रुखसाना सुल्ताना को देख क्यों छिप जाते थे मर्द

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नसबंदी को परिवार नियोजन के दूसरे विकल्पों से कहीं ज्यादा प्रभावी और सुरक्षित माना जाता है. लेकिन आपातकाल के दौरान जामा मस्जिद के आसपास चलने वाले नसबंदी कैंपों का प्रभाव यह था कि स्थानीय लोग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे थे. बताते हैं कि इन कैंपों को चलाने की जिम्मेदारी जिस महिला को सौंपी गई थी उसे देखते ही डर के मारे लोगों के हलक सूख जाते थे. उस समय के सत्ता प्रतिष्ठान से गहरी नजदीकी रखने वाली इस महिला का नाम था रुखसाना सुल्ताना. सरकारी अधिकारी उन्हें रुखसाना साहिबा कहा करते थे.

ऐसा नहीं था कि रुखसाना को सामाजिक कार्य का कोई अनुभव था या वे डॉक्टर थीं. इससे पहले वे दिल्ली में अपना एक बुटीक चलाती थीं.

1975 में एक तरफ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल का ऐलान किया था तो दूसरी तरफ उनके बेटे संजय गांधी के राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई थी. इस सफर ने इस तेजी से रफ्तार पकड़ी कि जल्द ही संजय गांधी को समानांतर सत्ता केंद्र कहा जाने लगा. उन्होंने आपातकाल के दिनों में एक पांच सूत्री कार्यक्रम लागू किया. साक्षरता, सौंदर्यीकरण, वृक्षारोपण, दहेज प्रथा व जाति उन्मूलन और परिवार नियोजन इसका हिस्सा थे. लेकिन इनमें भी संजय गांधी के लिए सबसे अहम था परिवार नियोजन. उनका मानना था कि जिस आबादी को देश की सारी समस्याओं की जड़ बताया जा रहा है उस पर अगर वे लगाम लगा सकें तो तुरंत ही देश और दुनिया में वे एक प्रभावशाली नेता के तौर पर स्थापित हो जाएंगे. माना जाता है कि इसके चलते उन्होंने सारी सरकारी मशीनरी को इस काम में झोंक दिया.

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संजय गांधी इस काम की शुरुआत राजधानी और उसमें भी पुरानी दिल्ली से करना चाहते थे. तब भी नसबंदी के बारे में कई भ्रांतियां थीं. मुस्लिम समुदाय में यह अफवाह उड़ती थी कि यह उसकी आबादी कम करने की साजिश है. संजय गांधी को लगता था कि अगर उन्होंने शुरुआत में ही इस अभियान को सफल बना दिया और वह भी मुस्लिम समुदाय के बीच तो पूरे देश में एक असरदार संदेश जाएगा.

दिल्ली में नसबंदी कार्यक्रम कैसे चलेगा, इसकी जिम्मेदारी जिन चार लोगों को दी गई थी वे थे लेफ्टिनेंट गवर्नर किशन चंद, नवीन चावला, विद्याबेन शाह और रुखसाना सुल्ताना. रुखसाना को संजय गांधी ने मुस्लिम समुदाय के लोगों को ज्यादा से ज्यादा तादाद में नसबंदी के लिए राजी करने का काम सौंपा था.

बताया जाता है कि संजय गांधी से प्रभावित रुखसाना एक आयोजन में उनके पास आईं और पूछा कि वे उनके लिए क्या कर सकती हैं? संजय ने उनसे कहा कि वे मुसलमानों को नसबंदी के लिए राजी करें.

ऐसा नहीं था कि रुखसाना को सामाजिक कार्य का कोई अनुभव था या वे डॉक्टर थीं. इससे पहले वे दिल्ली में अपना एक बुटीक चलाती थीं. उनकी मां जरीना बीकानेर रियासत के मुख्य न्यायाधीश मियां अहसान उल हक की बेटी और चर्चित अभिनेत्री बेगम पारा की बहन थीं. रुखसाना ने एक सैन्य अधिकारी शिविंदर सिंह से शादी की थी जो दिग्गज पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह के भतीजे थे. उनकी बेटी का नाम अमृता सिंह है जो हिंदी फिल्मों की चर्चित अभिनेत्री हैं.

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बताया जाता है कि संजय गांधी से प्रभावित रुखसाना एक आयोजन में उनके पास आईं और पूछा कि वे उनके लिए क्या कर सकती हैं? संजय ने उनसे कहा कि वे मुसलमानों को नसबंदी के लिए राजी करने की जिम्मेदारी संभालें. इस तरह रुखसाना संजय गांधी की टीम में शामिल हो गईं. जल्द ही उन्होंने अपना काम भी शुरू कर दिया. वे पुरानी दिल्ली में घर-घर जाकर लोगों को परिवार नियोजन के फायदों के बारे में समझाने लगीं. उन्होंने इस इलाके में छह नसबंदी कैंप भी शुरू कर दिए.

लेकिन जल्द ही पुरानी दिल्ली में नसबंदी के बारे में जागरूकता से कहीं ज्यादा उसका आतंक फैल गया. खबरें आने लगीं कि महीने का टारगेट पूरा करने के लिए लोगों को जबरन पकड़कर उनकी नसबंदी की जा रही है और इसमें 60 साल के बुजुर्गों और 18 साल के नौजवानों को भी बख्शा नहीं जा रहा. कहते हैं कि ये खबरें संजय गांधी तक भी पहुंचती थीं, लेकिन वे इन्हें अतिश्योक्ति कहकर खारिज कर देते थे.

