तेरी नज़ाकत किसी काम की नहीं

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ज़ुल्म होता रहे और आँखें बंद रहें
ऐसी आदत किसी  काम की नहीं
बेवजह अपनी ही इज़्ज़त उछले तो
ऐसी शराफत किसी काम की नहीं
बदवाल का नया पत्ता न खिले तो
ऐसी बगावत किसी काम की नहीं
मुस्कान की क्यारी न खिल पाए तो
फिर शरारत किसी काम की नहीं
तुम्हें छुए और होश में भी रहें तो
तेरी नज़ाकत किसी काम की नहीं
सलिल सरोज, सीनियर ऑडिटर, सी ए जी ऑफिस
गुनाह यहाँ रोज़ होता है
तुम्हें बस ख़बर ही नहीं है
वर्ना गुनाह यहाँ रोज़ होता है
इस हुश्न की चारागरी में तो
इश्क़ तबाह यहाँ रोज़ होता है
ज़ख़्म सहने की आदत है सो
दुआ फ़ना यहाँ रोज़ होता है
भीड़ में होके भी आज इंसाँ
बेवक़्त तन्हा यहाँ रोज़ होता है
ज़िन्दगियाँ यूँ ही क़त्ल होती हैं
पैदा गवाह यहाँ रोज़ होता है.
सलिल सरोज, सीनियर ऑडिटर, सी ए जी ऑफिस
नभचर से नभ छीन चुके हैं
भचर से नभ छीन चुके हैं
खेत-खलिहान छीन चुके हैं
घोंसले बनाने को दीवारें तो
खाना-पीना भी छीन चुके हैं
कृत्रिम प्रकृति की रचना में हम
इनका चहचहाना छीन चुके हैं
जहाँ-तहाँ हैं ये व्याकुल पंछी
इनसे उड़ना तक छीन चुके हैं
अपनी-अपनी लालच में आके
बेज़ुबानों का जीना छीन चुके हैं
सलिल सरोज, सीनियर ऑडिटर, सी ए जी ऑफिस

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