चले गए और नरेंद्र मोदी ने आते ही अपने विश्वस्त अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनाकर यह सुनिश्चित कर दिया कि पार्टी में अब सिर्फ एक ही खेमा रहेगा और वह है नरेंद्र का खेमा. यही वजह है कि गुमनाम से रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी का विरोध पार्टी में कहीं से भी नही.
 इस वर्ग में शामिल बुद्धिजीवियों का यह मानना है कि पार्टी के ऐसे नकारात्मक अंदरूनी हालातों को अगर जल्द से जल्द सुलझाया नहीं गया तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इन्हीं की वजह से चुनावों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ेगा। एक सच यह भी है कि भले ही आज नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष का दर्जा दिया जा रहा हो लेकिन पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता पर आज भी एक प्रश्नचिह्न ही लगा है। ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच जो समस्याएं उत्पन्न हुई हैं उन्हें जल्द से जल्द सुलझा लिया जाना चाहिए नहीं तो इसी अंतर्कलह की वजह से बिना कुछ खास मेहनत किए ही चुनावी नतीजे यूपीए के हक में चले जाएंगे और भाजपा के पास हाथ मलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।
वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवियों का दूसरा वर्ग इस बात पर सहमति नहीं रखता कि भाजपा के अंदर लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी को लेकर दो खेमे बंटे हुए हैं क्योंकि इनका मानना है कि पार्टी के भीतरी हालात नरेंद्र मोदी के पक्ष में हैं। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के वरिष्ठ और सम्माननीय नेता हैं लेकिन अब समय नरेंद्र मोदी का है और जनता उनसे यह अपेक्षा रखती है कि जिस तरह उन्होंने गुजरात को एक वल्र्ड क्लास मॉडल बनाया है वैसे ही वह पूरे भारत की कमान संभालेंगे। ऐसे में नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच प्रतिस्पर्धा जैसी बातें फैलाकर यह कहना कि यूपीए की जीत का रास्ता साफ है, पूरी तरह गलत है।
तिलक राज शर्मा (अलाइव न्यूज़ संपादक)
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