खबरें आने लगीं कि महीने का टारगेट पूरा करने के लिए लोगों को जबरन पकड़कर उनकी नसबंदी की जा रही है और इसमें 60 साल के बुजुर्गों और 18 साल के नौजवानों को भी बख्शा नहीं जा रहा.

अपनी किताब ‘द संजय स्टोरी’ में विनोद मेहता याद करते हैं कि कैसे उस दौर में एक खबर पर काम करते हुए वे जामा मस्जिद के आसपास वाले इलाकों में लोगों से मिले थे जिनमें नसबंदी कार्यक्रम को लेकर बहुत गुस्सा था. आलम यह था कि रुखसाना की कार देखकर लोगों की रूह सूख जाती थी.

बाद में रुखसाना के साथ हुई मुलाकात का जिक्र करते हुए मेहता लिखते हैं कि उन्होंने इन बातों को खारिज करते हुए कहा कि नसबंदी का काम बहुत मानवीय और स्वैच्छिक तरीके से हो रहा है. रुखसाना का मानना था कि राई का पहाड़ बनाया जा रहा है और यह इलाके के पुराने कांग्रेसियों की साजिश है जिनसे यह हजम नहीं हो रहा कि कोई दूसरा उनके इलाके में आकर वास्तव में कुछ कर रहा है. इसी मुलाकात में रुखसाना ने मेहता से कहा कि वे उन्हीं लोगों से मिलने जा रही हैं जिन पर कैंपों को चलाने की जिम्मेदारी हैं. उनका कहना था कि मेहता चाहें तो खुद उनसे पूछ करके यह पुष्टि कर सकते हैं कि कोई जोर जबरदस्ती नहीं हो रही. मेहता के मुताबिक जब वे रुखसाना की कार में बैठकर पुरानी दिल्ली के एक मकान में पहुंचे तो उन लोगों की शक्लें देखकर चौंक गए. दरअसल वे बहुत डरावनी शक्ल वाले लोग थे.

अपनी किताब में मेहता लिखते हैं कि जब उन्होंने पूछा कि ये लोग कौन हैं तो रुखसाना का जवाब था, ‘ये राजस्थानी नायक हैं. आप इसे देख रहे हैं. ये इनका मुखिया है. आपको पता है इसने आठ मर्डर किए हैं और एक भी लाश नहीं मिली.’ इसके बाद वे मुखिया की तरफ मुड़ीं और हंसते हुए पूछा, ‘तो कितने आदमी मारे हैं तुमने? आठ या इससे भी ज्यादा?’ मेहता आगे लिखते हैं, ‘तो ये थे वे लोग जो रुखसाना के मानवीय और स्वैच्छिक तीरके वाले नसबंदी कैंप चला रहे थे.’

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‘ये राजस्थानी नायक हैं. आप इसे देख रहे हैं. ये इनका मुखिया है. आपको पता है इसने आठ मर्डर किए हैं और एक भी लाश नहीं मिली.’

इन्हीं रुखसाना ने संजय गांधी के लिए एक मास्टरस्ट्रोक भी खेला. जब नसबंदी के चलते मुजफ्फरनगर, मेरठ, गोरखपुर और सुल्तानपुर जैसे कई शहरों में दंगे होने लगे तो उन्होंने उसी दौरान दो इमामों को नसबंदी कराने के लिए तैयार कर लिया. जब मुसलमान नसबंदी को इस्लाम के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध कर रहे हों तो मुस्लिम धर्मगुरुओं का नसबंदी करवाना अपने आप में बहुत बड़ी बात थी. रुखसाना ने यह ऐलान करके इस कामयाबी को और भी वजन दे दिया कि शरीफ अहमद और नूर मोहम्मद नाम के ये दो इमाम उसी मुजफ्फरनगर के हैं जहां नसबंदी के मुद्दे पर बड़ा दंगा हुआ है.

उस समय ये भी खबरें आईं कि बाकी लोगों की तरह इमाम भी पहले नसबंदी के खिलाफ थे. लेकिन अपनी वाकपटुता और कुरान की कुछ आयतों का उदाहरण देते हुए रुखसाना ने उन्हें मनाने में कामयाबी हासिल कर ली. संजय गांधी इससे बहुत खुश हुए. उन्होंने खुद इन दोनों इमामों को नसबंदी का सर्टिफिकेट दिया और साथ ही दोनों को 101 रु का नकद ईनाम भी. शरीफ अहमद और नूर मोहम्मद ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे दूसरे धार्मिक नेताओं को मनाने की भी हरमुमकिन कोशिश करेंगे. अगले दिन अखबारों में संजय गांधी के अगल-बगल खड़े इन दोनों इमामों की तस्वीरे छपीं.

आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार आई तो रुखसाना नेपथ्य में चली गईं. इसके बाद उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं सुना गया. दुबारा उनका नाम 1983 में तब चर्चा में आया जब उनकी बेटी अमृता सिंह की पहली फिल्म बेताब रिलीज हुई थी. इसके बाद से उनके बारे में फिर कुछ और सुनने में नहीं आया.

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